Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
अनासक्ति

एकाकी निष्पृहः शान्तः, पाणिपात्रो दिगम्बरः। कदाहं सम्भविष्यामि, कर्म निर्मूलनक्षमः।।

एकाकी पर पदार्थों की इच्छा से रहित, शान्त, हाथ में भोजन करने वाला, दिगम्बर, कर्मों को नष्ट करने में समर्थ कब होऊँगा ऐसी जैनेतर ऋषि भी भावना भाते हैं।

'When shall I become solitary, free of desire for external things, tranquil, eating from my own hands, sky-clad, and capable of destroying karmas?' — even non-Jain sages cultivate such a longing.

— आराध्य सूत्र · #24

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किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति