Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Attachment & Detachment

अनासक्ति

630 सूत्र · पृष्ठ 8 / 9

गरीब का बेटा बीमार हो गया, पैसा पास में नहीं था, कर्जा करके पैसा लगाया, पच्चीस रुपये शुल्क थी, डॉ. को लाया तब तक बेटा मर गया, डॉ. को पच्चीस रुपये दिये उसने लेने से मना कर दिया, डॉ. ने तीन रुपये रिक्शे वाले को दिये उसने भी मना कर दिया यह भी त्याग है।
अनासक्ति
त्याग धर्म वहाँ होता है जहाँ त्यागने के लिए कुछ नहीं बचता है।
अनासक्ति
यौवन में भोग भोगना और बुढ़ापे में त्याग करना, आम चूस कर बाद में, गुठली का दान करने जैसा है।
अनासक्ति
त्यागी हुई वस्तु ग्रहण करना वमन ग्रहण करने के तुल्य है।
अनासक्ति
सिर के एक सफ़ेद बाल को देखकर सज्जनों को शीघ्र ही वैराग्य हो जाता है किन्तु दुर्जनों की जैसे-जैसे वृद्धावस्था आती है वैसे-वैसे तृष्णा बढ़ती जाती है।
अनासक्ति
कञ्जूस के समान दाता न हुआ है न होगा, क्योंकि वह धन को छुए विना ही दूसरों को दे देता है, अर्थात् स्वयं दान व भोग न करके पूरा छोड़ करके चला जाता है।
अनासक्ति
रागी जीव कर्मों से बँधता है, वैरागी जीव कर्मों से छूटता है, ऐसा जिनेन्द्र भगवान् का उपदेश है, इसलिए किसी भी पदार्थ में राग मत करो।
अनासक्ति
राजकुमार के खजाने में साँप रहता था, कोषाध्यक्ष और मन्त्री को देखकर फुङ्कार मारता था, लेकिन राजकुमार को देखकर हट जाता था, वह राजकुमार के पिता का जीव था, राजा परिग्रह आसक्ति के कारण अपने ही भण्डार में मरकर सर्प बना था, मुनिराज के मुख से पिता के पूर्व भव सुनकर राजकुमार को वैराग्य हो गया।
अनासक्ति
भावों से रिश्ते का त्याग ही सच्चा त्याग है।
अनासक्ति
त्याग तो किया पर रागादि कितना घटा? अलमारी साफ की पर ऐसे ढङ्ग से की, कि पानी अन्दर चला गया, पुस्तकें गल गयी, ऐसी सफाई ठीक नहीं, इसी तरह त्याग किया पर राग-द्वेष कम नहीं हुए तो ये वास्तविक त्याग नहीं है।
अनासक्ति
भोजन करें और मल विसर्जन न करें, तो पीड़ा होगी, श्वांस लें और बाहर न निकालें तो घुटन होगी, लेना जितना जरूरी है, उसे छोड़ना भी उतना ही अनिवार्य है।
अनासक्ति
छोड़ने और छूटने में कितना अन्तर है, जितना शौच और उल्टी में हैं, शौच के बाद ताजगी, उल्टी में जी मचलता है।
अनासक्ति
त्याग झाड़ू लगाने के समान है आकिञ्चन्य पोंछा लगाने के समान है।
अनासक्ति
अकिञ्चन जगत का स्वामी कैसे हो सकता है? अतः कहते हैं कि सन्त पुरुषों का चरित्र अलौकिक होता है, हे भव्य! आकिञ्चन्य रूप सुसिद्ध मन्त्र का निरन्तर अभ्यास कर, जो मन्त्र गुरु के उपदेश के अनन्तर तत्काल अपना काम करता है उस मन्त्र को सुसिद्ध मन्त्र कहते हैं, जो काल पाकर सिद्ध होता है वह सिद्धमन्त्र है, जो जप-होम आदि से साधा जाता है वह साध्यमन्त्र है और जो तत्क्षण ही शत्रु को मूल से नष्ट कर देता है वह सुसिद्ध मन्त्र है, ऐसा ही आकिञ्चन्य रूपी सुसिद्ध मन्त्र मोह को तत्काल नष्ट करने वाला है, चारित्र की रक्षा और मोक्ष की प्राप्ति के लिए अन्तरङ्ग चौदह प्रकार के और बाह्य दस प्रकार के परिग्रहों को छोड़ना चाहिए।
अनासक्ति
चार तरह के लोग- 1.मेरा सो मेरा, तेरा सो तेरा, 2.तेरा सो तेरा, मेरा भी तेरा, 3.मेरा सो मेरा, तेरा भी मेरा, 4.तेरा न मेरा, चिड़िया रैन बसेरा, झूठा है झमेला।
अनासक्ति
आकिञ्चन्य धर्म आत्मा की उस दशा का नाम है, जहाँ पर बाहरी सब कुछ छूट जाता है और अन्तरङ्ग में भी सङ्कल्प-विकल्प की परिणति को विश्राम मिल जाता है।
अनासक्ति
प्रत्येक अवस्था में सुख का अनुभव कर सकते हैं, केवल वैराग्य होना चाहिए।
अनासक्ति
संसार शोकमय है, जीवन भोगमय है, सम्बन्ध वियोगमय है, मात्र साधना ही उपयोग मय है।
अनासक्ति
सम्बन्ध तीन प्रकार के- सांसारिक सम्बन्ध- माँ बाप का या जन्म से मरण तक चलने वाला सांसारिक सम्बन्ध है। सम्पादित सम्बन्ध- धन, पैसा, प्रतिष्ठा आदि का सम्पादित सम्बन्ध है। शाश्वत् सम्बन्ध- आत्मा का ज्ञान, दर्शन आदि से शाश्वत् सम्बन्ध है, पूर्व के दो सम्बन्ध छूट जाते हैं अतः हेय हैं।
अनासक्ति
जहाँ देह अपनी नहीं, तहाँ न अपना कोय। घर सम्पत्ति पर प्रगट ये पर हैं परिजन लोय।।
अनासक्ति
धरती पर सोता हूँ आसमान ओढ़ता हूँ, देह की माटी से अमृत निचोड़ता हूँ। दुनिया की दौलत से कीमती ये फकीरी है, इसलिये वैभव से नहीं विराग से नाता जोड़ता हूँ।।
अनासक्ति
दरिद्र मनुष्य पाप के उदय से बाह्य परिग्रह से रहित होते हैं किन्तु अन्तरङ्ग परिग्रह के त्यागी साधु लोक में दुर्लभ हैं।
अनासक्ति
'मेरा कुछ भी नहीं है' ऐसा सोचकर बैठ जाओ तीन लोक के अधिपति हो जाओगे किन्तु यह योगियों के बस की बात है, मैंने तुम्हें परमात्मा बनने का रहस्य बताया है।
अनासक्ति
एकाकी पर पदार्थों की इच्छा से रहित, शान्त, हाथ में भोजन करने वाला, दिगम्बर, कर्मों को नष्ट करने में समर्थ कब होऊँगा ऐसी जैनेतर ऋषि भी भावना भाते हैं।
अनासक्ति
प्राणी दिगम्बर ही जन्म लेता है, और दिगम्बर ही मरता है मध्यावस्था में दिगम्बर होने वाले मनुष्य दुर्लभ हैं।
अनासक्ति
मेरी आत्मा शाश्वत् है, ज्ञान-दर्शन लक्षण वाली है, शेष सभी मुझसे बाह्य है और संयोग से मिलने वाले हैं।
अनासक्ति
सभी कामभोग और बन्ध की कथाएँ श्रुत परिचित एवं अनुभूत हैं किन्तु एकत्व विभक्त आत्मा की उपलब्धि दुर्लभ है।
अनासक्ति
जीव अकेला जन्म लेता है, अकेला गर्भ में निवास करता है, अकेला ही बाल, युवा एवं वृद्ध अवस्था को प्राप्त होता है।
अनासक्ति
जिसकी मोक्ष में भी इच्छा नहीं वह मोक्ष पाता है ऐसा कहा गया है इसलिए आत्मार्थी किसी भी पदार्थ की इच्छा न करें।
अनासक्ति
निज की ओर वापसी- एक नगर का राजा मर गया, राजा किसको बनाया जाए? मन्त्रियों ने विचार किया कि प्रातः काल गेट खोलने पर जिसका प्रथम दर्शन होगा उसे राजा बनायेंगे, प्रातः काल गेट खोला तो एक लंगोटी वाले संयासी दिखे, उनसे कहा तुम्हे राजा बनना है, उसने मना कर दिया, लोग नहीं माने, उन्हें लाकर राजसी वेश पहना कर राजा बना दिया, पर उन्होंने अपनी लंगोटी सुरक्षित रखी, दो वर्ष बाद एक राजा ने चढ़ाई कर दी, राजा के पास बैठकर मन्त्रियों ने सलाह की, क्या करना चाहिए? संयासी ने अपना सन्दूक बुलवाया लंगोटी पहनी, जङ्गल की ओर चले गये, 'तेरा तुझको सौंपते क्या लागे है मोर' इसी तरह गृहस्थी में जीवन व्यतीत करना चाहिए, जिसने जो माँगा दे दिया।
अनासक्ति
साधु ने सेठ से कहा! ये कोठी नही धर्मशाला है, सेठ कहता है महाराज ये तो कोठी है धर्मशाला आपको छुड़वा देते हैं, साधु ने कहा इसको किसने बनवाया? पिताजी ने, कितने दिन रहे? पाँच वर्ष, वो छोड़कर चले गये तुम भी छोड़कर जाओगे तब धर्मषाला नहीं तो क्या है।
अनासक्ति
रत्न आते ही भाव बिगड़े- अहिदेव और महिदेव दोनों भाइयों ने विदेश में बहुत धन सञ्चित किया, जब घर आने लगे तो एक रत्न खरीद लिया, वह जिस भाई के पास रहता था, उसके भाव खराब हो जाते थे, घर आकर माता को दिया, उसके भाव भी बेटों को मारने के हो गये, सुबह मुनिराज के दर्शन प्रवचन को गयी, वहाँ भाव परिवर्तन हो गये, घर आकर माँ ने वह रत्न बेटों को देकर कहा यह रत्न समुद्र में फेक आओं, उसके बाद शान्ति से रहने लगे, यदि शान्ति चाहिए तो आकिञ्चन्य धर्म को अपनाना पड़ेगा।
अनासक्ति
पण्डित पन्नालालजी साहित्याचार्य सागर वालों का बेटा इन्दौर अस्पताल में भर्ती था, पण्डित जी बहुत दुःखी थे, एक सज्जन उन्हें देखने आये, उन्होंने कहा चलो अस्पताल घूम कर आते हैं, अस्पताल में किसी का हाँथ टूटा है, किसी का पैर टूटा है, किसी का आग से पूरा शरीर जल गया है, सज्जन ने पण्डितजी से कहा, इन्हें देखकर अपन को दुःख नहीं हो रहा है, इसी तरह दुनिया में रोज हजारों लोग मरते हैं, जेलों में हजारों बन्द होते है, हजारों पेट भरने के लिये रोते हैं, लाखों एक-एक रुपये को मुहताज हैं, उनको देखकर हमें कुछ नहीं होता, तथा हमारा बेटा बीमार हो जाये तो हमें कष्ट होता है, यह राग या ममत्व भाव का परिणाम है।
अनासक्ति
सेठ का चार साल का बच्चा गुम गया, सेठ ने बहुत ढूँढा पर कही नहीं मिला, तब एक नौकर को रख लिया, उससे रात दिन काम लेते थे, एक दिन नौकर बीमार हो गया सेठानी ने आवाज दी, उसने नहीं सुना, गुस्से में जाकर सेठानी ने उसका चादर खींचा और कहा चल काम कर, तभी उसके हाँथ में गुदा हुआ नाम देखा, पढ़ा तो सोचा यही नाम तो हमारे बेटे का था, पन्द्रह वर्ष हो गये अभी तक वापस नहीं आया, बच्चे से पूँछा, तो उसने कहा! मैं अपने माँ बाप को नहीं जानता, मैं पन्द्रह साल पहले खो गया था, बाद में माता-पिता नहीं मिले, यही मेरा पुत्र है ऐसा समझ कर सेठ-सेठानी खुशी से उछल पड़े, अब मेरा बेटा मिल गया और उसे छाती से लगा लिया, पहले उससे शक्ति से ज्यादा काम लेते थे पर अब उसे जरा भी कष्ट नहीं देना चाहते थे, मोही जीव अपने और पराये से ऐसा व्यवहार करते हैं।
अनासक्ति
स्नेह रहित मनुष्य निर्वाण को प्राप्त होता है तथा स्नेह अनर्थ का कारण है, यह रहस्य स्नेह (तैल) रहित दीपक ने प्रकट किया है, भावार्थ- जब तक दीपक में तैल रुपी स्नेह रहता है तब तक उसे जलना पड़ता है और जब तैल रुपी स्नेह समाप्त हो जाता है तब वह निर्वाण को प्राप्त हो जाता है (बुझ जाता है), इसी प्रकार संसारी प्राणी स्नेह-प्रीति के कारण निरन्तर आकुलता में पड़कर दुःखी रहते हैं और प्रीति का त्याग करने वाले मुनिराज निर्वाण को प्राप्त होते हैं।
अनासक्ति
अर्थ की ओर दृष्टि लगाने वाले एक दिन अर्थी पर आ जाते हैं, जीवन को व्यर्थ कर दुर्गति के गर्त में चले जाते हैं, दूसरी ओर आत्मा की ओर दृष्टि लगाने वाले एक दिन परमात्मा बन जाते हैं, जीवन को पावन बना लेते हैं और संसार से पार हो जाते हैं।
अनासक्ति
परमात्मा के दर्शन- शिष्य ने गुरू से कहा 'गुरू चरणों में रहते वर्षों बीत गये किन्तु परमात्मा के दर्शन नहीं हुए' गुरू ने कहा! चलो आज उस पहाड़ी पर इन पत्थरों को लेकर परमात्मा का दर्शन करायेगें ।गुरू पहाड़ी पर पहुँच गये, किन्तु पत्थर के बोझ से शिष्य पीछे रह गया, बोझ से थक कर एक-एक पत्थर फेकना शुरू कर दिया, पहाड़ तक जाते-जाते सारे पत्थर फेंक दिये, ऊपर जाकर जब गुरू से मिले तब गुरु ने पूँछा, पत्थर कहाँ हैं? शिष्य ने कहा पत्थर के बोझ से चल नहीं पा रहे थे, इसलिये फेंक दिये, तब गुरू ने कहा बाहरी बोझ की अपेक्षा अन्दर का बोझ कम करो, अर्थात् क्रोध, मानादि पत्थरों को जिस दिन फेंक दोगे उस दिन परमात्मा के दर्शन हो जायेंगे।
अनासक्ति
सुकुमाल मुनि को घर में राई का दाना चुभता था पर अब स्यालिनी के दाँत नहीं चुभ रहे थे, यही राग और वैराग्य में अन्तर है।
अनासक्ति
गृह आदि में ममत्व भाव रूप मूर्छा के निमित्त से आगत और उनके रक्षण आदि से सञ्चित पापकर्म की निर्जरा बड़ी कठिनता से होती है।
अनासक्ति
पर द्रव्य- 'सीता' के संयोग से राम भी दुःखी हुये, रावण की दुर्गति हुयी, कुटुम्ब परिवार का सम्बन्ध शरीर से है, आत्मा से नहीं।
अनासक्ति
ग्रहों में शनि ग्रह खतरनाक है, किन्तु उससे भी अधिक दुष्ट ग्रह परिग्रह है, यह दसवां ग्रह सब ओर से पकड़ता है।
अनासक्ति
एक लंगोटी का परिग्रह भी सोलहवें स्वर्ग से ऊपर नहीं जाने देता एवं जितना ज्यादा सङ्ग्रह होता है उतनी ज्यादा व्यग्रता होती है।
अनासक्ति
लाखों शत्रुओं से उतनी हानि नहीं होती, जितनी रागादि परिणामों से होती है।
अनासक्ति
बाहरी त्याग के बाद भी मन में 'मैं' और 'मेरे पन' का भाव निरन्तर चलता रहता है, इसलिए आत्म शान्ति नहीं मिलती है।
अनासक्ति
अणुमात्र भी परिग्रह से मोह की गाँठ दृढ़ होती है, उससे ऐसी तृष्णा बढ़ती है, जिससे संसार की समस्त भोग सामग्री भी शान्ति के लिए नहीं होती है।
अनासक्ति
शय्या के लिए तृण का ग्रहण करना भी मुनियों के लिए निन्द्य कहा है, फिर जो धनादिक को ग्रहण करता है वह क्या जिनागम में निन्द्य नहीं कहा जायेगा?
अनासक्ति
विद्वानों ने परिग्रह को काम रूपी साँप की बामी, रागादि शत्रुओं का घर तथा अविद्याओं का क्रीड़ा स्थल कहा है।
अनासक्ति
मकड़ी स्वयं जाल पूरती है और स्वयं उसी में बैठकर मूर्छा के कारण प्राण खो देती है।
अनासक्ति
मैं एकाकी एकत्व लिये, एकत्व लिये सब ही आते, तन धन को साथी समझा था पर वे भी छोड़ चले जाते। मेरे न हुये ये मैं इनसे अति भिन्न अखण्ड निराला हूँ, निज में पर से अन्यत्व लिए मैं सम रस पीने वाला हूँ।
अनासक्ति
छाया माया एक सी, घटत बढ़त दिन रैन। जो याका शरणा गहे, सो न पावे चैन।।
अनासक्ति
क्रोधादि से तो कभी-कभी कर्म बन्ध होता है, परन्तु परिग्रह से तो हमेशा पाप का बन्ध होता है, अतः परिग्रह धारियों को कभी मोक्ष नहीं होता है।
अनासक्ति
ममत्व भाव से दुःख- सेठजी की वेश कीमती घड़ी नौकर के हाथ से फूट गयी, सेठ ने बहुत डाँटा, रात में नींद भी नहीं आयी और न ही भूख लगी, किन्तु नौकर भोजन करके निश्चिन्त सोया, दूसरे दिन सेठ ने नौकर से कहा कोई बात नहीं, फूट जाने दो, दुःख इस बात का है वह घड़ी तुम्हे देना थी, अब रात में सेठ चैन से सोया और नौकर को न तो भूख लगी और नींद भी नहीं आई, वास्तव में ममत्व भाव ही दुःख का कारण है।
अनासक्ति
अपनेपन से दुःख- सेठजी ने बहुत बढ़िया मकान शहर के बीच में बनाया, अचानक आग लग गयी, धूँ-धूँ कर मकान जल रहा था, सेठ सीना पीट-पीट कर रो रहा था, कि इतने में बड़ा लड़का आया और बोला! पिताजी क्यों रो रहे हो? यह मकान कल बिक गया था बयाना हो गया है, अब भी मकान जल रहा था, पर अब सेठ दर्शक के समान देख रहा था, छोटा लड़का आया और बोला पिताजी! खड़े-खड़े क्या देख रहे हो, आग बुझाओ पिताजी ने कहा, चिन्ता नहीं करो मकान बिक गया है, बेटा बोला सौदा केंसल हो गया है अब सेठ का पुनः रोना-धोना चालू हो गया, वास्तव में अपना पन ही दुःख का कारण है।
अनासक्ति
सिक्का राजा को दिया- एक साधु जङ्गल में विराजे थे, उनको कोई दर्शनार्थी सिक्का चढ़ा गया, साधु ने सोचा यह सिक्का किस गरीब को देना चाहिए, इतने में राजा किसी पर चढ़ाई करने के लिये निकल रहा था, सन्त ने सोचा, इससे ज्यादा गरीब कोई नहीं, इसलिये साधु ने सिक्का राजा की पालकी पर फेंक दिया, तव राजा ने साधु से पूँछा आपने यह सिक्का यहाँ क्यों फेका? साधु ने कहा दूसरों को लूटने जा रहे हो इसलिये भिखारी हो अतः मैंने आपको भीख दी है।
अनासक्ति
बन्दर मुठ्ठी बाँध कर घड़े से चने निकालता है, जब हाँथ नहीं निकलता, तो कहता है इस घड़े ने पकड़ लिया, वास्तव में तो उसने घड़े को पकड़ रखा है, इसी प्रकार संसारी प्राणी ने स्वयं गृहस्थी को पकड़ रखा है और कहता है परिवार के लोग नहीं छोड़ते हैं।
अनासक्ति
सम्पति के कमाने में कलुषता और व्यय करने में दुरभिमान होता है, इस तरह जहाँ कषाय का ही साम्राज्य है, वहाँ शान्ति कैसे मिल सकती है?
अनासक्ति
हमारी बारह भावना- राजा राणा छत्रपति हाथिन के असवार। पैसा हेतु घर छोड़कर भ्रमत जीव संसार।। दलबल देवी-देवता मात-पिता परिवार। बिन पैसे के जीव को कोई न राखन हार।। दाम विना निर्धन दुःखी तृष्णा वश धनवान। बीस लाख की लॉटरी, खोल देहु भगवान।। आप अकेला अवतरे मरे अकेला होय। पत्नी बिन संसार में, और न दूजो कोय।। जहाँ देह अपनी नहीं तहाँ न अपना कोय। पैसे के प्रभाव से, पर जन अपना होय।। दिपे चाम चादर मणि हाड़ पींजड़ा देह। तैल पाउडर पोत के, दुनिया वस कर लेय।। मोह नींद के जोर जगवासी घूमे सदा। पैसा धरे बटोर के, खबर नहीं भगवान की।। सतगुरु देय जगाय मोहनींद जब उपशमे। पैसा इन्हें दिखाय, चिन्ता करे दुकान की।। ज्ञान दीप तप तैल भर घर शोधे भ्रम छोर। माल रखाते रात भर, ले न जावे चोर।। पञ्च महाव्रत सञ्चरण समिति पञ्च परकार। इन्हें त्याग कर नित करे पञ्च पाप से प्यार।। चौदह राजू उतङ्ग नभ लोक पुरुष सण्ठान। मैं सबका स्वामी बनूं, कृपा करो भगवान्।। धन कन कञ्चन राजसुख सबही सुलभ कर जान। दुर्लभ है कञ्जूस घर, मिल जाए जल पान।। जाँचे सुर तरु देय सुख चिन्तत चिन्ता रैन। बिन जाए इस जगत में, पत्नी ही सुख देन।। आप अकेला अवतरे मरे अकेला होय। माया चारी के विना, लखपति कैसे होय।।
अनासक्ति
छिपकली, कुत्ता, बिल्ली, चूहा, जिन घरों में रहते हैं वे उसे अपना मानते हैं, और जमादार (मेहतर) भी जितने घरों की सफाई करता है, उन्हें अपने कहता है और हम भी उसे अपना घर मानते हैं, तो हमारी सोच भी कुत्ते आदि की तरह हुई, तथा शर्माजी का कुत्ता वर्माजी के कुत्ते से बोला कि मैं गाड़ी खींच रहा हूँ, पर उसे नहीं मालूम की गाड़ी खींचने वाला कोई और है, इसी प्रकार अज्ञानी प्राणी घर, परिवार आदि का कर्ता अपने को मानता है, पर उसे नहीं मालूम कि सबका अपना-अपना भाग्य और पुरुषार्थ होता है।
अनासक्ति
बेटियों को जमाई, बेटों को बहुएँ और शरीर को मौत ले जायेगी, तब सोचो आपके पास क्या बचेगा?
अनासक्ति
शरीर, घर, धन, स्त्री, पुत्र, मित्र और शत्रु सभी भिन्न स्वभाव वाले हैं फिर भी अज्ञानी मोही इन्हें अपने मानता है।
अनासक्ति
चारों ओर आग लगी हो उससे डरकर कोई विष्टा के गड्ढे में गिरकर सुख मान मरण को प्राप्त होता है, वैसे ही विषय सुख में रति मानता है, तो दुर्गति को प्राप्त होता है।
अनासक्ति
यह राग आग दहे सदा- शक्कर के पहाड़ की चींटी ने नमक के पहाड़ की चींटी का निमन्त्रण किया, मुँह में नमक की डली दबाकर शक्कर के पहाड़ पर आई, इसलिए उसे शक्कर का आनन्द नहीं आ रहा था, इसी तरह वैराग्य में राग रूपी नमक हो तो वैराग्य का आनन्द नहीं आता है, ये विषय सम्बन्धी रागादि काले नाग की तरह हैं, जैसे कमरे में सर्प हो तो नींद नहीं आती है, उसी तरह राग की आग दहे तो नींद नहीं आती है।
अनासक्ति
स्त्री का राग हटा, कि परिग्रह स्वयमेव घट जाता है।
अनासक्ति
जैसे लोक में कोई पुरुष पर वस्तु को 'यह पर वस्तु है' ऐसा जानकर छोड़ देता है, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष समस्त परद्रव्यों के भावों को परभाव जानकार छोड़ देता है।
अनासक्ति
देह से भिन्न आत्मा को पर पदार्थ का कर्ता, भोक्ता, एकत्व, ममत्व मानना एवं माता-पिता, देश, मकान, स्त्री-पुत्रादि, पञ्चपरमेष्ठी- ये सब उपचरित असदभूत व्यवहारनय से मेरे हैं।
अनासक्ति
उपचार आसानी से बदल जाता है, जैसे मकान मेरा है पर बिकने पर दूसरे का हो जाता है।
अनासक्ति
रामचन्द्रजी सम्यग्दृष्टि थे तो भी कहते थे कि मैं सीता और लक्ष्मण के विना जीवित नहीं रह सकता, सीता की दीक्षा के बाद और लक्ष्मण की मृत्यु के बाद भी राम जीवित रहे, जैसे भारतीय रेल को अपनी सम्पत्ति कहता है लेकिन मानता नहीं, माता-पिता को अपने कहता है पर मानता नहीं, यदि कोई अपने या पड़ोसी के मां-बाप को मार डाले तो भी धारा 302 का केस बनता है।
अनासक्ति
जल तें भिन्न कमल है, नगरनारी को प्यार यथा कादे में हेम अमल है' जैसे धाय पुत्र को अपना नहीं मानती है, मुनीम धन को अपना नहीं मानता, इसी प्रकार सम्यग्दृष्टि पर पदार्थ को अपना नहीं मानता है।
अनासक्ति
सप्त धातु की मात्रा- मनुष्य के शरीर में दुर्गन्ध मज्जा से भरी तीन सौ हड्डियाँ होती हैं, सम्पूर्ण शरीर में तीन सौ सन्धि, नौ सौ स्नायु, सात सौ शिराएं, पाँच सौ मांसपेशियाँ, चार शिराओं के जाल, सोलह रक्त से पूर्ण 'महाशिराएँ', छ: शिराओं के मूल हैं, दो माँस रज्जू जो एक पीठ और एक पेट के आश्रित हैं, सातत्वचाएँ, सातकालेचक, 'अस्सीलाख करोड़ रोम', पक्वाशय और आमाशय में सोलह आँते, दुर्गन्धित मल के सात आशय, तीनस्थूण, एक सौ सात मर्म स्थान, नौमल द्वार जिनसे नित्य मल बहता है, स्वयं के एक अञ्जुलि प्रमाण मस्तक, एक अञ्जुलि प्रमाण मेद, एक अञ्जुलि प्रमाण वीर्य, एकअञ्जुलि प्रमाण ओज (शुक्र), तीन अञ्जुलि प्रमाण बसा, छ: अञ्जुलि प्रमाण पित्त, छ: अञ्जुलि प्रमाण कफ, आधा आठक प्रमाण खून, एकआठक प्रमाण मूत्र, छ: प्रस्थ प्रमाण विष्ठा, बीस नख, बत्तीस दाँत, जैसे घाव में कीड़े भरे रहते हैं वैसे ही शरीर बहुत से कीड़ों से भरा है इस प्रकार शरीर के सभी अवयव अशुभ पुद्गल रुप हैं एक भी अवयव ऐसा नहीं है जो पवित्र और सुन्दर हो।
अनासक्ति
सौधर्मेन्द्र अपनी सभा को सम्बोधित करते हुये ऐसे भाव विभोर हो जाते हैं, कि देखों हमारे पास रत्नत्रय धारण करने की योग्यता ही नहीं है, देव कहते हैं कि हे सुरेश्वर! मनुष्य बनकर रत्नत्रय धारण कर सकते हैं, तब इन्द्र ने कहा जो मनुष्य बन जाता है, उनको कल्याण करने की भावना ही नहीं होती है, पृथ्वी पर ब्रह्मलोक से गये रामचन्द्रजी कैसे राग में फँसे हुये हैं, अभी तक कल्याण की भावना ही नहीं हो रही, उनको राज्य और रानियों से मोह नहीं, किन्तु लक्ष्मण जी से अधिक मोह है, इस बात को सुनकर देव उनके स्नेह की परीक्षा करने आये, लक्ष्मणजी से मिले और कहा रामचन्द्रजी मर गये, यह सुनते ही लक्ष्मण जी की मृत्यु हो गयी।
अनासक्ति
गति, शरीर, परिग्रह अभिमान दुःख के कारण हैं, और कम गमन-आगमन, शरीर के प्रति कम राग, कम परिग्रह और कम अहङ्कार ये सुख के कारण हैं।
अनासक्ति
इन्दौर की एक मारूति जङ्गल में पकड़ी जाने वाली थी, उन्होंने देखा खतरा है इसलिये गाड़ी छोड़कर बाहर घूमने लगे, पुलिस ने पूँछा ये गाड़ी किसकी है, उन्होंने कहा हमारी नहीं हैं, तो खतरा से बच गये, इसी प्रकार हाट-हवेली हमारे नहीं हैं ऐसा मानेंगे तो कर्मबन्ध से बच जायेंगे।
अनासक्ति
एक स्त्री पुत्रादि का राग, दूसरा पञ्च परमेष्ठी का राग, किसको छोड़ना? एक बुद्धि पूर्वक छोड़ना, दूसरा छूट जाएगा, एक आग है, दूसरा शीतल छाया है, एक का राग नरक तक ले जा सकता है सुभौम चक्रवर्ती की तरह और दूसरा सर्वार्थसिद्धि तक ले जा सकता है नकुल, सहदेव की तरह।
अनासक्ति
बड़े-बड़े धनपति मरकर अपने ही गोदामों में चूहा बन जाते हैं, अपने ही सेप्टिक टैंक के कीड़ा बन जाते हैं, अतः परिणमों को सम्भालना चाहिए।
अनासक्ति
एक व्यक्ति को पुत्र नहीं हो रहा था, ज्योतिषी ने कहा जब तुम बारह वर्ष का प्रवास करोगे, तो तुम्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हो जायेगी, वह विदेश गया, यहाँ पुत्र भी ग्यारह वर्ष का हो गया, पिता को कभी देखा नहीं था, फोटो देखकर स्टेशन पर लेने गया, बहुत ठण्ड थी वह बालक पिता की प्रतीक्षा में बैठा रहा, ठण्ड में चिल्लाता रहा, अपरिचित होने से अपने रूम से उसको बाहर निकाल दिया, ठण्ड के कारण मर गया, सुबह घर जाकर पता किया बेटा कहाँ है, पत्नी ने कहा! वह तो आप को लेने गया था, पता चला मेरा ही बेटा था, मैंने ही कमरे से निकाल दिया था, यह जगत का स्वभाव है।
अनासक्ति