Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
अनासक्ति

सपरं बाधासहियं, विच्छिण्णं बन्धकारणं विसमं। जं इन्दियेहिं लद्धं, तं सोक्खं दुक्खमेव तहा।।

इन्द्रियों के द्वारा प्राप्त होने वाला सुख पराधीन, बाधा सहित, अनियमित, बन्ध का कारण व हीनाधिक एवं दुःख रूप ही है।

The pleasure obtained through the senses is dependent, hindered, irregular, a cause of bondage, unequal, and is nothing but sorrow.

— आराध्य सूत्र · #3

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किसी वस्तु के संयोग के लिए शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि संयोग में शान्ति और स्वाधीनता नहीं है किसी वस्तु के वियोग में शोक करना इसलिए व्यर्थ है क्योंकि पर की रक्षा अपने अधीन नहीं है व पर का अपने से तादात्म्य नहीं है तथा वियोग में अपने स्वरूप की हानि भी नहीं है।
अनासक्ति
धर्म कथा सुनते समय, श्मशान में शवदाह की ज्वाला देखते समय और रोग से सन्तप्त रोगी के कष्ट का अनुभव करते समय मानव हृदय में जो संसार से विरक्त होने की बुद्धि पैदा होती है, यदि वह मनोदशा मस्तिष्क में क्षणिक न रहे स्थिर हो जाये तो मनुष्य संसारी मायाजाल से शीघ्र ही मुक्ति पा लेता है।
अनासक्ति