Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
अनासक्ति

वनेऽपि दोषाः प्रभवन्ति रागीणां, गृहेऽपि पञ्चेन्द्रिय निग्रहस्तपः। अवद्य मुक्ते पथि गच्छतो भवेत्, विमुक्त रागस्य गृहं तपोवनं॥

रागी वन में रहकर के भी पाप करता है और घर में भी पञ्चेन्द्रियों के निग्रह से तप होता है। रागरहित (राम के भाई भरत की तरह) निष्पाप मार्ग में चलने वाले के लिए घर ही तपोवन होता है।

An attached person sins even living in the forest, while even at home restraint of the five senses is austerity. For one free of attachment who walks the sinless path (like Bharata, Rama's brother), the home itself is a grove of austerity.

— आराध्य सूत्र · #49

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किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति