Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
अनासक्ति

परमात्मा के दर्शन- शिष्य ने गुरू से कहा 'गुरू चरणों में रहते वर्षों बीत गये किन्तु परमात्मा के दर्शन नहीं हुए' गुरू ने कहा! चलो आज उस पहाड़ी पर इन पत्थरों को लेकर परमात्मा का दर्शन करायेगें ।गुरू पहाड़ी पर पहुँच गये, किन्तु पत्थर के बोझ से शिष्य पीछे रह गया, बोझ से थक कर एक-एक पत्थर फेकना शुरू कर दिया, पहाड़ तक जाते-जाते सारे पत्थर फेंक दिये, ऊपर जाकर जब गुरू से मिले तब गुरु ने पूँछा, पत्थर कहाँ हैं? शिष्य ने कहा पत्थर के बोझ से चल नहीं पा रहे थे, इसलिये फेंक दिये, तब गुरू ने कहा बाहरी बोझ की अपेक्षा अन्दर का बोझ कम करो, अर्थात् क्रोध, मानादि पत्थरों को जिस दिन फेंक दोगे उस दिन परमात्मा के दर्शन हो जायेंगे।

Vision of God: A disciple told his guru, "Years have passed at your feet, yet I have not seen God." The guru said, "Come, carry these stones up that hill today and I will grant you a vision of God." The guru reached the top, but the disciple lagged behind under the weight of the stones; exhausted, he began throwing them away one by one, and by the time he reached the hill he had thrown them all. When he met the guru above, the guru asked, "Where are the stones?" The disciple said, "I could not walk under their weight, so I threw them away." The guru said, "Rather than the outer burden, lessen the inner one - the day you throw away the stones of anger and pride, that day you will see God."

— आराध्य सूत्र · #5

इसी विषय के और सूत्र

सभी अनासक्ति →
किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति