Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
अनासक्ति

हमारे हाथ अर्थी के बाहर कर देना- बड़े-बड़े राजा महाराजाओं को भी धर्म की शरण लेना पड़ती है। जब सम्राट सिकन्दर दक्षिण भारत की यात्रा पर आने लगा, तब अपनी माँ से आशीर्वाद लेकर निकला और माँ से कहता है, हे माता श्री! आपकी कोई इच्छा तो नहीं है? माँ ने कहा बेटा अपने देश में दिगम्बर साधुओं के दर्शन दुर्लभ हैं, इसलिये तुम भारत से दिगम्बर साधु को जरूर लाना। सिकन्दर अपनी यात्रा पूर्ण होने के बाद जब स्वदेश को लौटने लगा तो माँ की बात याद आयी, तब सिकन्दर ने अपने डेरे से एक दूत को दिगम्बर साधु के पास भेजा। दूत ने कहा महाराज हमारे सम्राट ने आपको बुलाया है, मुनि ने कहा हे पथिक! ये बताओ प्यासा कुंए के पास जाता है या कुंआ प्यासे के पास जाता है? मुनिराज के वचन सुनकर दूत सिकन्दर के पास वापस जाता है, और समाचार सिकन्दर को देता है। सिकन्दर शर्मिन्दा होता हुआ मुनि के पास जाकर सविनय निवेदन करता है, हे भगवन्! आप हमारे राज्य को पवित्र करने का कष्ट करें। मुनि ने चलने का मानस बना लिया, किन्तु मुनिराज ने निमित्त ज्ञान से ये जान लिया कि सिकन्दर का जीवन मात्र अन्तर्मुहूर्त का है। सिकन्दर अपने जीवन का अन्त समय सुनकर दुःखी होकर बोला भगवन्! मुझे बचा लिजिये। महाराज ने कहा हे राजन! मणी मन्त्र तन्त्र बहु होई मरते न बचावे कोई। सिकन्दर ने मन्त्री से कहा चाहे मेरा कोई आधा राज्य लेले, पर मुझे बचाले, बहुत ही प्रयास किया लेकिन जब कोई नहीं मिला, तो सिकन्दर कहता है जब मेरी अर्थी निकाली जाय, तब मेरे दोनों हाथ अर्थी के बाहर निकाल देना, ताकि लोगों को ये पता चल सके, कि जिस सिकन्दर ने सारी उम्र बहुत धन लूटा पर अन्तिम समय हाँथ खाली थे। सभी सङ्ग में दौलत, सभी हाली हवाली थे। सिकन्दर जब गया दुनिया से, दोनों हाथ खाली थे।।

'Leave my hands hanging out of the bier'—Even the greatest of kings must take refuge in dharma. When Emperor Alexander set out to travel to South India, he took his mother's blessings and asked if she had any wish. She said, 'Son, in our land the sight of Digambar saints is rare; be sure to bring back a Digambar saint from India.' On his way home, remembering his mother's words, Alexander sent a messenger to a Digambar monk. The messenger said, 'Sire, our emperor summons you.' The monk replied, 'O traveller, tell me—does the thirsty man go to the well, or the well to the thirsty man?' Hearing this, the messenger returned and reported to Alexander, who, ashamed, went himself and humbly begged the monk to sanctify his kingdom. The monk agreed to go, but by his knowledge of signs he perceived that Alexander had only a muhurta of life left. Hearing his end was near, Alexander cried in distress, 'Lord, save me!' The monk said, 'O king, there are many gems, mantras and spells, but none can save one from death.' Alexander offered his minister half his kingdom to save him; despite every effort none could, so he said, 'When my bier is carried out, leave both my hands hanging outside it, so that people may know that Alexander, who plundered vast wealth all his life, went with empty hands.' All the wealth and all the companions stayed behind; when Alexander left the world, both his hands were empty.

— आराध्य सूत्र · #65

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किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
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