Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
ब्रह्मचर्य

यां चिन्त्यामि सततं मयि सा विरक्ता, साप्यन्न मिच्छति जनं स जनोऽन्य सक्तः। अस्मत् कृते च परितुष्यति काचिदन्या, धिक् तां तं तं च मदनं च इमां च मां च।।

राजा ने रानी को अमृत फल दिया ताकि रानी हमेशा सुन्दर बनी रहे, रानी ने कोतवाल को दिया, उसने वेश्या को दिया, वेश्या ने राजा को दिया, राजा फल को देखकर चिन्तन करने लगा। मैं जिस रानी का निरन्तर चिन्तन करता हूँ, वह रानी मुझसे विरक्त है और वह कोतवाल को चाहती है कोतवाल वेश्या को चाहता है वेश्या मुझे चाहती है, इसीलिए उस रानी को धिक्कार...

The king gave the queen a nectar-fruit so she would stay ever beautiful; the queen gave it to the police chief, he to a courtesan, the courtesan to the king; seeing the fruit, the king fell to reflecting: "The queen on whom I constantly think is indifferent to me and desires the police chief; the chief desires the courtesan; the courtesan desires me. So shame on that queen, on him, on lust, on her, and on me!" (text continues on next page)

— आराध्य सूत्र · #65

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जिसने वैराग्य रूपी तलवार के द्वारा इन्द्रियरूपी चोरों को नष्ट कर दिया उसको स्वर्ग मोक्ष अवश्य प्राप्त होता है। वैराग्य के बिना शरीर को दण्डित करना व्यर्थ है। जब चित्रादि में निर्मित स्त्री मन में क्षोभ उत्पन्न करती है तब स्त्री के संसर्ग और वार्तालाप में मन एकाग्र कैसे रह सकता है?
ब्रह्मचर्य