Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
अनासक्ति

शुभचन्द्र और भर्तृहरि–राजा सिंहल के शुभचन्द्र और भर्तृहरि दो पुत्र हुए, 'राज समाज महा अघ कारण बैर बढावन हारा' अर्थात् राज और समाज को बैर एवं पाप का कारण जानकर दोनों विरक्त हो गये, एवं शुभचन्द्र जी ने वन में जाकर एक मुनिराज के निकट मुनि दीक्षा ले ली एवं घोर तप करना प्रारम्भ कर दिया, एवं भर्तृहरि पञ्चाग्नि तप करने वाले तापस का चेला बन गया, बारह वर्ष रहकर भर्तृहरि बहुत सी विद्या, तन्त्र, मन्त्र, यन्त्र, सीखकर जब जाने लगा, तब योगी ने एक सतविद्या और रसतुम्बी दी जिससे ताम्बा स्वर्ण बन जाता था, कुछ दिनों में भर्तृहरि के सैकड़ों शिष्य हो गये, और तन-मन से सेवा करने लगे, एक दिन उन्हें अपने भाई शुभचन्द्र की याद आई, वे कहाँ रहते हैं, और किस प्रकार हैं, और पता लगाने एक शिष्य को भेजा, जाकर देखा तो न कोई खाने की व्यवस्था है, न तन पर एक लङ्गोटी, सुन कर भर्तृहरि को बहुत दुःख हुआ, और शिष्य के हाँथ आधा तुम्बी रस भेजा, शुभचन्द्र जी ने कहा की पत्थर पर डाल दो, यह सुनकर भर्तृहरि को बहुत दुःख हुआ, और स्वयं आधा तुम्बी रस लेकर भाई से मिलने चले गये, प्रणाम करके रस तुम्बी भेंट की, शुभचन्द्र जी ने उसे पत्थर पर फेंक दिया, देख कर भर्तृहरि को दुःख हुआ, और कहा की आपने मेरी बारह वर्ष की कमाई नष्ट कर दी, आपने अभी तक क्या प्राप्त किया है? दिखाइये, तब शुभचन्द्र जी ने पैर के नीचे की थोड़ी सी धूल उठा कर शिला पर डाल दी, तो शिला स्वर्णमय हो गयी, भर्तृहरि अवाक् हो गए और चरणों में गिरकर दीक्षा की प्रार्थना की, तब शुभचन्द्र जी ने विस्तृत धर्मोपदेश देकर उनके हृदय के कपाट खोल दिए, भर्तृहरि को दीक्षित करके योग का अध्ययन कराने के लिए ज्ञानार्णव ग्रन्थ की रचना की।

Shubhachandra and Bhartrihari, two sons of King Simhal, seeing that kingship and society breed enmity and sin, grew detached. Shubhachandra took ascetic initiation from a Muni and undertook severe penance, while Bhartrihari became a disciple of a five-fire penance ascetic. After twelve years, when Bhartrihari was leaving, the yogi gave him a magic power and an alchemical gourd that turned copper into gold; he soon had hundreds of disciples. Recalling his brother, he sent a disciple who found Shubhachandra without food or even a loincloth. Grieved, Bhartrihari sent half his gourd-elixir; Shubhachandra told him to pour it on a stone. Going himself, he offered the elixir, but Shubhachandra flung it on a rock. When Bhartrihari lamented that twelve years' gain was wasted and asked what his brother had achieved, Shubhachandra sprinkled a little dust from beneath his foot onto a slab and it turned to gold. Astonished, Bhartrihari fell at his feet begging for initiation. Shubhachandra opened his heart with teaching, initiated him, and composed the Jnanarnava scripture to teach him yoga.

— आराध्य सूत्र · #46

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किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति