समीचीन मार्ग से स्खलन होना, विवेक का नष्ट होना, बुद्धि रूपी लता का उखाड़ा जाना, अपने शरीर का दमन, नीचत्व की प्राप्ति, सम्यग्ज्ञान का आवरण, अपने धन का हरण, पाप की वृद्धि ये सब दोष पर स्त्री सेवन से होते हैं, परस्त्री सेवन की बात ही क्या कहे दर्शन ही क्लेश दायक होता है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
ब्रह्मचर्य, विद्याभ्यास और विनय विद्यार्थी की उन्नति का मूल है, यही सच्चा जीवन बनाने की त्रिपुटी है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
जो यौवन में स्थिर होकर भी स्त्री लक्ष्मी आदि को तृण के समान छोड़ देते है वे धन्य है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
ब्रह्मचर्य के बिना मोह नष्ट नहीं होता, मित्र के बिना दुःख, सूर्य के बिना अन्धकार, सन्तोष के बिना लोभ, पथ्य के बिना रोग, पुण्य के बिना दुःख नष्ट नहीं होता है पुण्य हीन को वस्तु मिलने पर भी सुख प्राप्त नहीं होता किन्तु जो पुण्यवान होता है उसे जंगल में भी सुख/सम्मान प्राप्त होता है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
जो मनुष्य भूख, प्यास और मलमूत्रादि के वेग को रोककर स्त्री सेवन करता है उससे रोगी संतान उत्पन्न होती है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
अमावस्या, पूर्णिमा, अष्टमी, चतुर्दशी आदि पर्व के दिन प्रातः सायंकाल की संधि बेला और चन्द्रग्रहण आदि से दूषित दिन में अपनी विवाहित स्त्री के साथ भी विषय सेवन न करें। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
कामासक्त होकर भी रजस्वला से समागम न करें और न ही उसके साथ एक शय्या पर शयन करें क्योंकि रजस्वला से समागम करने वाले पुरुष की प्रज्ञा, तेज, बल, दृष्टि और आयु भी क्षीण हो जाती है किन्तु रजस्वला से दूर रहने वाले की प्रज्ञा, तेज, बल, दृष्टि व आयु बढ़ती है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
स्त्री रूपी अग्नि के संयोग से पुरुषों का धैर्य, वीर्य के छल से घी के समान द्रवीभूत हो जाता है, पिघल कर बहने लगता है और विवेक पारे के समान कहीं चला जाता है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
जिन्होंने शास्त्र ज्ञान में अपना उपयोग लगाया है, जिनका समय प्रशम, यम, तप और ध्यान में व्यतीत होता है, जिन्होंने सदा के लिए परिग्रह का त्याग किया है, जो निर्मल गुणों के समूह हैं, ऐसे मुनि भी स्त्रियों के स्तन, जघन और मुख के देखने से भग्न हो मोहरूपी सागर में निमग्न होते हुए सुने जाते हैं। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
जब स्त्रियों का लेश मात्र संकल्प भी मन में मदन ज्वर को बढ़ा देता है, तो उनकी निकटता क्या चारित्र रूपी लक्ष्मी से नष्ट भ्रष्ट नहीं करेगी? ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
काम से पीड़ित लोग जड़ और चेतन पदार्थों के सम्बन्ध में स्वभावतः विवेक-शून्य हो जाया करते हैं। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
विषयों में स्वाद कम है, बन्धन अधिक है, केवल अतृप्ति है, सज्जनों द्वारा निन्दा होती है और पाप निश्चित है, ऐसा समझकर कौन व्यक्ति काम नामक विष को ग्रहण करेगा? ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
वेश्या त्यागी व्यक्ति को निज हित के लिए नृत्य, गायन, वादन में आसक्ति, कुसंगति, निष्प्रयोजन भ्रमण आदि को छोड़ देना चाहिए। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
जैसे सोने से भी कठोर वज्र को भी अग्नि पिघला देती है वैसे ही स्त्री भी अपनी शक्ति से सभी को पिघला सकती है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
किसी आदमी से कितना भी प्रेम हो, मगर उसकी औरत के पास अकेले में नेक इरादे से भी मत बैठो। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
विदेशों में विद्या धन है, सङ्कटों में बुद्धि धन है, परलोक में धर्म धन है और 'ब्रह्मचर्य सर्वत्र धन है।' ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
रावण की बीस आँखें थी पर दृष्टि एक पर खराब थी, आज के मानव की दो आँखे हैं पर दृष्टि हजार पर खराब हैं, हमारी दुर्गति तो रावण से भी ज्यादा होगी। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
शादी के बाद एक सप्ताह तक ब्रह्मचर्य से रहकर दृढ़ भक्ति करना चाहिये, इससे धार्मिक सन्तान की प्राप्ति होती है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
ब्रह्मचर्य के विना शेष गुण महत्त्व को प्राप्त नहीं होते हैं अतः ब्रह्मचर्य की रक्षा के लिये गम्भीर होना जरूरी है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
एक ओर सब शास्त्रों को रखो और एक ओर 'ब्रह्मचर्य' को, दोनों का फल बराबर है, इसी तरह एक ओर सब पाप रखो और दूसरी ओर 'मद्यपान' रखो, दोनों का पाप समान होता है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
'परस्त्रीसेवन' के भाव से महान् पाप होता है और उसके फल स्वरूप अज्ञानी जनों को सातवे नरक सम्बन्धी महान् दुःख भोगना पड़ता है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
आरम्भ में दया नहीं होती, स्त्री की सङ्गति से ब्रह्मचर्य नष्ट हो जाता है, शङ्का से सम्यक्त्व एवं धनग्रहण करने से दीक्षा नष्ट हो जाती है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
मात्र विवाह नहीं करना ब्रह्मचर्य नहीं है, किन्तु मैथुन का त्याग कर आत्मोपलब्धि का प्रयत्न ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
मित्र को निष्कपट व्यवहार से, शत्रु को नीतिबल से, लोभी को धन से, राजा को आज्ञा पालन से, ब्राह्मण को आदर से, युवति को अत्यधिक प्रशंसा से, भाई को शान्तवृत्ति से, गुरु को नमस्कार से, मूर्ख को कथाओं से, विद्वान् को विद्याओं से, रसिक को रस से और ''सभी को ब्रह्मचर्य से वश में करना चाहिए।'' ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
संसार में लौकिक कला और लौकिक ज्ञान की अनेक चीजें हैं, पर ब्रह्मचर्य में विरले ही निपुण हैं। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
गुरु की साक्षी पूर्वक लिए हुए समस्त व्रतों का पालन करना, संसार रूप शत्रु से भयभीत मनुष्य का ब्रह्मचर्य कहलाता है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
शरीर रज-वीर्य रूपी मल से उत्पन्न हुआ है और मल को ही उत्पन्न करता है, मल को ही झराने वाला है, दुर्गंधित है, ग्लानि उत्पन्न करने वाला है, इस प्रकार शरीर को देखते हुए जो काम से विरक्त होता है, वह ब्रह्मचारी कहलाता है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
ब्रह्मचर्य अङ्क के तुल्य है, व्रतादिक शून्य के तुल्य हैं, ब्रह्मचर्य के नष्ट हो जाने पर व्रतादिक शून्य तुल्य हो जाते हैं। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
जो पर स्त्री में माता की तरह, परधन में मिट्टी के ढेले की तरह और प्राणी मात्र में अपने समान व्यवहार करता है वह पण्डित है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
भूमि में गया हुआ जल पवित्र होता है, पतिव्रता नारी पवित्र होती है, धर्मपरायण राजा पवित्र होता है एवं ब्रह्मचारी सदा पवित्र होता है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
ऐश्वर्य का आभूषण सज्जनता है, शौर्य का आभूषण वाणी संयम है, ज्ञान का आभूषण शान्ति है, कुल का आभूषण विनय है, धन का आभूषण सुपात्र में व्यय (दान) करना है, तप का आभूषण क्रोध नहीं करना है, बल का आभूषण क्षमा है, धर्म का आभूषण माया का अभाव है और इन ''सबका आभूषण ब्रह्मचर्य है''। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
''ब्रह्मचर्य के द्वारा निःसन्देह तीनों लोको को वश में किया जा सकता है एवं शीलवानों के लिए कुछ भी असाध्य नहीं है।'' ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
विजय का ब्रह्मचर्य- विजय जब पाठशाला पढ़ता था, तब शुक्लपक्ष में ब्रह्मचर्य से रहने का नियम ले लिया और विजया भी जब पाठशाला पढ़ती थी, तभी कृष्णपक्ष में ब्रह्मचर्य से रहने का नियम ले लिया था, आगे चलकर उन दोनों की शादी हो गयी, उन्होंने पूरे जीवन भर भाई बहन का व्यवहार किया। किसी गृहस्थ से जीवानी गिर गई थी, प्रायश्चित्त के रूप मे मुनि महाराज ने शीलव्रत धारी दम्पत्ति को भोजन कराने को कहा, अगर ऊपर का काला चँदोवा सफेद हो जाए, तो समझ लेना मेरा प्रायश्चित्त पूरा हो गया, विजय-विजया दम्पत्ति को भोजन कराने से काला चँदोवा सफेद हो गया था। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
ब्रह्माचारी के दर्शन से आँख ठीक हुई- एक जन्मान्ध ने मुनिराज से पूछा हमारी आँखें कब ठीक होगीं? तब मुनिराज ने कहा कि विवाह से बारह वर्ष तक जिसने ब्रह्मचर्य पाला हो उसके दर्शन से ठीक होंगी। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
कामिनी के कटाक्ष का निरीक्षण करने में तत्पर मनुष्य के अनेक भव युक्तायुक्त के विचार से शून्य हो जाते हैं, स्त्री की गन्ध मात्र भी, उसका देखना, स्पर्शन और वचन मात्र भी मुनि की सानन्द वीतराग चित्त वृत्ति को तत्काल ही व्यर्थ कर देती है, मुनि को वार्तालाप तो दूर उनके शब्द श्रवण से भी बचना चाहिए क्यों कि उनका नाम भी भूत की तरह भयानक होता है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
जिस नारी को अवैध गर्भ हुआ हो और वह बार-बार गिराने की भावना करे तो लब्ध्यपर्याप्तक जीवों में उत्पन्न होती है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
धन और स्त्री का राग मन रहित वृक्षों को भी नहीं छोड़ता फिर मनुष्यों की तो बात ही क्या है, जहाँ धन गड़ा हो वहाँ वृक्ष की जड़ें चली जाती हैं और स्त्रियों के पैर मारने आदि से वृक्ष खिल उठते हैं। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
शील की नौ बाढ़- 1.गरिष्ट आहार, 2.भड़कीली भेषभूषा, 3.कुसङ्गति, 4.स्त्री आसन, 5.स्त्री कथा, 6.आङ्गोपाङ्ग निरीक्षण, 7.पूर्वभोग स्मरण, 8.स्त्री नृत्य,गीत, 9.स्त्री सह सम्भाषण ये सभी नहीं करना शील की नौ बाढें हैं। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
भोगों का चिन्तन ही व्यक्ति को रोगी, कमजोर, पागल तक कर देता है और मृत्यु भी हो जाती है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
ब्रह्मचर्य व्रत के पाँच अतिचार- 1. दूसरों के विवाह कराना, 2. विवाहित व्यभिचारिणी स्त्री से सम्बन्ध करना, 3. अविवाहित व्यभिचारिणी स्त्री से सम्बन्ध करना, 4. मैथुन सेवन के अङ्गों को छोड़कर भिन्न अङ्गों से मैथुन सेवन करना, 5. मैथुन सेवन में आसक्ति होना। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
इन्द्रिय भोग और इन्द्रिय ज्ञान दोनों ब्रह्मचर्य में बाधक हैं, ब्रह्मचर्य का पालन करने के लिये स्वप्न में भी सावधान रहना पड़ता है, सौन्दर्य प्रदर्शन ब्रह्मचर्य का अपमान है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
आज दहेज़ रूपी दानव के कारण कितनी कन्याओं की माँग सूनी हो गयी है तथा हँसती खिलखिलाती जिन्दगी नरक के समान हो गयी है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
एक बार का विषय भोग उपजाऊ जमीन में बट के बीज की तरह फलता है, वह अपना फल जरूर देता है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
जगत की प्रत्येक घटना शिक्षा देती है, किन्तु विषय वासनाओं के कोलाहल में हमें सुनाई नहीं देती है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
भड़कीला परिधान, बालक बालिकाओं की सह-शिक्षा, अधिक उम्र में शादी, इत्यादि बलात्कार के कारण हैं। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
ब्रह्मचर्य के अभाव में अल्पायु में ही बाल सफेद हो जाते हैं, स्मरण शक्ति नष्ट हो जाती है, आँखें कमजोर हो जाती हैं, चेहरे का तेज नष्ट हो जाता है, कानों से सुनाई नहीं देता है, दाँत गिर जाते हैं, जिव्हा लड़खड़ाने लगती है, छोटी सी विपत्ति में, मेहनत में, चलने में ही थकान हो जाती है, शरीर में झुर्रियाँ पड़ जाती हैं एवं अल्पायु में ही मरण हो जाता है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
ग्लानि, मूर्च्छा, भ्रान्ति, कम्पन, श्रम, पसीना, अङ्गो में विकार तथा क्षय रोगादिक दोष प्राणियों में मैथुन से उत्पन्न होते हैं। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
अति कामना उत्पन्न करके दुःख उत्पन्न करता है, इसलिए वह काम कहलाता है, अनेक मनुष्य और तिर्यञ्च लड़-लड़ कर मर जाते हैं, इसलिये भी काम कहलाता है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
एक स्त्री के कारण पुरूषों को आरम्भ परिग्रह में फँसना पड़ता है, फिर वहाँ से निकलना मुश्किल होता है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
कामभोग में एकक्षण का सुख, बहुकाल दुःख, सीमित सुख, असीमित दुःख, काम भोग मुक्ति के विरोधी व अनर्थों के मूल हैं। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
सूर्पनखा की नाक लक्ष्मण ने नहीं काटी थी, एक विवाहिता होकर भी पर पुरुष की इच्छा की थी इसलिए कट गयी थी। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
चाहे तीर्थ पर जाओ, या एक पैर पर खड़े रहो, या जल में डूबो, या पर्वत के शिखर से कूदो, जैसे शिला पर बीज फलता नहीं उसी प्रकार ब्रह्मचर्य से रहित मनुष्य भी सिद्धि को प्राप्त नहीं होता है। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
तेतीस करोड़ साठ लाख की अल्पसंख्या वाले देश अमेरिका में प्रतिदिन लगभग चौदह सौ चालीस तलाक दिये जाते हैं। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
स्त्रियों के मुख के विकार को 'हाव' कहते हैं, मन में उत्पन्न विकल्पों को 'भाव' कहतें हैं, नेत्रों के चलाने को 'विलास' कहते हैं और दोनों भोहों के चलाने को 'विभ्रम' कहते हैं। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
इन्द्र के समान धीर-वीर अचिन्त्य पराक्रम के धारी रावण आदि स्त्रियों के कारण नरक में चले गए हैं। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
जो एक माह के अन्तराल से केवल पानी लेता है, ऐसा साधु भी स्त्री की सङ्गति पाकर मोहित हो जाता है, फिर जो षट् रस भोजन करते हैं उनको कितनी काम की बाधा होगी? घास फूँस तृण जे भखें, तिन्हे सतावे काम। षट् रस भोजन जे करे, उनकी जाने राम।। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
माता, बहिन और पुत्री के साथ भी एकान्त में नहीं बैठना चाहिये क्योंकि इन्द्रियाँ विद्वान् को भी पतित कर देती हैं। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
जिन्होंने कभी घी नहीं देखा, वे ही तिली के तैल को मीठा कहते हैं, उसी प्रकार जिन्हें परमानन्द प्राप्त नहीं हुआ वे ही विषयों को मनोहर कहते हैं। ब्रह्मचर्य 0 – भेजें
विषयासक्त मनुष्य के मनुष्यता, विद्वत्ता, कुलीनता एवं सत्यवचन आदि कौन से गुण नष्ट नहीं हो जाते हैं? ब्रह्मचर्य 0 – भेजें