Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Attachment & Detachment

अनासक्ति

630 सूत्र · पृष्ठ 9 / 9

भारत में हजारों ट्रेनें चल रही हैं, यदि हमारा त्याग नहीं हैं तो हमें आरम्भ का दोष लग रहा है, इसलिए आज हम वाहन का प्रयोग नहीं करेंगे, ऐसा नियम कर लेना चाहिये, कपड़ों का, नल के पानी का और गृहस्थी सम्बन्धी अनावश्यक कार्यों का त्याग करने से पाप से बच जाते हैं।
अनासक्ति
'मूर्च्छा परिग्रहः'- यह निर्दोष लक्षण है, यदि बहिरङ्ग पदार्थों को परिग्रह का लक्षण बनावेंगे तो पशु निष्परिग्रही हो जायेंगे और तीर्थंकर आदि भी परिग्रही हो जायेंगे।
अनासक्ति
अगर कर्म बन्ध से बचना है तो घर को आश्रम बनाकर अतिथि की तरह रहो और कुछ भी अपना मत मानो।
अनासक्ति
''आनयनप्रेष्यप्रयोग''-पाँच इन्द्रिय रूपी टेलीफोन तो अपने पास हमेशा रहते हैं, फिर भी टेलीफोन रखते हैं, जिससे आकुलता कई गुनी बढ़ जाती है।
अनासक्ति
संसार वृक्ष पर विचार।
अनासक्ति
मोह राजा है और मोहजन्य भाव आठों कर्मों के बन्ध के कारण हैं।
अनासक्ति
पर द्रव्य का ग्रहण स्वात्मोपलब्धि का विरोधी है, ''जिसके प्रमाद का लेश भी नहीं रहता वह साधु अवश्य ही मोक्षमार्ग का आराधक होता है''।
अनासक्ति
गाय मोह से बँधी है रस्सी से नहीं, इसीलिये जङ्गल में बहुत दूर जाकर भी वापस आ जाती है।
अनासक्ति
जब तक तिली में तैल रहता है, तब तक पेली जाती है, गन्ने में जब तक रस रहता है, तब तक पेला जाता है, उसी तरह प्राणी में जब तक स्नेह रहता है तब तक संसार में भटकता है।
अनासक्ति
मुनीम, धाय या तोता की वृत्ति होना चाहिए, ये हमेशा विरक्त रहते हैं।
अनासक्ति
बँधे हुये बछड़े को छूटने का सुख, बच्चों को विद्यालय से छुट्टी का सुख, कैदी को जैल से मुक्ति का सुख और सिद्धों को शरीर से छूटने का सुख प्राप्त होता है।
अनासक्ति
पुष्पडाल मुनि ने दीक्षा लेकर बारह वर्ष तक साधना की, लेकिन स्त्री का मोह नहीं छूटा, किन्तु वे ही बाद में घोर तप कर जम्बूस्वामी बने, महावैरागी बने और केवलज्ञान प्राप्त कर मोक्ष चले गए।
अनासक्ति
रामचन्द्र जी का मोह हटा तो लक्ष्मण के मृत शरीर को छोड़ने में देर नहीं लगी, शत्रुघ्न से कहा! भैया राज्य सम्भालो, शत्रुघ्न ने कहा जो राज का लोभी हो उसे दो, मैं तो मुनि बनूँगा।
अनासक्ति
विषयासक्त मनुष्य के मनुष्यता, विद्वत्ता, कुलीनता एवं सत्यवचन आदि कौन से गुण नष्ट नहीं हो जाते हैं?
अनासक्ति
नीलाञ्जना की मृत्यु से वैराग्य हुआ था, पञ्चमुष्ठि केशलोंच कर दिगम्बर बने थे, साथ में चार हजार राजा दीक्षित हुये थे।
अनासक्ति
दिगम्बरत्व कोई वेश नहीं है, इसमें सब कुछ छोड़ना होता है, भीतर से भी और बाहर से भी, प्रकृति प्रदत्त वीतराग रूप है। अन्य धर्मों के लोग ओढ़ते हैं, जिन धर्म के लोग छोड़ते हैं।
अनासक्ति
अरि-मित्र महल-मसान कञ्चन-काँच निन्दन-थुतिकरण। अर्घावतारन असि प्रहारन में सदा समता धरन।।
अनासक्ति
प्रसूति गृह में किया संकल्प- प्रसूति की पीढ़ा से स्त्री को भोगों से वैराग्य होता है उस काल में भोगों के त्याग का सोचती है पर बाद में भूल जाती है।
अनासक्ति
आचार्यश्री से पूँछा विधवा विवाह होना चाहिए या नहीं, आचार्यश्री ने कहा मैं तो सभी विवाहों का विरोधी हूँ।
अनासक्ति
आचार्य श्री पक्षी की तरह आवास वाले हैं, कोई मठ, महल, कोठी अपने लिए नहीं रखते हैं।
अनासक्ति
संसार शरीर भोगों से वैरागी साधु होता है इनमें जो राग करे वह स्वादु होता है।
अनासक्ति
मोह मुक्ति का फार्मूला- सच्चाई के पत्ते एक ग्राम, ईमानदारी की जड़ तीन ग्राम, परोपकार के बीज पाँच ग्राम, सङ्गठन के बहेड़े तीन ग्राम, करुणा का छिलका ग्यारह ग्राम, मिलाप के आँवले दस ग्राम, सत्सङ्ग का रस एक ग्राम, स्वदेश प्रेम का रस पाँच ग्राम इन सब को मिलाकर, परमात्मा की हाण्डी में डालकर, भक्ति के चूल्हे पर रखकर, प्रेम की अग्नि में पकायें, अच्छी तरह पक जाने पर नीचे उतार कर ठण्डा करें, फिर शुद्ध मन के कपड़े से छानकर, मस्तिष्क की शीशी में भर लें। सेवन विधि- इस औषधि को प्रति दिन सन्तोष के गुलकन्द के साथ, इन्साफ की चम्मच से सेवन करें, परहेज- क्रोध की मिर्च, अहङ्कार का तेल, लोभ की मिठाई, धोके के पापड़, दुराचार के मसाले से बचें।
अनासक्ति
जो धूल और पसीना को ग्रहण नहीं करती, कोमल होती है, सुकमार होती है और हल्की होती है ये पाँच गुण जिसमें होते हैं वह पिच्छिका प्रशंसनीय है, जैसे मयूर पङ्ख कुछ ग्रहण नहीं करते, उसी प्रकार साधु भी कुछ ग्रहण नहीं करते हैं।
अनासक्ति
साधु न नोट, न वोट, न सपोर्ट चाहते हैं, केवल श्रावक की खोट चाहते हैं।
अनासक्ति
मयूर ऊपर उड़ने के लिये अपने प्रिय पङ्ख स्वयं छोड़ देता है, उसी प्रकार साधु भी ऊर्ध्वगमन करने के लिए प्रिय विषय भोगों को स्वयं छोड़ देते हैं।
अनासक्ति
सज्जनों के मन में पहले बुढ़ापा आता है अर्थात् सज्जन बुढ़ापा आने के पहले ही विषयों से विरक्त हो जाते हैं और शरीर में बाद में, परन्तु दुर्जनों के शरीर में बुढ़ापा पहले आता है और मन में कभी नहीं आता है। दुर्जनों के शरीर में वृद्धावस्था आने के पहले ही बुढ़ापा आ जाता है पर वे विषयों से विरक्त होते ही नहीं हैं।
अनासक्ति
परिचय, परिग्रह, परिकर, परिवार का सम्बन्ध इसी जन्म तक का है।
अनासक्ति
सबसे पहले शरीर के राग का त्याग करना चाहिए, यही मोह की जड़ है।
अनासक्ति
अब मेरे मन में नहीं है किञ्चित इच्छा, इसलिये धारण कर रहा हूँ मैं मुनि दीक्षा अर्थात् जिनके मन में सांसारिक कोई इच्छा नहीं रह जाती है वे मुनि दीक्षा लेकर आत्म कल्याण करते हैं।
अनासक्ति
पर के परिणमन को देखकर हर्ष विषाद करना संसार वृध को पानी देना है, अनन्तानन्त जीव हैं सबके परिणमन स्वतन्त्र हैं।
अनासक्ति