जिसने वैराग्य रूपी तलवार के द्वारा इन्द्रियरूपी चोरों को नष्ट कर दिया उसको स्वर्ग मोक्ष अवश्य प्राप्त होता है। वैराग्य के बिना शरीर को दण्डित करना व्यर्थ है। जब चित्रादि में निर्मित स्त्री मन में क्षोभ उत्पन्न करती है तब स्त्री के संसर्ग और वार्तालाप में मन एकाग्र कैसे रह सकता है? ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
पराई स्त्री और पर धन जिसके मन को अपवित्र नहीं करते, गंगादि तीर्थ उसके चरण स्पर्श की अभिलाषा करते हैं। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
दान तीर्थ है, मन का संयम तीर्थ है संतोष को भी तीर्थ कहा जाता है लेकिन ब्रह्मचर्य परम तीर्थ है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
सुन्दर चेहरा देखकर विद्वत्ता भैंस चराने चली जाती है, अतः राख बनने वाले चेहरे देखने से बचें। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
विचार करो, जिससे आप सुख चाहते हैं, क्या वह सर्वथा सुखी है? क्या दुःखी नहीं है? दुःखी व्यक्ति आपको सुखी कैसे बना सकता है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
पुरुष के पास दृष्टि होती है और नारी के पास विषय कषाय सम्बन्धी दिव्य दृष्टि होती है अतः सावधान रहें। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
जिस प्रकार सूक्ष्म छेद वाले जाल में फँसी हुई दो बड़ी-बड़ी मछलियाँ मिलकर जाल को काट डालती हैं, उसी प्रकार ये काम और क्रोध दोनों विशिष्ट ज्ञान को लुप्त कर देते हैं। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
शरीर व शरीर के अन्य अंगों से ब्रह्मचर्य पालना आसान है किन्तु मन का ब्रह्मचर्य अति कठिन है, मन का ब्रह्मचर्य ही परमब्रह्म से मिला सकता है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
जो जननेन्द्रिय के विकारों को रोकने की ठाने, उसे तमाम इन्द्रियों के विकारों पर काबू पा लेना चाहिए। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
यह सच है कि वीर्य-रक्षा ही ब्रह्मचर्य नहीं है पर वीर्य-रक्षा उसका प्रथम चरण अवश्य है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
वीर्य नाश से शरीर को निचोड़ना बेवकूफी है क्योंकि वीर्य का उपयोग शरीर और मन की शक्ति बढ़ाने के लिए है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
साधना के लिए विवाहित हो ही गये हो तो दोनों स्त्री-पुरुष एक दूसरे को भाई-बहन समझें। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
बुद्धि व विवेक उसी का साथ देता है जो स्पर्शन, रसना इन दोनों काम इन्द्रियों को जीत लेता है। ब्रह्मचर्य-व्रत पालन के चार उपाय हैं– १. उसकी आवश्यकता को अच्छी तरह समझना तथा सत्संगति करना। २. इन्द्रियों को धीरे-धीरे वश में करना तथा मन में बुरे विचार न आने देना। ३. शुद्ध साथी, शुद्ध मित्र, शुद्ध पुस्तकें रखना और शुद्ध सात्त्विक आहार करना। ४. नित्य योगाभ्यास करना। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
जिसके पास शील है वह कुरूप होकर भी रूपवान, निर्धन होकर भी धनवान है तथा जिसके पास शील नहीं है वह रूपवान होकर भी कुरूप और धनवान होकर भी निर्धन है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
जिन साधकों ने स्त्रियों के संसर्ग से पीठ फेर ली है वे साधक समस्त उपसर्गों में स्थिर रहते हैं। विष खाना अच्छा है किन्तु विषय सुख का सेवन करना अच्छा नहीं है क्योंकि विष खाने से तो जीव एक ही बार मरण का कष्ट पाता है किन्तु विषय रूपी स्त्री के सेवन से मनुष्य नरक के गड्ढे में गिर कर बार-बार कष्ट पाता है अरे! विष तो खाने से ही मनुष्य को मारता है लेकिन विषय तो स्मरणमात्र से मनुष्य के संयमी जीवन की हत्या कर डालते हैं। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
माता, बहन, पुत्री के साथ भी एकान्त में नहीं बैठना चाहिए क्योंकि इन्द्रियाँ बड़ी बलवती होती हैं, वे तपस्वी पुरुषों को भी अपनी ओर खींच लेती हैं। अरे जिस प्रकार लाख का घड़ा आग के पास रखते ही पिघल जाता है, वह शीघ्र ही चारों ओर से तपकर गलकर नष्ट हो जाता है, वैसे ही ब्रह्मचर्य भी स्त्री के साथ निवास करने से भ्रष्ट, शिथिलाचारी हो जाता है, अरे संसर्ग तो दूर रहा, स्त्री के स्मरण मात्र से ब्रह्मचारी का संयम नष्ट हो जाता है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
स्त्री के साथ भोजन न करें, भोजन करती, छींकती, जंभाई लेती, एकान्त में सुखपूर्वक बैठी स्त्री को न देखें, नेत्रों में काजल या अंगों में उबटन लगाती हुई, नग्न बैठी हुई, स्नान करती हुई या प्रसव करती हुई स्त्री को तेजस्वी होने की इच्छा वाला साधक न देखें। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
दिन में अनुराग बुद्धि से युवती (स्त्री) के साथ हर्षित होकर संभाषण करने वाले की अन्यजन हँसी मजाक किया करते हैं और दूसरे कितने ही जन उसकी निन्दा भी करते हैं, अतः साधु को स्त्री चर्चा छोड़ देना चाहिए। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
जो कोई भी स्त्री को वासना की दृष्टि से देखता है, समझ लो कि वह अपने मन के द्वारा उससे व्यभिचार कर चुका है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
लज्जा नारी-जीवन का अनमोल रत्न है, जिसने इसे खो दिया उसका जीवन व्यर्थ है, फिर चाहे वह धनसम्पन्न परिवार की नारी ही क्यों न हो? ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
स्त्रियों पर विश्वास करना विनाश का कारण होता है। नारी शीघ्र शान्ति का हरण करने वाली होती है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
जिस तरह मुर्दे को वस्त्राभूषणों से सुसज्जित करना व्यर्थ है, उसी तरह स्त्री के सुख भोग से विरक्त हुए व्यक्ति के लिए धन का संचय करना व्यर्थ है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
जो मुनि महीने-महीने का उपवास करके केवल जल ही ग्रहण करता है ऐसा तपस्वी भी स्त्री की संगति पाकर मोहित हो जाता है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
पुरुष को दूषित करना स्त्रियों का स्वभाव है, इसलिए विवेकी पुरुष युवती (स्त्रियों) के विषय में कभी प्रमाद नहीं करते हैं। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
क्रोधित शेरनी का आलिंगन करना अच्छा है, कुपित नागिन से लिपट जाना अच्छा है किन्तु परनारी का आलिंगन करना योग्य नहीं है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
सर्पिणी स्पर्श से खाती है पर स्त्री दूर से ही खा लेती है अतः स्त्री का नाम भी सुनकर दूर भाग जाना चाहिए। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
कामी पुरुष सुख-दुःख, हित-अहित, पुण्य-पाप, वध-बन्धनादि, मरण की समीपता और दुर्गति को नहीं जानता है तिल बराबर सुख के लिए सुमेरु बराबर इस लोक-परलोक में दुःख भोगता है। संयमित जीवन ही जिनशासन की प्रभावना का प्रतीक है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
मोती की कीमत चमक, साधना की कीमत ब्रह्मचर्य है। जीवन में करोड़ों उपवास, लाखों जप कर लेना लेकिन शीलहीन का जप-तप कार्यकारी नहीं होता है। सील की कीमत होती है, यदि सील खुल गयी तो बाजार में कीमत कम हो जाती है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
वासना के पीछे ही घर गृहस्थी बसाना पड़ती है यदि वासना वश में हो जाये तो संसार वास समाप्त हो जाये। सारा संसार वासना का फल है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
विषयों का सेवन छोड़ने पर भी जिसके विषय वासना नहीं छूटी उसकी भव सन्तति अभी कम नहीं हुई है। विकार भाव जीव को ज्ञान शून्य बना देता है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
इस लोक में शरीर के शीलवंत लाखों करोड़ों मिल जायेंगे पर मन के शीलवंत कम ही मिलेंगे। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
शील में ताकत होती है, सील बन्द में विश्वास होता है, सील खुल गई तो विश्वास चला जाता है। संसार में सबसे श्रेष्ठ ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
संकट के समय जिसका कोई सहारा नहीं होता उसका शील सहारा होता है, सभी व्रतों में शील राजा है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
शील अपरिमित बल है, शील सर्वोत्तम शस्त्र है, शील श्रेष्ठ आभूषण है, शील चिन्तामणि रत्न है और शील ही रक्षा करने वाला अद्भुत कवच है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
पंखों के बिना उड़ा नहीं जा सकता नाव के बिना पार नहीं उतर सकते, शील के बिना कभी भी निर्वाण प्राप्त नहीं किया जा सकता है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
उस स्वर्ण से भी क्या जहाँ चारित्र का खण्डन हो? यदि मैं शील से विभूषित हूँ तो मुझे और क्या चाहिए? ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
स्त्रियाँ मनुष्यों को जन्म देने वाली हैं किन्तु प्राणों को हरने वाली भी हैं, ये भीरु स्वभाव वाली भी हैं तथा अग्नि में प्रवेश भी कर सकती हैं, ये अत्यन्त कठोर भी हैं, साथ ही पल्लव के समान कोमल अंगों वाली भी हैं, वे सहज ही मुग्ध हो जाने वाली भी हैं किन्तु विद्वानों को भी ठग सकती हैं। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
मोहित करती हैं, मदयुक्त बनाती हैं, उपहास करती हैं, भर्त्सना करती हैं, प्रमुदित करती हैं, दुःख देती हैं, ये स्त्रियाँ पुरुषों के दयामय हृदयों में प्रवेश कर क्या-क्या नहीं करती हैं? ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
संसार में लकड़ी, डोरी या लोहे का बंधन उतना दृढ़ नहीं है जितना चंचल नेत्रों वाली स्त्री के मुख और ललित वाणी का दृढ़ बंधन है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
सैकड़ों पुराणों, शास्त्रों व स्मृतियों के अध्ययन से उत्पन्न विवेक तभी तक समर्थ रहता है, जब तक मृग नयनी स्त्री का कटाक्ष हृदय में स्थान नहीं बना लेता है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
हाथी जब कमलिनी को देख लेता है तब उसे ग्राह नहीं दिखाई देता उसी प्रकार पुरुष जब स्त्री को देख लेता है तब उसे नरक का भी डर नहीं लगता है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
अवलोकन, संभाषण, विलास, परिहास, क्रीड़ा और आलिंगन आदि तो दूर रहे स्त्रियों का स्मरण भी मन को विकृत करने के लिए पर्याप्त है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
विंध्यपर्वत के वन में भूख-प्यास से पीड़ित होकर मर जाना अच्छा है, सर्पों से भरे हुए तथा घास-फूस के घिरे कुँए में गिरना अच्छा है, गड्ढे और भँवर वाले गहरे जल में डूब जाना अच्छा है परन्तु समझदार कुलीन का शील से भ्रष्ट होना अच्छा नहीं है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
स्त्री के संग से मन में शीघ्र ही विषय वासना उत्पन्न हो जाती है, उससे वैराग्य नष्ट होता है और वैराग्य न होने से पुरुष उत्तम तपस्या से भ्रष्ट हो जाता है अतः तपस्वियों को स्त्रियों का संग नहीं करना चाहिए क्योंकि वह विषय-कषाय की जड़ है एवं ज्ञान वैराग्य का विनाश करने वाली है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
धन्य है उसका पुरुषत्व जो पराई स्त्री पर दृष्टि भी नहीं डालता वह केवल श्रेष्ठ और धर्मात्मा ही नहीं वह सन्त है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
उस आदमी को देखो, जो दूसरों के प्रति बिना अपने किसी कर्त्तव्य को कम किए शीलवान रह सकता है, वह पृथ्वी को उत्तराधिकार में पालेगा। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
वेश्या जब अपने प्रेमी का दृढ़ आलिंगन करती है, तो वह ऊपर से यह प्रदर्शन करती है कि वह उससे प्रेम करती है; परन्तु मन में तो उसे ऐसा अनुभव होता है, जैसे कोई बेगारी अन्धेरे कमरे में किसी अज्ञात लाश को छूता है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
जिन लोगों के मन का झुकाव पवित्र कार्यों की ओर है, वे असति स्त्रियों के स्पर्श से अपने शरीर को कलंकित नहीं करते हैं। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
जैसे कौआ जल से पूर्ण तालाब के रहते हुए भी घड़े का पानी पीता है, वैसे ही नीच मनुष्य स्त्री के अपने अधीन रहते हुए भी पर स्त्री लम्पट होता है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें