Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
अनासक्ति

कर्म परवशे सान्ते, दुःखैरन्तरितोदये। पाप बीजे सुखेऽनास्था, श्रद्धानाकाङ्क्षणा स्मृता।।

पराधीन, बाधासहित, जिसकी परम्परा टूट जाती है एवं बन्ध का कारण हीनाधिक प्राप्त होने वाला इन्द्रिय विषय जन्य सुख ‘दुःख’ ही है ऐसी श्रद्धा होना निःकाङ्क्षित अङ्ग है।

The pleasure born of the senses — dependent, mixed with hindrance, whose continuity breaks, a cause of bondage, and gained in greater or lesser measure — is really 'sorrow'; holding such conviction is the limb of freedom from craving.

— आराध्य सूत्र · #2

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किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति