Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Attachment & Detachment

अनासक्ति

630 सूत्र · पृष्ठ 7 / 9

मनोहर मित्र, स्त्री आदि सभी संयोगज सम्बन्ध हैं, एक रत्नत्रय ही पवित्र है, ऐसा मानना निर्वेद कहलाता है।
अनासक्ति
राम को राज्य नहीं मिला तो हर्ष-विषाद नहीं किया, उस समय ज्ञानी थे, जब सीता का हरण हुआ और लक्ष्मण को शक्ति लगी, तो रो रहे थे, तब वे अज्ञानी थे।
अनासक्ति
कषाय और इन्द्रियासक्ति इस संसार की जड़ है और इस जड़ की भी जड़ है मिथ्यादर्शन।
अनासक्ति
जैसे कुम्हार के चक्र पर रखी मिट्टी घूमती है वैसे ही जीव मोह पिशाच के द्वारा कोल्हू के बैल की तरह निरन्तर चिन्तातुर होकर घूमते हैं।
अनासक्ति
इस लोक में वैभव आदि, परलोक में चक्रवर्ती का वैभव एवं एकान्तवाद से दूषित परमत की इच्छा नहीं करना निःकाङ्क्षित अङ्ग है।
अनासक्ति
पराधीन, बाधासहित, जिसकी परम्परा टूट जाती है एवं बन्ध का कारण हीनाधिक प्राप्त होने वाला इन्द्रिय विषय जन्य सुख ‘दुःख’ ही है ऐसी श्रद्धा होना निःकाङ्क्षित अङ्ग है।
अनासक्ति
इन्द्रियों के द्वारा प्राप्त होने वाला सुख पराधीन, बाधा सहित, अनियमित, बन्ध का कारण व हीनाधिक एवं दुःख रूप ही है।
अनासक्ति
भोग अभिलाषा से पर भव में इष्ट पदार्थों का संयोग होना तो दूर, किन्तु इसलोक सम्बन्धी स्वार्थ की सिद्धि भी नहीं होती है।
अनासक्ति
एक आचार्य के दो शिष्य थे, एक ने वेश्या के बगीचे में चातुर्मास करने की आज्ञा ली, दूसरे ने शेर की गुफा में बैठकर चतुर्मास की आज्ञा ली, चतुर्मास के बाद जिन्होंने वेश्या के बगीचे में चातुर्मास किया, गुरु ने उनको विशेष आशीर्वाद दिया, शेर की गुफा वाले मुनि ने अगला चातुर्मास वेश्या के बगीचे में माँगा, गुरू ने रोका तो भी नहीं माने, वेश्या का राग सुनकर वे विचलित हो गये, वेश्या से अपनी भावना प्रकट की, वेश्या ने रत्नकम्बल की माँग की, साधु बारह वर्ष का कठोर परिश्रम करके रत्नकम्बल लाये और वेश्या को दे दिया, वेश्या ने पैर पोंछकर उसे नाली में फेंक दिया, साधु चकित हो गये, पूँछने पर वेश्या ने कहा जिस प्रकार आपने अपने कीमती संयम को खो दिया, वह रत्नकम्बल को फैकने के ही समान है, ऐसा कहकर वेश्या ने साधु का स्थितिकरण किया था।
अनासक्ति
स्वार्थ समस्त दुर्गुणों की जड़ है, पृथ्वी पर जितने बड़े-बड़े युद्ध हुए हैं उनका मूल कारण स्वार्थ था, स्वार्थ व्यक्ति को परमार्थ से विमुख कर देता है।
अनासक्ति
दिखाई देने वाला अचेतन है, और जो चेतन है वह दिखता नहीं है, अतः किसी से राग-द्वेष न करके मैं मध्यस्थ होता हूँ।
अनासक्ति
अभिमान द्रव्य का नहीं पर्याय का होता है, किन्तु पर्याय तो नश्वर होती है।
अनासक्ति
कञ्चन तजना सहज है, सहज त्रिया का नेह। मान बढ़ाई ईर्ष्या दुर्लभ तजनी जेह।।
अनासक्ति
इक लख पूत सवा लख नाती। ता रावण घर दिया न बाति।।
अनासक्ति
हमारे हाथ अर्थी के बाहर कर देना- बड़े-बड़े राजा महाराजाओं को भी धर्म की शरण लेना पड़ती है। जब सम्राट सिकन्दर दक्षिण भारत की यात्रा पर आने लगा, तब अपनी माँ से आशीर्वाद लेकर निकला और माँ से कहता है, हे माता श्री! आपकी कोई इच्छा तो नहीं है? माँ ने कहा बेटा अपने देश में दिगम्बर साधुओं के दर्शन दुर्लभ हैं, इसलिये तुम भारत से दिगम्बर साधु को जरूर लाना। सिकन्दर अपनी यात्रा पूर्ण होने के बाद जब स्वदेश को लौटने लगा तो माँ की बात याद आयी, तब सिकन्दर ने अपने डेरे से एक दूत को दिगम्बर साधु के पास भेजा। दूत ने कहा महाराज हमारे सम्राट ने आपको बुलाया है, मुनि ने कहा हे पथिक! ये बताओ प्यासा कुंए के पास जाता है या कुंआ प्यासे के पास जाता है? मुनिराज के वचन सुनकर दूत सिकन्दर के पास वापस जाता है, और समाचार सिकन्दर को देता है। सिकन्दर शर्मिन्दा होता हुआ मुनि के पास जाकर सविनय निवेदन करता है, हे भगवन्! आप हमारे राज्य को पवित्र करने का कष्ट करें। मुनि ने चलने का मानस बना लिया, किन्तु मुनिराज ने निमित्त ज्ञान से ये जान लिया कि सिकन्दर का जीवन मात्र अन्तर्मुहूर्त का है। सिकन्दर अपने जीवन का अन्त समय सुनकर दुःखी होकर बोला भगवन्! मुझे बचा लिजिये। महाराज ने कहा हे राजन! मणी मन्त्र तन्त्र बहु होई मरते न बचावे कोई। सिकन्दर ने मन्त्री से कहा चाहे मेरा कोई आधा राज्य लेले, पर मुझे बचाले, बहुत ही प्रयास किया लेकिन जब कोई नहीं मिला, तो सिकन्दर कहता है जब मेरी अर्थी निकाली जाय, तब मेरे दोनों हाथ अर्थी के बाहर निकाल देना, ताकि लोगों को ये पता चल सके, कि जिस सिकन्दर ने सारी उम्र बहुत धन लूटा पर अन्तिम समय हाँथ खाली थे। सभी सङ्ग में दौलत, सभी हाली हवाली थे। सिकन्दर जब गया दुनिया से, दोनों हाथ खाली थे।।
अनासक्ति
संसार में कार्य के लिए कोई किसी की सेवा करता है परमार्थ से कोई किसी का प्रिय नहीं है, दूध का क्षय देखकर बछड़ा स्वयं ही माता को छोड़ देता है।
अनासक्ति
1.भोग में रोग का भय है, 2.सुख में क्षय का भय है, 3.धन में अग्नि और राजा का भय है, 4.दास में स्वामी का भय है, 5.विजय में शत्रु का भय है, 6.कुल में कुलटा स्त्री का भय है, 7.प्रतिष्ठा में अपयश का भय है, 8.गुणों में दुर्जन का भय है और 9.शरीर में यमराज का भय है, इस प्रकार सभी वस्तुओं में भय है, परन्तु 10.आश्चर्य है कि वैराग्य भय से रहित है।
अनासक्ति
सब अपने लिये रोते हैं।
अनासक्ति
पैदा हुये व्यापार सीखा, धन कमा बूढ़े हुये। बन्धुजन को छोड़कर धन, इस जगत से चल दिये।।
अनासक्ति
राम के भाई भरत ने खड़ाऊ रखकर राज्य किया था।
अनासक्ति
राग–द्वेष खून–मांस से भी अपवित्र है, क्योंकि खून–मांस के रहते केवलज्ञान हो जाता है, पर राग–द्वेष के रहते नहीं हो सकता है।
अनासक्ति
शरीर को सजाने का प्रयत्न तो मल भरे मटके को फूलों से सजाने का प्रयत्न जैसा है।
अनासक्ति
ये शरीर कितना अपवित्र है, कितना भी 'नहाओ, इत्र लगाओ' कुछ घण्टों में ज्यों का त्यों मैला और बदबूदार हो जाता है, लोग फिर भी शरीर से राग करते हैं।
अनासक्ति
यश की इच्छा से दान या खाने–खिलाने वालों को लोग निर्लोभी समझ लेते हैं पर यश, रूप, नाम, काम की इच्छा भी लोभ है।
अनासक्ति
नाम के लोभी कहते हैं एक दिन मरना है, कुछ करके जाओ तो नाम अमर रहेगा, आत्मा को विनाशीक और नाम को अमर समझता है, जबकि एक नाम के अनेक लोग होते हैं।
अनासक्ति
जिसके श्रृङ्गारों में मेरा यह महँगा जीवन घुल जाता। अत्यन्त अशुचि जड़ काया से इस चेतन का कैसा नाता।।
अनासक्ति
केशर चन्दन पुष्प सुगन्धित वस्तु देख सारी। देह परसतें होए अपावन निश दिन मल जारी।।
अनासक्ति
आनन्द दायक मोक्ष को छोड़कर कष्टकारी सांसारिक विभूति को जो स्वीकार करते हैं, वे चन्दन युक्त जल को छोड़कर कीचड़ युक्त जल को पीते हैं।
अनासक्ति
परिग्रह से विषयों की इच्छा, उससे क्रोध, क्रोध से हिंसा, हिंसा से पाप, पाप से नरक, नरक में वचनातीत कष्ट प्राप्त होते हैं।
अनासक्ति
जवानी का लोभ– लड़का गड्ढे में गिर गया, निकलते नहीं बन रहा था, एक बुड्ढे से कहा कि इस गड्ढे का बड़ा चमत्कार है, जो यहाँ आता है वह जवान हो जाता है, बुड्ढा कूद गया, लड़का उसके कन्धे पर बैठकर बाहर आ गया और बोला आप जवान होते रहिए, इसी तरह ज्ञानी संसार की दशा देखकर निकलता है और अज्ञानी संसार रूपी गड्ढे में पड़ जाता है।
अनासक्ति
आगे-आगे पति जा रहा था और पीछे-पीछे उसकी पत्नी, रास्ते में सोने की मोहरें मिलीं, पति ने उस पर धूल डाल दी, ताकि पत्नी का मन न बिगड़ जाये, पीछे से आ रही पत्नी ने कहा क्या कर रहे हो, क्यों मिट्टी पर मिट्टी डाल रहे हो, अर्थात् पत्नी पति से ज्यादा निरीह थी क्योंकि उसकी दृष्टि में सोने और मिट्टी में भेद नहीं था।
अनासक्ति
पञ्चेन्द्रिय के चेतन विषय का राग और अचेतन पदार्थ के राग को लोभ कहा जाता है, शुभ राग को उदात्त प्रेम या वात्सल्य आदि नाम देते हैं।
अनासक्ति
स्वारथ का संसार- बड़ा लड़का जङ्गल में निकलने वालों को लूटकर धन लाता था और घर चलाता था, एक दिन किसी बाबा को लूटने लगा, बाबा ने कहा संसार स्वार्थी है, क्यों मोह के वश हो पाप कमाकर दुर्गति में जाते हो, वह बोला हमारा सारा परिवार हमसे बहुत प्यार करता है, मेरा जहाँ पसीना गिरता है वहाँ सभी लोग खून बहाने को तैयार रहते हैं, बाबा ने कहा एक बार उनके सच्चे प्यार की परीक्षा कर लो, बाबा के कहे अनुसार घर जाकर बहाना बना कर लेट गया और जोर–जोर से कराहने लगा, बाबा वैद्य का भेष धारण करके आया और बोला मेरे पास मरे को जिन्दा करने की दवा है, लेकिन जो इसे पियेगा वो मर जायेगा और यह जिन्दा हो जायेगा, अभी तक जो विना उसके जीवित रहने को तैयार नहीं थे, रो रहे थे, अब वे सभी कहने लगे, हम स्वयं कमा कर खायेंगे, यहाँ तक कि माँ ने भी कह दिया कि हम समझ लेंगे कि हमारे छह ही बेटे हैं, वैद्य ने कहा इस दवा को हम पी लें? सबने कहा बड़ी कृपा होगी, स्वार्थी संसार देखकर उसको संसार से वैराग्य हो गया, सोचने लगा स्वार्थियों के लिये पाप करके हम दुर्गति में क्यों जायें और वह आत्म कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ गया।
अनासक्ति
स्वामित्व बुद्धि- यह संस्था, परिवार, समाज, देश मेरे विना नहीं चलेगा, ऐसा कहते हुये कई चले गये, संस्था वहीं खड़ी हैं, ज्यों की त्यों चल रहीं हैं, उनकी रक्षा कौन करता है?
अनासक्ति
संसारिक सुख पर पदार्थ के आलम्बन से होता है, पर आनन्द स्वाधीनता में है।
अनासक्ति
सुकमाल स्वामी को असंयमी दशा में राई का दाना चुभता था, वैराग्य होने पर स्यालनी के दाँत नहीं चुभ रहे थे, क्योंकि वैराग्य से सहनशीलता आती है।
अनासक्ति
शुभचन्द्र और भर्तृहरि–राजा सिंहल के शुभचन्द्र और भर्तृहरि दो पुत्र हुए, 'राज समाज महा अघ कारण बैर बढावन हारा' अर्थात् राज और समाज को बैर एवं पाप का कारण जानकर दोनों विरक्त हो गये, एवं शुभचन्द्र जी ने वन में जाकर एक मुनिराज के निकट मुनि दीक्षा ले ली एवं घोर तप करना प्रारम्भ कर दिया, एवं भर्तृहरि पञ्चाग्नि तप करने वाले तापस का चेला बन गया, बारह वर्ष रहकर भर्तृहरि बहुत सी विद्या, तन्त्र, मन्त्र, यन्त्र, सीखकर जब जाने लगा, तब योगी ने एक सतविद्या और रसतुम्बी दी जिससे ताम्बा स्वर्ण बन जाता था, कुछ दिनों में भर्तृहरि के सैकड़ों शिष्य हो गये, और तन-मन से सेवा करने लगे, एक दिन उन्हें अपने भाई शुभचन्द्र की याद आई, वे कहाँ रहते हैं, और किस प्रकार हैं, और पता लगाने एक शिष्य को भेजा, जाकर देखा तो न कोई खाने की व्यवस्था है, न तन पर एक लङ्गोटी, सुन कर भर्तृहरि को बहुत दुःख हुआ, और शिष्य के हाँथ आधा तुम्बी रस भेजा, शुभचन्द्र जी ने कहा की पत्थर पर डाल दो, यह सुनकर भर्तृहरि को बहुत दुःख हुआ, और स्वयं आधा तुम्बी रस लेकर भाई से मिलने चले गये, प्रणाम करके रस तुम्बी भेंट की, शुभचन्द्र जी ने उसे पत्थर पर फेंक दिया, देख कर भर्तृहरि को दुःख हुआ, और कहा की आपने मेरी बारह वर्ष की कमाई नष्ट कर दी, आपने अभी तक क्या प्राप्त किया है? दिखाइये, तब शुभचन्द्र जी ने पैर के नीचे की थोड़ी सी धूल उठा कर शिला पर डाल दी, तो शिला स्वर्णमय हो गयी, भर्तृहरि अवाक् हो गए और चरणों में गिरकर दीक्षा की प्रार्थना की, तब शुभचन्द्र जी ने विस्तृत धर्मोपदेश देकर उनके हृदय के कपाट खोल दिए, भर्तृहरि को दीक्षित करके योग का अध्ययन कराने के लिए ज्ञानार्णव ग्रन्थ की रचना की।
अनासक्ति
वज्रदन्त चक्रवर्ती–वज्रदन्त चक्रवर्ती को माली ने सहस्रदल कमल भेंट किया, उसके अन्दर भौंरा मरा पड़ा था, देखकर सोचने लगे ओ हो! घ्राण इन्द्रिय के वशीभूत होकर मर गया। इससे चक्रवर्ती को वैराग्य हो गया, बड़े बेटे से कहा कि राज सम्भालो हम दीक्षा लेंगे, बेटा कहता है पिताजी राज अच्छा है या बुरा यदि अच्छा है तो आप क्यों छोड़ रहे हो, बुरा है तो प्यारे बेटे को क्यों दे रहे हो, हजार बेटों में से किसी ने भी राज नही लिया। गर्भस्थ शिशु को राज देकर सभी ने दीक्षा ले ली।
अनासक्ति
प्रद्युम्न का वैराग्य– द्वारकाधीश कृष्णजी ने नेमिनाथ भगवान् से पूँछा, भगवन्! ये द्वारका नगरी क्या हमेशा ऐसी ही हरी-भरी बनी रहेगी? भगवान् ने कहा हे कृष्ण! बारह वर्ष के बाद इस नगरी का द्वीपायन के द्वारा विनाश हो जायेगा, सुनकर बहुत लोगों ने दीक्षा ले ली, प्रद्युम्नजी को भी वैराग्य हो गया, प्रद्युम्नजी वसुदेव से आज्ञा लेने जाते हैं, वे कहते है बेटा! अभी तुम्हारे भोग भोगने के दिन हैं न कि वैराग्य धारण करने के, प्रद्युम्नजी ने कहा आप तो संसार के स्तम्भ बने रहो, मैं तो दीक्षा लेता हूँ, स्त्री से कहा प्रिय! मैं दीक्षा लेने जाता हूँ, स्त्री कहती है वैरागी ने प्रिय सम्बोधन कैसे किया? आप लो या न लो मैं तो दीक्षा लेने जाती हूँ, और प्रद्युम्न से पहले उनकी पत्नी दीक्षित हो गयी।
अनासक्ति
इस लोक में 'आहार, भय, मैथुन और परिग्रह' संज्ञाओं से बाधित होकर जीव तीव्र दुःख पाता है और उनका सेवन करता है तो दोनों लोकों में दुःख पाता है।
अनासक्ति
चक्रवर्ती, असुरेन्द्र और सुरेन्द्र स्वाभाविक इन्द्रियों से पीड़ित होते हुए, उस दुःख को सहन न कर सकने से रम्य विषयों में रमण करते हैं।
अनासक्ति
जिन्हें विषयों में रति है उन्हें दुःख स्वाभाविक जानो, क्योंकि यदि वह दुःख स्वाभाविक न हो तो विषयों में व्यापार न हो।
अनासक्ति
इन्द्रिय विषयों मे आत्म हितकारी कुछ भी नहीं है फिर भी जीव अज्ञान के कारण उन्हीं विषयों में रमता है।
अनासक्ति
अन्तर विषय वासना वर्तें, बाहर लोक लाज भयकारी। ताते परम दिगम्बर मुद्रा, धर न सके दीन संसारी।।
अनासक्ति
स्पर्शन में हाथी, रसना में मछली, घ्राण में भौंरा, चक्षु में पतङ्ग, कर्ण में हिरण ये पाँचों जीव एक-एक इन्द्रिय के विषय में आसक्त होकर अपने प्राणों को खो देते हैं, फिर जो पाँचों इन्द्रियों के विषयों में आसक्त हैं उनका क्या होगा?
अनासक्ति
फुटवाल जिसके पास जाती है वही लात मारता है, इसी प्रकार जीव सुख की आशा से जिस के पास जाता है वही ठुकरा देता है।
अनासक्ति
जैसे 'मृगमरीचिका' को जल समझ कर मृग मरुस्थल में जल के लिये दौड़ लगाते हैं उसी प्रकार संसारी प्राणी पंचेन्द्रिय के विषयोंसे सुख प्राप्त करने के लिये दौड़ लगाते हैं और अन्त में प्राण गवां देते हैं।
अनासक्ति
रुद्र मुनि ग्यारहवें गुणस्थान से गिरकर विषयासक्त होकर सप्तम नरक तक में चले जाते हैं।
अनासक्ति
मुठ्ठी में पत्थर बन्द कर उसे न छोड़ने की इच्छा रखने वाले पुरूष के हाथ में हीरा कहाँ से आ सकता है, कुछ पाना है तो कुछ छोड़ना अनिवार्य हैं।
अनासक्ति
विषय वासना का चक्कर सबके लिए अहितकारी है, चाहे वे तीर्थंङ्कर भी क्यों न हों।
अनासक्ति
सांसारिक सुख तीन प्रकार का है पहला विषय सुख शहद लपेटी तलवार के सामान, दूसरा देवों का दिव्य सुख जलते हुए चन्दन की लकड़ी के सामान, तीसरा चक्रवर्ती का सुख विष मिश्रित अन्न के समान और सिद्धों का सुख आकुलता रहित होता है।
अनासक्ति
आग, वज्र, विष और सर्प से एक भव बर्बाद होता है किन्तु भोगों से अनन्त भव बर्बाद हो जाते हैं।
अनासक्ति
पाँच मिनिट सेज पर सोने में ये सजा– एक दासी ने राजा की सेज लगाई और सोचा थोड़ी देर सोकर देखूँ, इतने में राजा आ गया, उसने कोड़े लगाये वह हँसती रही, राजा के पूँछने पर उसने कहा कि पाँच मिनट की इतनी सजा तो आप को कितनी सजा मिलेगी।
अनासक्ति
भोगी रोग को प्राप्त होता है, रोगी शोक को प्राप्त होता है, शोकवान क्लेश को प्राप्त होता है इसलिए समझदार को योगी अवस्था धारण करना चाहिये।
अनासक्ति
जन-जन में वैराग्य नहीं होता, घर-घर में सज्जन नहीं होते, भव-भव में सम्यग्दर्शन नहीं होता और हमेशा बुद्धि शुद्ध नहीं होती है।
अनासक्ति
चिर काल तक स्थिर रह कर भी विषय अवश्य ही नष्ट हो जाते हैं, यदि उन्हें स्वयं छोड़ दिया जाए तो मोक्ष प्राप्त होता है, यदि वे छूटते हैं तो संसार प्राप्त होता हैं।
अनासक्ति
आत्मा बड़ी कठिनाई से जानी जाती है, जान लेने के बाद भावना भाना कठिन होता है, आत्मा की भावना भाने वाले पुरुषों को भी विषयों से विरक्त होना कठिन होता है।
अनासक्ति
मूर्ति बनाते समय शिल्पी पहले मोटे-मोटे पत्थर को अलग करता है, बाद में छोटी हथौड़ी से छोटे-छोटे पत्थर अलग करता है, उसी प्रकार पहले मोटे-मोटे अशुभराग को त्यागना चाहिए फिर सूक्ष्म अशुभराग का त्याग करना चाहिए।
अनासक्ति
संसार की सभी वस्तुएँ नश्वर हैं।
अनासक्ति
आचार्यश्री से किसी ने पूँछा आपने गृहस्थी नहीं बसाई, संसार का सुख नहीं देखा और घर छोड़ दिया, तो आपको कैसे पता कि संसार असार है? आचार्यश्री ने कहा कि गृहस्थी वालों के संकट ग्रस्त और उदासीन चेहरे देखकर समझ लिया, कि संसार में सुख नहीं है।
अनासक्ति
विषम परिस्थिति में भी आचार्यश्री के मुख से समयसार निसृत होता है- ज्ञानी जीव ऐसा विचार करता है, कि शरीर आदि पर द्रव्य छिद जावे, भिद जावे, इसे कोई ले जावे, विनाश को प्राप्त हो जावे अथवा जिस-तिस तरह चली जावे तो भी परिग्रह मेरा नहीं है।
अनासक्ति
विषय बड़ा विष है सुनो विष सेवन से मौत। विषय कषाय विसार दे आत्म सिद्धि का योग।।
अनासक्ति
व्युत्सर्ग-निश्चित समय के लिए समस्त प्रवृत्ति का एवं शरीर से ममत्व का त्याग करना व्युत्सर्ग तप कहलाता हैं।
अनासक्ति
सेठ को मुक्ति चाहिए- एक सेठ भगवान् की प्रतिदिन भक्ति करता एवं भगवान् के कान में निवेदन करता, कि भगवान् मुझे मुक्ति चाहिए, एक दिन एक देव ने आकर उसकी परीक्षा की, और कहा कि हम आपको आज से दसवे दिन मोक्ष ले चलेंगे, सेठ ने कहा दसवे दिन क्यों? देव ने कहा दस दिन में आपके दस लड़कों का एवं दस कारखानों का वियोग होगा, आप हलके हो जायेंगे, तब हम आपको मोक्ष ले जायेंगे, सेठ ने कहा यह तो टेड़ी खीर है, हमारे गले में नहीं उतरेगी, कोई दूसरी किस्म का मोक्ष हो तो आप आना, अन्यथा कष्ट नहीं करना।
अनासक्ति
जिस प्रकार राग-द्वेष मोह और ज्ञान, दर्शन मय आत्मा भिन्न-भिन्न हो जाय वैसा करना तप है।
अनासक्ति
रागी वन में रहकर के भी पाप करता है और घर में भी पञ्चेन्द्रियों के निग्रह से तप होता है। रागरहित (राम के भाई भरत की तरह) निष्पाप मार्ग में चलने वाले के लिए घर ही तपोवन होता है।
अनासक्ति
दो पथ पन्थी चले न पन्था, दो मुख सुई सिले न कन्था। दोऊ काम नहीं होय सयाने, विषय भोग अरु मोक्ष हु जाने॥
अनासक्ति
भोगों को इतना भोगा कि खुद को ही भोग बना डाला। साध्य और साधन का अन्तर, मैंने आज मिटा डाला॥
अनासक्ति
यह राग आग दहे सदा, तातें समामृत सेइए, चिर भजे विषय कषाय, अब तो त्याग निज पद बेइए। दाव मत चूको यह- ये महत्त्वपूर्ण वाक्य है, मौका मिला है तो आत्म हित कर लेना चाहिए, जैसे राजगृही में लिफ्ट लगी है, वह चलती रहती है, जो साहस करके बैठ गया तो ऊपर पहुँच जाता है, वरना इसी मौके के लिए प्रतीक्षा करना पड़ती है।
अनासक्ति
जो जीव के लिए उपकारी है, वो शरीर के लिए अपकारी है और जो शरीर के लिए उपकारी है, वो जीव के लिए अपकारी है।
अनासक्ति
जो चैत्यालय, चैत्य, दान, प्रतिष्ठादि महोत्सव और समीचीन यात्रा के करने में तत्पर हैं, नाना शास्त्रों के ज्ञाता हैं, परीषह सहन करते हैं, दूसरों के कार्य में रत हैं, परिग्रह रहित हैं और तपस्वी भी हैं, ऐसे बहुत मनुष्य हैं परन्तु जो राग-द्वेष-मोह के त्याग में तत्पर हों, आत्मतत्त्व में लीन हों वे तपस्वी दुर्लभ हैं, त्याग तपस्या दूसरे के बल से नहीं आत्म बल से होती है।
अनासक्ति
जन और जिन में इतना ही अन्तर है कि जन वैभव को अपने शिर पर बैठाये है और जिन वैभव के सिर पर बैठे हैं।
अनासक्ति
संसार शरीर भोगों से विरक्त हो समस्त पदार्थों में मोह को छोड़ने से त्याग धर्म होता है ऐसा जिनेन्द्र भगवान् ने कहा है।
अनासक्ति
वर्णी जी का श्रोता- गणेशप्रसाद वर्णी जी के प्रवचन सुनने एक साहुजी आते थे, एक दिन वह देर से आये, लोगों ने बहुत कहा महाराज प्रवचन करो, वर्णी जी ने कहा श्रोता आ जाय, जब साहुजी आये तब वर्णीजी ने प्रवचन शुरू किया, वर्णीजी ने पूँछा 'भैया आज लेट काय हो गये' उनने कहा आज पत्नि से झगड़ा हो गया, कारण? कि आज रात में चोर आये थे, उन्होंने चारों कोने छाने पर कुछ नहीं मिला, हम करवट से लेटे थे, उन्होंने हमारी घड़ी, अङ्गूठी उतार ली, करवट बदला कि ये सोने का कड़ा भी उतार ले लेकिन वे विना कड़ा उतारे भाग गये, पत्नि ने कहा तुमने करवट काय बदली बेचारे विना कड़ा लिये भाग गये,ये है निरीह वृति।
अनासक्ति
त्याग से नदी पार- एक साधु को नदी पार करना थी, नाविक ने पाँच रुपये माँगे, साधु ने कहा नहीं हैं, तभी एक व्यक्ति आया, उसने सोचा इनको भी पार करा देते हैं, नदी के बीच में साधु से व्यक्ति ने कहा, आप त्याग का बहुत उपदेश देते हो, अब मत देना, साधु ने कहा भैया जब पाँच रुपये का त्याग किया तभी तो नदी पार हुये, उसी प्रकार जब तक सम्पूर्ण त्याग नहीं करेंगे, तब तक संसार सागर से पार नहीं हो सकते हैं।
अनासक्ति