Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
ब्रह्मचर्य

तिलोयपण्णत्ति- सौधर्मेन्द्र विक्रिया से इक्यावन करोड़, बाईस लाख, अठ्ठासी हजार, तेरह देवाङ्गनाओं के साथ क्रीड़ा करता है, लोकपाल साढ़े तीन करोड़, प्रतीन्द्र, सामानिक, तथा त्रायस्त्रिंश, देव भी इन्हीं के समान देवाङ्गनाओं के साथ क्रीड़ा करते हैं, ये सभी देव देवाङ्गनाओं के साथ मनुष्यों के समान प्रवीचार करते हैं, फिर भी वासना शान्त नहीं होती है।

Tiloyapannatti: Saudharma-Indra, by his powers of transformation, sports with fifty-one crore, twenty-two lakh, eighty-eight thousand and thirteen celestial nymphs; the Lokapalas with three and a half crore, and the Pratindra, Samanika and Trayastrimsha devas likewise sport with equal numbers of nymphs; all these devas enjoy the nymphs as humans do, and yet their craving is not stilled.

— आराध्य सूत्र · तिलोयपण्णत्ति · #103

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जिसने वैराग्य रूपी तलवार के द्वारा इन्द्रियरूपी चोरों को नष्ट कर दिया उसको स्वर्ग मोक्ष अवश्य प्राप्त होता है। वैराग्य के बिना शरीर को दण्डित करना व्यर्थ है। जब चित्रादि में निर्मित स्त्री मन में क्षोभ उत्पन्न करती है तब स्त्री के संसर्ग और वार्तालाप में मन एकाग्र कैसे रह सकता है?
ब्रह्मचर्य