Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
अनासक्ति

स्नेह रहित मनुष्य निर्वाण को प्राप्त होता है तथा स्नेह अनर्थ का कारण है, यह रहस्य स्नेह (तैल) रहित दीपक ने प्रकट किया है, भावार्थ- जब तक दीपक में तैल रुपी स्नेह रहता है तब तक उसे जलना पड़ता है और जब तैल रुपी स्नेह समाप्त हो जाता है तब वह निर्वाण को प्राप्त हो जाता है (बुझ जाता है), इसी प्रकार संसारी प्राणी स्नेह-प्रीति के कारण निरन्तर आकुलता में पड़कर दुःखी रहते हैं और प्रीति का त्याग करने वाले मुनिराज निर्वाण को प्राप्त होते हैं।

A person free of attachment attains nirvana, for attachment is the cause of ruin - a secret revealed by the oil-less lamp. The sense is: as long as there is oil (attachment) in the lamp it must keep burning, and when the oil (attachment) is spent it attains nirvana (is extinguished). Likewise worldly beings, through attachment and affection, remain forever restless and miserable, while the munis who renounce affection attain nirvana.

— आराध्य सूत्र · #1

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किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति