Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
अनासक्ति

मैं एकाकी एकत्व लिये, एकत्व लिये सब ही आते, तन धन को साथी समझा था पर वे भी छोड़ चले जाते। मेरे न हुये ये मैं इनसे अति भिन्न अखण्ड निराला हूँ, निज में पर से अन्यत्व लिए मैं सम रस पीने वाला हूँ।

I am alone, holding oneness; all come holding their own oneness. I thought body and wealth were my companions, but they too leave and depart. They were never mine; I am utterly distinct from them - whole and apart. Holding my otherness from all else within myself, I am the drinker of the nectar of equanimity.

— आराध्य सूत्र · #19

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किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति