Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
अनासक्ति

जो चैत्यालय, चैत्य, दान, प्रतिष्ठादि महोत्सव और समीचीन यात्रा के करने में तत्पर हैं, नाना शास्त्रों के ज्ञाता हैं, परीषह सहन करते हैं, दूसरों के कार्य में रत हैं, परिग्रह रहित हैं और तपस्वी भी हैं, ऐसे बहुत मनुष्य हैं परन्तु जो राग-द्वेष-मोह के त्याग में तत्पर हों, आत्मतत्त्व में लीन हों वे तपस्वी दुर्लभ हैं, त्याग तपस्या दूसरे के बल से नहीं आत्म बल से होती है।

Many people are diligent in temples, images, charity, consecration festivals and proper pilgrimage, are learned in various scriptures, endure hardships, work for others, are without possessions and are ascetics too; but rare are the ascetics intent on renouncing attachment, aversion and delusion and absorbed in the soul. Renunciation and austerity come not by another's strength but by the strength of one's own soul.

— आराध्य सूत्र · #10

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किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति