Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Celibacy

ब्रह्मचर्य

227 सूत्र · पृष्ठ 3 / 4

कामी मनुष्य भोजन, संयम, विवेक, वैभव, स्वाभिमान यहाँ तक कि अपना जीवन भी नष्ट कर देता है।
ब्रह्मचर्य
कुशील से आयु, तेज, बल, वीर्य, बुद्धि, लक्ष्मी, विशाल यश, पुण्य एवं प्रीति सब कुछ नष्ट हो जाता है।
ब्रह्मचर्य
ब्रह्मचर्य के दोष- 1.शरीर संस्कार, 2.गरिष्ठ भोजन, 3.गाना-बजाना-नाचना, 4.स्त्री सङ्गति, 5.स्त्री के विषय में सङ्कल्प करना, 6.अङ्गोपांग निरीक्षण, 7.स्त्री का सम्मान करना, 8.पूर्व के भोगों का स्मरण करना, 9.भविष्य में भोगों की चिन्ता होना, 10.वीर्यक्षरण होना।
ब्रह्मचर्य
हे मूर्ख! मैथुन के सेवन से योनी में उत्पन्न होने वाले करोड़ों जीव (पञ्चेन्द्रिय लब्धि अपर्याप्तक मनुष्य) लिंग के घर्षण से मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। माह में चार पर्वों में भी ब्रह्मचर्य पालने से करोड़ों जीवों को अभयदान मिल जाता है।
ब्रह्मचर्य
स्त्री नरक की घोर आपत्तियों का खुला दरवाजा है, तूने कितनी बार उनका उपकार किया है पर उन्होंने अपकार ही किया है, पुण्य को जलाने के लिए अग्नि स्वरूप स्त्री के शरीर में आप क्यों राग करते हो, यह स्त्री शरीर तो मूर्खों के लिए दुर्लभ लगता है।
ब्रह्मचर्य
स्त्री की सङ्गति से सत्य, सन्तोष, ज्ञान, धन, सुख और लोकमान्यता सभी नष्ट हो जाते हैं।
ब्रह्मचर्य
स्त्री रुपी अग्नि की सङ्गति से पुरुषों का धैर्य (वीर्य) के बहाने घी की तरह शीघ्र ही पिघल जाता है और विवेक कपूर की भाँति कहीं चला जाता है।
ब्रह्मचर्य
नारी जने के भक्त जन, के दाता के शूर। नहीं तो बाँझ रहवों भलो, व्यर्थ गमावे नूर।।
ब्रह्मचर्य
वह मार्ग जरूर मनोरम है, पर कण्टक कीरण दुर्गम है। गुजरे जितने जन इस मग से, परिहास हुआ सबका सम है। मत जा मन उस ओर अरे, वह स्वप्न मृगाम्बु तथा भ्रम है।।
ब्रह्मचर्य
परनारी पैनी छुरी तीन ठोर से खाये। धन छीने यौवन हरे मरे नरक ले जाए।।
ब्रह्मचर्य
परनारी पैनी छुरी मति लगाओ अङ्ग। रावण के दस शीश गये परनारी के सङ्ग।।
ब्रह्मचर्य
द्रोपती में आसक्त होकर कीचक ने अपने प्राण गमाये, चारुदत्त ने वेश्या में आसक्त होकर बत्तीस करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ बर्बाद की थीं।
ब्रह्मचर्य
आराम यदि चाहो, तो आ राम के पास। फँदे में फँसना चाहो तो, जा काम के पास।।
ब्रह्मचर्य
भोग बुरे भव रोग बढ़ावे बैरी है जग जीके। बेरस होय विपाक समय अति सेवत लागे नीके।। वज्र अग्नि विष से विषधर से ये अधिके दुःख दायी। धर्म रतन के चोर चपल अति दुर्गति पन्थ सहाई।।
ब्रह्मचर्य
दूल्हा जब घोड़े पर बैठे तब भी यही कहना, अभी भी वक्त है, पत्नि नहीं राम नाम सत्य है।
ब्रह्मचर्य
सदा सुहागन री सखी, निज रोटी अर दार। दाम चौगुने अरु दुखद, पूरी अर परनार।।
ब्रह्मचर्य
अत्यन्त तीव्र काम से भी जो वेदना होती है वह अल्पकाल के लिए होती है, परन्तु ब्रह्मचर्य का खण्डन करने से करोड़ों भवों में वेदना प्राप्त होती है।
ब्रह्मचर्य
जिस प्रकार स्वास्थ्य के प्रतिकूल भोजन सेवन करने वाले मनुष्यों का दबा हुआ रोग समूह जागृत हो जाता है, उसी प्रकार स्त्रियों के सङ्ग से पुरुषों का भीतर सोया हुआ भी काम जागृत हो जाता है, स्त्रियों के समस्त अङ्ग कोमल होते हैं पर मन पाषाण के समान कठोर होता है।
ब्रह्मचर्य
स्त्रियों के चेहरे लगते बड़े भोले है पर सच मानों ये बारूद के गोलें हैं।
ब्रह्मचर्य
जो कुल, जाति और गुण से भ्रष्ट हैं, निकृष्ट हैं, दुष्ट चेष्टा वाले हैं, छूने योग्य नहीं हैं तथा नीच हैं, ऐसे पुरुष प्रायः स्त्रियों को प्रिय होते हैं।
ब्रह्मचर्य
स्त्रियाँ अञ्जन, तन्त्र, मन्त्र और विनय के विना ही बुद्धिमान मनुष्य को भी क्षणभर में ठग लेती है।
ब्रह्मचर्य
भोगी लोग चित्त और चेतना को विषयों की आग में झोक देते हैं।
ब्रह्मचर्य
स्वप्न में गृहस्थी- एक सन्यासी पानी पीकर कुंए के पत्थर पर सो गया, उसने स्वप्न में देखा कि मैं अपनी स्त्री बच्चों के साथ सो रहा हूँ, इतने में स्त्री ने कहा थोड़ा खिसको गर्मी लग रही है, थोड़ी देर में पत्नी ने पुनः कहा थोड़ा और खिसको बच्चा पसीना-पसीना हो रहा है, जैसे ही सन्यासी खिसका तो कुंए में गिर गया, चिल्लाया तो किसान दौड़ कर आया और सन्यासी को बाहर निकाला, पूँछा आप कुंए में कैसे गिर गये थे? सन्यासी ने कहा स्वप्न में थोड़ी देर के लिये स्त्री के साथ सोया तो कुंए में गिर गया, जो लोग जीवन भर स्त्री के साथ सोते हैं तो क्या वे नरक रुपी कुंए में नहीं गिरेंगे?
ब्रह्मचर्य
ध्यान के लिये वीर्य शुद्धि और ब्रह्मचर्य बहुत आवश्यक है, दूध, घी, आदि रसों का अधिक मात्रा में सेवन करने से वीर्य पर्याप्त मात्रा में बढ़ता है, घी सर्वाधिक वीर्य वर्धक वस्तु है उसका सेवन काम वासना उत्तेजित करता है, चञ्चलता बनी रहती है, यदि वीर्य सञ्चित होता है तो चञ्चलता बढ़ती है और वीर्य का विसर्जन होता है जिससे दुर्बलता आती है, दुर्बलता से मन सन्तुलित नहीं हो पाता, अतः ध्यान की कल्पना भी नहीं हो सकती है, इसलिए रसों का प्रचुर मात्रा में सेवन करना ध्यानाभ्यासी के लिये हितकर नहीं है।
ब्रह्मचर्य
कालेज की लड़की- सागर जिला में एक लड़की बस से रोज कॉलेज जाती थी, कण्डक्टर से परिचय हो गया, दोनों प्रेम की डोर में बन्ध गये, दोनों के माँ-बाप ने रोका, नहीं माने और शादी कर ली, जब वधू घर पहुँची, तब लड़के के माँ-बाप ने स्वीकार नहीं किया, पिता ने कहा हमारे घर भर के लोगों का थूक पियो तो स्वीकार करेंगे, लड़की ने स्वीकार कर लिया, गिलास में परिवार के लोगों ने थूका, लड़की को दिया, उसने पी लिया, कुछ दिन बाद पति-पत्नी में अनबन हो गयी, मारना-पीटना शुरू हुआ, बहुत दुःखी हुयी और बाद में तलाक हो गया।
ब्रह्मचर्य
राजा ने रानी को अमृत फल दिया ताकि रानी हमेशा सुन्दर बनी रहे, रानी ने कोतवाल को दिया, उसने वेश्या को दिया, वेश्या ने राजा को दिया, राजा फल को देखकर चिन्तन करने लगा। मैं जिस रानी का निरन्तर चिन्तन करता हूँ, वह रानी मुझसे विरक्त है और वह कोतवाल को चाहती है कोतवाल वेश्या को चाहता है वेश्या मुझे चाहती है, इसीलिए उस रानी को धिक्कार...
ब्रह्मचर्य
शादी में सात फेरे लगाये जाते हैं, अर्थात् सात प्रकार का संसार परिभ्रमण करना पड़ता है, एकेन्द्रिय के सूक्ष्म, बादर दो-तीन-चार इन्द्रिय, असंज्ञी और संज्ञी के भेद से सात भेद होते हैं या तो संसार के चक्कर काटो अथवा मुनि बनकर कर्म काटो।
ब्रह्मचर्य
रोड पर लाल बत्ती खतरा सूचित करती है, इसी तरह लाल साड़ी के रुप में वधू सूचित करती है कि गृहस्थ जीवन रूपी मार्ग में खतरा है, समय है सम्भल जाओ।
ब्रह्मचर्य
वधू वर से माँग भरवाती हुयी मौन मुद्रा में मानो कहती है ! अब जीवन भर हमारी माँगे पूरी करना, लड़का वासना के वश होकर स्वीकार कर लेता है।
ब्रह्मचर्य
उपवास से ब्रह्मचर्य पाला- एक महिला की शादी के कुछ दिन बाद पति मर गया, कुछ समय बाद सास भी मर गयी, ससुर ने सोचा बहु को खराब न लगे इसलिये श्रृंगार का सामान और अच्छा भोजन बहु के लिये उपलब्ध कराया, गरिष्ट भोजन से बहु के परिणाम बिगड़ गये, उसने ससुर से कहा कि हमसे अकेले नहीं रहा जाता, ससुर को चिन्ता हुई, सोचा गलती हमने की है, कि बहु के आहार का ध्यान नहीं रखा, ससुर ने उपवास करना शुरू किये, बहु ने भी उपवास किये, कुछ समय बाद जब इन्द्रियाँ शिथिल हुयी, तो ब्रम्हचर्य का पालन होने लगा।
ब्रह्मचर्य
रानी अमृता का छल- अष्टावक्र महावत के मधुर गान पर आसक्त होकर विषय सेवन करने लगी, रहस्य खुलने को हुआ तो यशोधर राजा को जहर दे दिया, वैद्यों को बुलाया, आने के पहले रानी छल से बोली, राजा को दृष्टिविष उत्पन्न हुआ, बाल बिखेर कर रोने लगी और राजा की छाती पर गिर पड़ी, चुपके से गला दबा दिया, राजा मर गया, अष्टावक्र के साथ खूब भोग भोगने लगी, अन्त में गलित कुष्ट हुआ, मरकर नरक गयी, मधुर स्वर के श्रवण से वासना जाग्रत होती है, इसलिये नहीं सुनना चाहिए।
ब्रह्मचर्य
दाह पड़ना- गर्मी की दाह को छाता रोक देता है, सूर्य चर्म को ही तपाता है, किन्तु काम के प्रबल ताप के प्रतिबन्ध का कोई साधन नहीं है, सूर्य दिन में तपाता है, काम रात-दिन तपाता है।
ब्रह्मचर्य
जैसे लोभी धन प्राप्ति के लिये प्राणों को त्याग देता है, उसी प्रकार कामी काम वासना के लिये प्राणों को सङ्कट में डाल देता है।
ब्रह्मचर्य
कामी अपने मनोरथ सफल होते न देख मरण को प्राप्त होता है, वासना के वश सैकडों कन्याएँ व युवक रेल से कटकर, कुंए में गिरकर, सल्फास खाकर, फाँसी लगाकर आत्म हत्यायें कर रहे हैं।
ब्रह्मचर्य
मैथुन से शरीरिक हानि- शरीर में वीर्य शक्ति ही श्रेष्ठ है, वह शरीर का राजा है, जिस प्रकार राजा के विना राज्य में अन्याय-भ्रष्टाचार होने से राज्य निर्धन हो जाता है, उसी प्रकार वीर्य शक्ति के विना शरीर निस्तेज एवं निस्सार हो जाता है।
ब्रह्मचर्य
चालीस किलोग्राम भोजन से एक तौला वीर्य बनता है, अधिक काम सेवन से टी.वी., कुष्टरोग व नपुंसकता आदि भयंकर रोग हो जाते हैं।
ब्रह्मचर्य
वीर्यवास- रज और वीर्य सर्वाङ्ग में रहते हैं, जैसे तिल में तैल, फूल में गन्ध, इसी तरह शरीर के कण-कण में वीर्य व्याप्त है।
ब्रह्मचर्य
वीर्य की बूँद निकालना याने शरीर को नीबू की भाँति निचोड़ना है, जैसे मथानी से दूध के परमाणु से मक्खन खींचा जाता है, उसी प्रकार हस्तमैथुन आदि से शरीर के सभी परमाणुओं से वीर्य खींचा जाता है नस-नस हिल जाती है जब तक दीपक में तैल ऊपर चढ़ता है तो दीपक प्रकाश करता है, जैसे ही तैल का नाश होता है दीपक मन्द होकर बुझ जाता है, उसी प्रकार जब तक शरीर में वीर्य ऊपर चढ़ता है तो शरीर में चमक, दमक, आनन्द बल दिखाई देता है।
ब्रह्मचर्य
वीर्य रक्षा के उपाय- पवित्र सङ्कल्प, मातृभाव, दृष्टि को सम्भालना, सादा रहन सहन, सत्सङ्गति, योगासन, जिनेन्द्रभक्ति, सत्साहित्य का पठन-पाठन, व्यसन मुक्ति, उपवास, दृढ़ प्रतिज्ञा, प्राणायाम आदि।
ब्रह्मचर्य
डॉ. सुरेश जैन ने सूक्ष्म दर्शी यन्त्र से वीर्य में चलते फिरते जीव देखें हैं, जीव का आकार मनुष्य जैसा होता है।
ब्रह्मचर्य
परस्त्री या वेश्या सेवन करने वाला भगवान् के चरण स्पर्श के अयोग्य होता है।
ब्रह्मचर्य
मैथुन से सामाजिक हानि- स्त्री आसक्त व्यक्ति समाज की दृष्टि में अच्छा नहीं माना जाता है, राजा भी व्यसनी हो तो प्रजा उसे हटा देती है, वेश्या सेवी सातों व्यसन करता है एवं दुराचारी का समाज बहिष्कार करती है।
ब्रह्मचर्य
आर्थिक हानि- मैथुन से उत्पन्न बीमारी में पैसा बर्बाद होता है, शरीर में दुर्बलता के कारण व्यवसाय नहीं कर पाता, बच्चे भूखे मरते हैं, पैसों के अभाव में अच्छा खान, पान, दान, पहिनना आदि नहीं हो पाता है।
ब्रह्मचर्य
माँ का कलेजा- वेश्यागामी की परीक्षा लेने के लिए, एक लड़की ने कहा कि आप अपनी माँ का कलेजा ले आओ, तो मैं तुम्हे पति बना लूँगी, कामासक्त रात में माँ को मारकर कलेजा ले आता है और लड़की के पास जाता है, लड़की ने मनाकर दिया, और कहा ! जो अपनी माँ का नहीं हुआ, वह हमारा क्या होगा ?
ब्रह्मचर्य
स्त्री के भाव- मनुष्य के शरीर में जितने रोम हैं, स्त्रियों के मन में उतने विकारी भाव होते हैं, जैसे वायु, उल्का, जल के बुलबुले, विद्युत आदि ये पदार्थ एक स्थान में ज्यादा देर तक नहीं ठहरते हैं, वैसे ही स्त्रियाँ एक पुरूष में ज्यादा समय तक प्रीति नहीं करती हैं, परमाणु पकड़ना सम्भव है पर स्त्रियों के भावों को पकड़ना असम्भव होता है।
ब्रह्मचर्य
माया का अजायब( चिड़िया ) घर- एक थानेदार एक स्त्री में आसक्त हो गया, अत्यधिक प्रेम करने लगा, उसका ट्रांसफर हो गया, तो उसने स्त्री से कहा ! तू हमारे साथ चल, उसने मना कर दिया, थानेदार को मना करने का बड़ा खेद हुआ, एक महिला ने थानेदार को दुःखी देखकर, कारण पूँछा तो उसने अपनी प्रेमिका का हाल बता दिया, उस महिला ने थानेदार को परदे के भीतर खड़ा करके उस महिला से पूछा तूने अभी तक कितने लोगों से प्रेम किया है ? उसने लिस्ट बताई साठ-पैंसठ लोगों के नाम बताये, थानेदार का नाम नहीं आया, पूँछा तुम भूली तो नहीं हो ? चार-पाँच नाम फिर बताए तब भी नाम नही आया, पुनः पूँछा दो-तीन नाम बताये तब भी थानेदार का नाम नहीं आया, वह सब सुन रहा था, थानेदार को उससे विरक्ति हो गयी।
ब्रह्मचर्य
ब्रह्मचर्य व्रत की पाँच भावनायें- 1.स्त्रियों में राग बढ़ाने वाली कथा सुनना, 2.स्त्रियों के अङ्गोपाङ्ग देखना, 3.पूर्व में भोगे हुए भोगों का स्मरण करना, 4.काम की उदीरणा करने वाले रसों का सेवन करना, 5.दूसरों को आकर्षित करने के लिए अपने शरीर को सजाना इन पाँचों का त्याग करना चाहिए।
ब्रह्मचर्य
युवा पीड़ी यदि ब्रह्मचर्य के स्वरूप को समझ लेगी तो जीवन में संयम और चेहरे पर तेज आ जायेगा।
ब्रह्मचर्य
राम के भाई भरत पूर्व भव में अचल चक्रवर्ती के पुत्र थे, अभिराम नाम था, तीन हजार रानियों के बीच रहकर चौसठ हजार वर्ष तक असिधारा ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया था।
ब्रह्मचर्य
बाघ, सर्प, पिशाच आदि के साथ रहना श्रेष्ठ है पर स्त्रियों के साथ रहना श्रेष्ठ नहीं है।
ब्रह्मचर्य
निर्दयता, अनार्यता, मूर्खता, अतिचञ्चलता, वाचालता और कुशीलता इतने दोष प्राय स्त्रियों में स्वभाविक होते हैं।
ब्रह्मचर्य
तिलोयपण्णत्ति- सौधर्मेन्द्र विक्रिया से इक्यावन करोड़, बाईस लाख, अठ्ठासी हजार, तेरह देवाङ्गनाओं के साथ क्रीड़ा करता है, लोकपाल साढ़े तीन करोड़, प्रतीन्द्र, सामानिक, तथा त्रायस्त्रिंश, देव भी इन्हीं के समान देवाङ्गनाओं के साथ क्रीड़ा करते हैं, ये सभी देव देवाङ्गनाओं के साथ मनुष्यों के समान प्रवीचार करते हैं, फिर भी वासना शान्त नहीं होती है।
ब्रह्मचर्य
हे मूढ़ ! यदि तूने नर जन्म पाया है, तो ऐसा काम कर जिससे काम-वासना हमेशा के लिए नष्ट हो जाय।
ब्रह्मचर्य
शील की रक्षा हेतु प्राणों की आहूति करना पड़े तो भी कोई हानि नहीं है।
ब्रह्मचर्य
हे भव्य ! स्त्री सुख में रागी मन रूपी मदोन्मत्त हाथी को वैराग्य भावना से रोककर रखो।
ब्रह्मचर्य
उसी पत्थर से चक्की बनती है, तो पेट भरता है, मूर्ति बनती है तो पूजा होती है और यदि संस्कारित न हो तो उसी पत्थर से सिर भी फूटता है, उसी प्रकार यदि आत्मा ब्रह्मचर्य से संस्कारित हो, तो पूज्य होती है, अन्यथा दुर्गति में भटकती है।
ब्रह्मचर्य
कुत्सित साहित्य, फ़िल्मी संसार और भड़कीले तथा अमर्यादित फैशन परिधान से बचना ब्रह्मचर्य के लिए अत्यावश्यक है।
ब्रह्मचर्य
विवाह केवल मनुष्यगति में असीमित इच्छाओं को एक पर केन्द्रित करने के लिए होता है।
ब्रह्मचर्य
अनावश्यक खान-पान से बचना एवं समय पर मल-मूत्र का विसर्जन करना ब्रह्मचर्य की बहुत बढ़ी शर्त है।
ब्रह्मचर्य
सद् गृहस्थ भूख को दूर करने के लिए भोजन और रोग को दूर करने के लिए दवा के समान विषय सेवन करते हैं।
ब्रह्मचर्य
पृथ्वी पर कुछ लोग हाथी का गण्डस्थल विदीर्ण करने में समर्थ हैं, कुछ सिंह का वध करने में भी समर्थ हैं, किन्तु मैं बलवानों के सामने कहता हूँ कि काम के मद का मर्दन करने वाले मनुष्य बिरले ही हैं।
ब्रह्मचर्य
काजल की कोठरी में कैसो हु सयानो जाय- उन जम्बूस्वामी का ध्यान करना चाहिये, जिनने माँ के आदेश से शादी की लेकिन सुहागरात की बात थी, तो एक तरफ से राग का जाल डाला जा रहा था, दूसरी तरफ से विराग की छुरी उस जाल को छेदती जा रही थी, विद्युच्चर चोर चोरी करने आया था, वह सङ्गोष्ठी सुनता रहा, सुबह जम्बूस्वामी के साथ दीक्षित हो गया, इसी तरह गजकुमार का भी विचार करना चाहिए।
ब्रह्मचर्य
एक पत्नि व्रत का पालन करने वाले सेठ सुदर्शन ने अपने मन को अडिग रखा, रानी सारी रात विषयों की मारी तड़पती रही, पुरोहिता, वेश्या आदि के अनेक उपसर्ग सहे, ब्रह्मचर्य का पालन किया और मुनि बनकर पटना गुलजार बाग से मोक्ष गये।
ब्रह्मचर्य
देशभूषण कुलभूषण- उस समय बच्चों की शिक्षा गुरुकुल में हुआ करती थी, पाँच वर्ष की उम्र में कुलभूषण देशभूषण राजपुत्रों के माता-पिता ने पुत्रों को गुरू के पास भेज दिया, विद्याध्ययन करके वापस आये, नगर प्रवेश के समय स्वागत हुआ, झरोखे में बैठी सुन्दर कन्या को देख कर शादी का भाव हुआ, एक दूसरे में द्वन्द हो गया, अन्त में मालूम हुआ ये उनकी ही बहिन है, घर में प्रवेश किये विना दीक्षा ग्रहण कर ली, रामचन्द्र जी ने उपसर्ग निवारण किया, केवली हुये, दिव्यध्वनि खिरी, कुन्थलगिरी से मोक्ष को प्राप्त हुए थे।
ब्रह्मचर्य
बुढ़िया को तो हमने वहीं छोड़ दिया- एक बार ब्रह्मचारीजी यात्रा कर रहे थे, रास्ते में नदी पार करने लगे, तभी ब्रह्मचारीजी की दृष्टि एक बुढ़िया पर गयी जो असहाय थी, उसने कहा ! महात्माजी अपने साथ हमें भी नदी पार करा दो, नहीं तो रात भर यहीं रहना पड़ेगा, ब्रह्मचारीजी को दया आगयी, अपने कन्धे पर उसे बैठाकर नदी पार करा दिया, कुछ लोगों ने उनके गुरु से कहा, कि इन्होने स्त्री को छुआ है, ब्रह्मचारीजी ने कहा ! हम तो स्त्री को वहीं छोड़ आये, आप लोग तो यहाँ तक ले आये हैं।
ब्रह्मचर्य
वेष भूषा- इंस्पेक्टर की लड़की भड़कीले वस्त्रादि पहनकर निकल रही थी, एक लड़के ने छेड़ दिया, उसने अपने पिताजी को घटना की जानकारी दी, रिपोर्ट की गई। उस बच्चे को बन्दी बना लिया, केस चला, जज ने लड़के से पूँछा इसके साथ छेड़खानी की है? उसने कहा नहीं, यदि ये उसी वेषभूषा में आये तो मैं पहचान सकता हूँ, जज ने लड़की को उस दिन के वेष में बुलाया, लड़के ने कहा मैंने इसको वेश्या समझा था, इंस्पेक्टर शर्म से नतमस्तक हो गया, अतः हमारी वेषभूषा साधारण होना चाहिए।
ब्रह्मचर्य
बनारसी साड़ी- गणेश प्रसाद वर्णी जी के विद्यागुरू पण्डित ठाकुरदासजी की सर्विस बनारस में लग गयी थी, वे छः माह बाद जब घर आये, तो पत्नि के लिए पाँच रुपये की बनारसी साड़ी लेकर आये, जब पत्नि को दिखाई तो पण्डित जी ने सोचा कि पत्नि प्रसन्न होगी, लेकिन पत्नि उदासीन होकर कहती है कि जब मैं ये साधारण साड़ियाँ पहनती हूँ तब भी आप बनारस से यहाँ दौड़े आये, अब इस बनारसी साड़ी को पहनकर मैं किसको रिझाऊँ ? पण्डित जी चुप हो गये, उनकी पत्नी ने पाँच रुपये की साड़ी साढ़े चार रुपये में पड़ोसी को बेच दी, लेकिन उन्होंने वह भड़कीली साड़ी नहीं पहनी।
ब्रह्मचर्य
पत्नि ने पति को पिताजी कहा- पण्डित ठाकुरदास जी की पत्नि भोगों से उदासीन हो गयी, बार-बार कहती थी, कि अब ब्रह्मचर्य व्रत ले लेवें, लेकिन पण्डित जी टाल देते थे, एक दिन पण्डित जी की गोद में बैठकर बोलीं 'पिताजी अब मुझे क्षमा कर दो, मैं व्रत पालना चाहती हूँ', पण्डित जी ने आँखों में आँसु भरकर कहा बेटी आज से अपन अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करेंगे, तुमने मुझे वह शिक्षा दे दी जो अनेक शास्त्र भी नहीं दे सके।
ब्रह्मचर्य
जब राम बनता हूँ- रावण और मन्दोदरी सीता को रिझाने में असफल रहे तो मन्दोदरी ने कहा तुम राम का रूप क्यों नहीं बना लेते, तब रावण ने कहा जब मैं राम का रूप बनाता हूँ तो सीता के साथ भोग भोगने का भाव समाप्त हो जाता है, वेश मात्र से भाव परिवर्तित हो जाते हैं।
ब्रह्मचर्य
मैं आपका पुत्र हूँ- पन्ना नरेश राजा छत्रसाल से एकयुवती प्रभावित होकर बोली महाराज आप दुखियों के दुःख दूर करते हैं, मेरे कोई सन्तान नहीं है, आप जैसा पुत्र चाहिए, राजा ने कहा इसके लिए पाप करने की क्या जरूरत है ? मैं ही आपका पुत्र बन जाता हूँ चरणों में बैठ कर कहते हैं माँ आपका पुत्र आपकी जीवन भर सेवा करेगा, बोलिए क्या आज्ञा है ? नारी अवाक् रह गयी।
ब्रह्मचर्य
भीष्म का ब्रह्मचर्य- भीष्म पिता ने पिता की प्रतिज्ञा में हानि न हो इसलिये पिता को धीवर की पुत्री में आसक्त जान आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन किया था।
ब्रह्मचर्य
विवाह बाँध है- बाँध के चारों ओर सुदृढ़ दीवाल बनाई जाती है, और उसमें आपात कालीन गेट होता है उसी प्रकार विवाह भी चारो ओर से वासना रूपी जल को रोकने के लिये बाँध है, उसमें स्वदार सन्तोष रूप एक आपातकालीन गेट है, विवाह वासना का निमन्त्रण नहीं नियन्त्रण है।
ब्रह्मचर्य
तीर्थङ्कर उत्पन्न होते ही परिवार में वासना उत्पन्न नहीं होती है, सभी संयमी हो जाते हैं।
ब्रह्मचर्य
सोलहवें स्वर्ग के देव काम सेवन नहीं करते, किन्तु मन में काम सेवन का विकल्प आते ही तृप्ति हो जाती है।
ब्रह्मचर्य
विवेकी शिष्य को जोर-जोर से पढ़ना, गाते हुए पढ़ना, हास-परिहास, स्त्रियों के निवासस्थल में रहना, उनके शरीर को देखना, साथ-साथ वार्तालाप करना, उनके शरीर का स्पर्श करना, उनके पुत्रों को निरन्तर खिलाना, उनके आगे पति की अत्यधिक प्रशंसा करना, ज्योतिष, मन्त्र, निमित्त ज्ञान, औषध, सञ्चित धन और शरीर का पोषण करना इत्यादिक छोड़ देना चाहिए।
ब्रह्मचर्य