Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
अनासक्ति

छिपकली, कुत्ता, बिल्ली, चूहा, जिन घरों में रहते हैं वे उसे अपना मानते हैं, और जमादार (मेहतर) भी जितने घरों की सफाई करता है, उन्हें अपने कहता है और हम भी उसे अपना घर मानते हैं, तो हमारी सोच भी कुत्ते आदि की तरह हुई, तथा शर्माजी का कुत्ता वर्माजी के कुत्ते से बोला कि मैं गाड़ी खींच रहा हूँ, पर उसे नहीं मालूम की गाड़ी खींचने वाला कोई और है, इसी प्रकार अज्ञानी प्राणी घर, परिवार आदि का कर्ता अपने को मानता है, पर उसे नहीं मालूम कि सबका अपना-अपना भाग्य और पुरुषार्थ होता है।

A lizard, dog, cat or mouse regards whatever house it lives in as its own; and the sweeper too calls the houses he cleans his own, while we also call it our house - so our thinking is like the dog's. Sharma's dog said to Verma's dog, "I am pulling the cart," not knowing that someone else pulls the cart. In the same way the ignorant being thinks himself the doer of home and family, not knowing that everyone has his own destiny and effort.

— आराध्य सूत्र · #2

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किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति