जह णाम को वि पुरिसो, पर दव्व मिणन्ति जाणिदुं चयदि। तह सव्वे पर भावे, णाऊण विमुंचदे णाणी।।
जैसे लोक में कोई पुरुष पर वस्तु को 'यह पर वस्तु है' ऐसा जानकर छोड़ देता है, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष समस्त परद्रव्यों के भावों को परभाव जानकार छोड़ देता है।
As a man in the world, knowing 'this is another's property', gives it up, so the wise one, knowing all the states of external substances to be other than himself, abandons them.
— आराध्य सूत्र · #21
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