Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
अनासक्ति

एक आचार्य के दो शिष्य थे, एक ने वेश्या के बगीचे में चातुर्मास करने की आज्ञा ली, दूसरे ने शेर की गुफा में बैठकर चतुर्मास की आज्ञा ली, चतुर्मास के बाद जिन्होंने वेश्या के बगीचे में चातुर्मास किया, गुरु ने उनको विशेष आशीर्वाद दिया, शेर की गुफा वाले मुनि ने अगला चातुर्मास वेश्या के बगीचे में माँगा, गुरू ने रोका तो भी नहीं माने, वेश्या का राग सुनकर वे विचलित हो गये, वेश्या से अपनी भावना प्रकट की, वेश्या ने रत्नकम्बल की माँग की, साधु बारह वर्ष का कठोर परिश्रम करके रत्नकम्बल लाये और वेश्या को दे दिया, वेश्या ने पैर पोंछकर उसे नाली में फेंक दिया, साधु चकित हो गये, पूँछने पर वेश्या ने कहा जिस प्रकार आपने अपने कीमती संयम को खो दिया, वह रत्नकम्बल को फैकने के ही समान है, ऐसा कहकर वेश्या ने साधु का स्थितिकरण किया था।

An acharya had two disciples; one took leave to keep the four-month retreat in a courtesan's garden, the other in a lion's cave. The one who stayed near the courtesan yet remained steadfast earned the guru's special blessing. The lion-cave monk insisted on the courtesan's garden next time despite the guru's refusal, grew disturbed by her singing and confessed his feelings. She demanded a jewel-blanket; the monk toiled twelve years to obtain it, and she wiped her feet with it and threw it in the drain. When he was shocked, she said: just as you cast away your precious self-restraint, this is like throwing away the jewel-blanket. Thus she re-established the monk in dharma.

— आराध्य सूत्र · #5

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किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति