Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
अनासक्ति

कार्यार्थं भजते लोको, न कश्चित् कस्यचित्प्रियः। वत्सः क्षीरक्षयं दृष्ट्वा, स्वयं त्यजति मातरं।।

संसार में कार्य के लिए कोई किसी की सेवा करता है परमार्थ से कोई किसी का प्रिय नहीं है, दूध का क्षय देखकर बछड़ा स्वयं ही माता को छोड़ देता है।

In this world people serve one another for their own ends; no one is truly dear to another. Seeing the milk dry up, the calf itself abandons its mother.

— आराध्य सूत्र

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किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति