Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
अनासक्ति

अपनेपन से दुःख- सेठजी ने बहुत बढ़िया मकान शहर के बीच में बनाया, अचानक आग लग गयी, धूँ-धूँ कर मकान जल रहा था, सेठ सीना पीट-पीट कर रो रहा था, कि इतने में बड़ा लड़का आया और बोला! पिताजी क्यों रो रहे हो? यह मकान कल बिक गया था बयाना हो गया है, अब भी मकान जल रहा था, पर अब सेठ दर्शक के समान देख रहा था, छोटा लड़का आया और बोला पिताजी! खड़े-खड़े क्या देख रहे हो, आग बुझाओ पिताजी ने कहा, चिन्ता नहीं करो मकान बिक गया है, बेटा बोला सौदा केंसल हो गया है अब सेठ का पुनः रोना-धोना चालू हो गया, वास्तव में अपना पन ही दुःख का कारण है।

Sorrow from the sense of "mine": A merchant built a fine house in the middle of the city; suddenly it caught fire and blazed up, and he wept, beating his chest. Just then his elder son came and said, "Father, why do you weep? This house was sold yesterday and the deposit is taken." Though the house was still burning, the merchant now watched like a spectator. The younger son came and said, "Father, why do you stand watching - put out the fire!" The father said, "Do not worry, the house is sold." The son said, "The deal has been cancelled." At once the merchant began weeping again. Truly, the sense of "mine" itself is the cause of sorrow.

— आराध्य सूत्र · #29

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किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति