Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
अनासक्ति

छिज्जदु वा भिज्जदु वा, णिज्जदु वा अहव जादु विप्पलयं। जम्हा तम्हा गच्छदु, तहवि हु ण परिग्गहो मज्झ।।

विषम परिस्थिति में भी आचार्यश्री के मुख से समयसार निसृत होता है- ज्ञानी जीव ऐसा विचार करता है, कि शरीर आदि पर द्रव्य छिद जावे, भिद जावे, इसे कोई ले जावे, विनाश को प्राप्त हो जावे अथवा जिस-तिस तरह चली जावे तो भी परिग्रह मेरा नहीं है।

Even in dire circumstances the Samayasar flows from the Acharya's lips: the enlightened soul reflects thus — 'though the body and other substances be cut, pierced, carried off, destroyed, or depart in any way whatever, still this possession is not mine.'

— आराध्य सूत्र · समयसार · #3

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किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति