Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
अनासक्ति

वपुर्गृहं धनं दाराः, पुत्राः मित्राणि शत्रवः। सर्वथान्यस्वाभावानि, मूढः स्वानि प्रपद्यते।।

शरीर, घर, धन, स्त्री, पुत्र, मित्र और शत्रु सभी भिन्न स्वभाव वाले हैं फिर भी अज्ञानी मोही इन्हें अपने मानता है।

Body, home, wealth, wife, sons, friends and foes are all of a nature separate from oneself, yet the ignorant, deluded one takes them as his own.

— आराध्य सूत्र · #39

इसी विषय के और सूत्र

सभी अनासक्ति →
किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति