Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
अनासक्ति

णिव्वेग तियं भावई, मोहं चइऊण सव्व दव्वेसु। जो तस्य हवे चागो, इदि भणिदं जिणवरिन्देहिं॥

संसार शरीर भोगों से विरक्त हो समस्त पदार्थों में मोह को छोड़ने से त्याग धर्म होता है ऐसा जिनेन्द्र भगवान् ने कहा है।

Detached from the world, the body and pleasures, and giving up delusion toward all things, one attains the dharma of renunciation—so Lord Jinendra has said.

— आराध्य सूत्र · #52

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किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति