Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
अनासक्ति

सौधर्मेन्द्र अपनी सभा को सम्बोधित करते हुये ऐसे भाव विभोर हो जाते हैं, कि देखों हमारे पास रत्नत्रय धारण करने की योग्यता ही नहीं है, देव कहते हैं कि हे सुरेश्वर! मनुष्य बनकर रत्नत्रय धारण कर सकते हैं, तब इन्द्र ने कहा जो मनुष्य बन जाता है, उनको कल्याण करने की भावना ही नहीं होती है, पृथ्वी पर ब्रह्मलोक से गये रामचन्द्रजी कैसे राग में फँसे हुये हैं, अभी तक कल्याण की भावना ही नहीं हो रही, उनको राज्य और रानियों से मोह नहीं, किन्तु लक्ष्मण जी से अधिक मोह है, इस बात को सुनकर देव उनके स्नेह की परीक्षा करने आये, लक्ष्मणजी से मिले और कहा रामचन्द्रजी मर गये, यह सुनते ही लक्ष्मण जी की मृत्यु हो गयी।

Saudharmendra, addressing his assembly, becomes overwhelmed with emotion saying we do not even have the fitness to hold the three jewels. The gods say, O lord of gods, one who becomes human can hold the three jewels. Then Indra said, those who become human have no urge for self-welfare at all; see how Ramachandra, who came from Brahmaloka to earth, is entangled in attachment, with no thought yet of his welfare; he has no delusion for kingdom or queens, but has great attachment to Lakshman. Hearing this, gods came to test his affection, met Lakshman and said Ramachandra has died; hearing this Lakshman at once died.

— आराध्य सूत्र · #2

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किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति