सत्वं रेतश्छलात् पुंसाम्, घृतवद् द्रवति द्रुतं। विवेकः सूतवत् क्वापि, याति योषितारिग्न योगतः।।
स्त्री रुपी अग्नि की सङ्गति से पुरुषों का धैर्य (वीर्य) के बहाने घी की तरह शीघ्र ही पिघल जाता है और विवेक कपूर की भाँति कहीं चला जाता है।
In the company of the fire that is woman, a man's fortitude (virility) melts swiftly like ghee, and his discernment vanishes somewhere like camphor.
— आराध्य सूत्र · #44
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