Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
अनासक्ति

यह राग आग दहे सदा- शक्कर के पहाड़ की चींटी ने नमक के पहाड़ की चींटी का निमन्त्रण किया, मुँह में नमक की डली दबाकर शक्कर के पहाड़ पर आई, इसलिए उसे शक्कर का आनन्द नहीं आ रहा था, इसी तरह वैराग्य में राग रूपी नमक हो तो वैराग्य का आनन्द नहीं आता है, ये विषय सम्बन्धी रागादि काले नाग की तरह हैं, जैसे कमरे में सर्प हो तो नींद नहीं आती है, उसी तरह राग की आग दहे तो नींद नहीं आती है।

This fire of attachment ever burns: an ant from the mountain of sugar invited an ant from the mountain of salt; she came to the sugar mountain with a lump of salt clenched in her mouth, and so could taste no sweetness. In the same way, if there is the salt of attachment in one's dispassion, one tastes no joy of dispassion. Such sensual attachments are like a black cobra: as one cannot sleep with a serpent in the room, so one cannot sleep while the fire of attachment burns.

— आराध्य सूत्र · #4

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किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति