Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Attachment & Detachment

अनासक्ति

630 सूत्र · पृष्ठ 6 / 9

मुनिराजों में जैसे-जैसे शास्त्रज्ञान की वृद्धि होती जाती है वैसे-वैसे ही संसार से उनकी आसक्ति दूर होती चली जाती है।
अनासक्ति
मोक्षलक्ष्मी समागम में उत्सुक मुनियों ने शान्ति के महायुद्ध में 'ज्ञान रूपी शस्त्र' के द्वारा 'रागरूपी' पहलवान को मार गिराया है।
अनासक्ति
शान्त चित्त वाले मनुष्यों को स्थायी हित के लिए वैराग्य ही प्रिय होता है।
अनासक्ति
ज्ञानी को संसार में नहीं, संन्यास में आनन्द आता है।
अनासक्ति
साढ़ूमल में पण्डित हीरालालजी शास्त्री रोज प्रवचन करते थे, एक व्यक्ति रोज प्रवचन सुनता था, पर गरीब था, अत: अपने घर से पाँचवे घर में चोरी करने गया, पर पाप के डर से, इसमें कम पाप लगेगा ऐसा मानकर एक बोरा भूसा की चोरी की, बोरा फटा था, तो भूसा वहाँ से घर तक गिरता रहा ध्यान नही दिया, लाइन बन गयी, सुबह लोगों ने देखा तो वह पकड़ा गया, पञ्चायत हुयी, पूछा तुमने चोरी की है, उसने कहा! हाँ की है, क्यों की है? तब कहा! हम तीन दिन से पानी में आटा घोलकर पीकर दिन निकाल रहे हैं, हमारा बेटा तीन दिन से दूध मांग रहा है उसको कब तक दूध के स्थान पर पानी में आटा घोलकर पिलाते रहेंगे? हमने सोचा एक बोरा भूसा चार आना में बिकेगा, तीन-चार दिन दूध आयेगा, फिर आगे देखेंगे, क्योंकि पण्डित जी रोज प्रवचन में कहते हैं ज्यादा आसक्ति नहीं रखना चाहिये, प्रवचन सुनने का यह परिणाम था।
अनासक्ति
गणधरादि हमारे लिये पत्र लिख गये कि स्त्री-पुत्रादि सब पराये हैं, हमने पत्र की पूजा तो की पर खोल कर देखा ही नहीं।
अनासक्ति
पक्षपात न करना, निदान को न बांधना, सब जीवों में समदर्शी होना, इष्ट से राग और अनिष्ट से द्वेष न करना, स्त्री, पुत्र, मित्र आदि में स्नेह रहित होना ये सब शुक्ल लेश्या वाले के लक्षण हैं।
अनासक्ति
आचार्य भगवन् पूँछते हैं हे भव्य! सच-सच बताओ कि तूने इस संसार में बन्धुजनों के द्वारा आत्म हितकारी कुछ प्राप्त किया है अर्थात् नहीं? किन्तु इतना अवश्य है कि मरने के पश्चात तुम्हारे इस अहितकारी शरीर को ये सब मिल करके भस्म कर देते हैं।
अनासक्ति
'निकटभव्य' में विषयों से विरक्ति, परिग्रह का त्याग, कषायों का शमन, शान्ति, आजीवन नियम, इन्द्रिय दमन, तत्त्व अभ्यास, तपश्चरण में पुरुषार्थ, मोक्ष के लिए पक्का इरादा, जिनेन्द्र भगवान में भक्ति और दयालुता पायी जाती है।
अनासक्ति
शरीर, घर, धन, स्त्री, पुत्र, मित्र, शत्रु ये सभी भिन्न स्वभाव वाले हैं फिर भी अज्ञानी इन्हें अपना मानता है।
अनासक्ति
धन और नारी का मोह छोड़ दिया जाय, तो शेष मोह अपने आप छूट जाता है।
अनासक्ति
पर के सम्बन्ध से होने वाली चिन्ता शुभ-अशुभ रूप क्यों न हो, निश्चय से बन्ध कराती है, अतः मुझ मुमुक्षु को पर की चिन्ता से क्या प्रयोजन है? मैं सदा एक हूँ अतः मुझे पर से क्या प्रयोजन है?
अनासक्ति
मोक्ष के लिए प्रयास करने वाला ज्ञानी जीव संसार, शरीर और भोगों से विरक्त रहता है और ब्रह्मचर्य, व्रत, ध्यान, तप, दया में राग भाव करता है, तथा कषायों को बीमारी के समान देखता है।
अनासक्ति
अन्य पुरुष के रहने पर चिन्ता होती है, चिन्ता से कर्मबन्ध होता है और उससे संसार बढ़ता है इसलिए मोक्ष की इच्छा करने वाले मनुष्य को 'सब चिन्ताओं से रहित मैं एक हूँ, निश्चिन्त हूँ' ऐसा चिन्तन करना चाहिए।
अनासक्ति
स्नेह असंयम का मूल होने से स्नेह युक्त व्रत, तप व संयम प्रशंसनीय नहीं है, पाप ज्ञान का वध करता है।
अनासक्ति
'ये वस्तुएं मेरे भोगने योग्य हैं, मैं भोक्ता हूँ' यह अशुभ भाव 'सङ्कल्प' कहलाता है।
अनासक्ति
घर में सर्प होने पर निकाले विना शयन करना मुश्किल है, उसी तरह संसार रूपी वन को पार किये विना सुखी होना मुश्किल है।
अनासक्ति
संसार में कुछ भी अत्यावश्यक या अपरिहार्य नहीं, हम इस जगत पर निर्भर रहते हैं, यह जगत हम पर निर्भर नहीं रहता है, संसार हमारे विना पहले भी चलता आ रहा था, और आगे भी चलता रहेगा।
अनासक्ति
सांसारिक लगाव कम कीजिए, व सांसारिक वस्तुओं का संग्रह कम कीजिये, संसार एक विशाल जङ्गल है, इसमें आप जितना घुसते जायेंगे उतना खोते जायेंगे और भ्रमित होते जायेंगे, आपके विकास का मार्ग संसार के विभिन्न अनुभवों की संख्या बढ़ाने में नहीं वरन् अपनी चेतना में गुणात्मक परिवर्तन करने में है।
अनासक्ति
चीजों को अपने आप होने दीजिए जबरदस्ती मत करिये, अपने नाम के एकाउन्ट, जमीनादि में अनावश्यक टांग अड़ाना छोड़िये।
अनासक्ति
संसार द्वन्द्वात्मक है- सुख-दुःख, शत्रु-मित्र, रात-दिन, सर्दी-गर्मी दोनों आते हैं अतः समता रखना चाहिए यदि आप अपमान नहीं चाहते तो आपको प्रशंसा पाने की इच्छा भी छोड़ना चाहिए।
अनासक्ति
लालसा और इच्छाओं पर नियन्त्रण- भौतिक इच्छाओं और इन्द्रिय सुखों से प्राप्त तृप्ति अस्थायी और पीड़ा से युक्त होती है, हम इन क्षणिक सुखों से अधिक ऊँची किस्म की प्रसन्नता के अधिकारी हैं, जो स्थायी और सन्तोष जनक है, आवश्यकताएँ और आराम देने वाली मूल वस्तुएं जीवन को बनाए रखने के लिए जरूरी हैं तथा प्रकृति से प्राप्त होने वाला सुख सात्विक है, जबकि इच्छाओं में तामसिक व राजसिक सुख गर्भित है अपने विकास और जीवन के सत्यों को जानने की इच्छाएं अच्छी इच्छाएं हैं।
अनासक्ति
चीजों को त्यागना सीखिए- वास्तव में सच्चाई यह है कि खुशी चीजों को एकत्रित करने में नहीं वरन त्यागने अर्थात् उनका मोह छोड़ने में है। आप जब अपने को किसी विशेष चीज से जोड़ लेते हैं या आसक्त हो जाते हैं, तो आपके विचारों और कार्यों की स्वतन्त्रता खत्म हो जाती है। इससे आप सच्चाई को उस रूप में नहीं देख पाते हैं जैसी कि वह है और सच्चाई का वह अज्ञान कष्ट और विसङ्गति पैदा करता है।
अनासक्ति
आवश्यकता शरीर से जुड़ी है और आकङ्क्षा मन से। दुःख आवश्यकता में नहीं, आकाङ्क्षा में है।
अनासक्ति
सत्ता और शक्ति के पीछे भागें नहीं, उनको अपने आप आने दें, महानता सदैव अपने प्रयत्नों से प्राप्त की जाती है, यह किसी को उपहार में बहुत कम मिलती है। निषेध में आकर्षण होता ही है।
अनासक्ति
दिगम्बर मुनि होने के लिए केवल वस्त्र ही नहीं उतारना पड़ते वल्कि मन से वासनाओं को भी उतारना पड़ता है।
अनासक्ति
वह कौन सी गति है जो सैकड़ों बार प्राप्त न हुई हो, वह कौन सा सुख है जिसे पहले अनेक बार न भोगा हो और वे कौन सी लक्ष्मियाँ हैं जो अनेक बार प्राप्त न हुई हों, हे मन! फिर भी तुम्हारी इच्छायें बढ़ती जा रही हैं।
अनासक्ति
जैसे मकड़ी जाल तोड़कर बाहर नहीं जाती है, उसी में मर जाती है, उसी प्रकार प्रायः गृहस्थों का हाल होता है।
अनासक्ति
भावनात्मक लगाव को कम कीजिए, जीवन को सरलता से लीजिए, हमें यह तथ्य समझना चाहिए कि कोई भी समस्या हमेशा रहने वाली नहीं है।
अनासक्ति
भरतचक्रवर्ती की अपेक्षा राम के भाई भरत ज्यादा अच्छे हैं, क्योंकि उनको सिंहासन मिला पर बैरागी रहे, भरतचक्रवर्ती ने साठ हजार वर्ष दिग्विजय में ही गंवा दिये।
अनासक्ति
छिलका और चावल- 'जिस शरीर में धर्म के साधक जीव का निवास है, उस शरीर की रक्षा बड़े यत्न से करना चाहिए' इस प्रकार की शिक्षा जिनागम का ऊपरी छिलका है, और 'देह त्यागने योग्य ही है' यह शिक्षा जिनागम का चावल है, असली बाह्य परिग्रह तो शरीर ही है, उससे भी जो ममत्व नहीं करता वही परम निर्ग्रन्थ है और इन्द्रियों की विषयाभिलाषा अन्तरङ्ग परिग्रह है।
अनासक्ति
यदि पुरुष संसार लक्ष्मी में आसक्त हो जाता है, तो मुक्ति लक्ष्मी उससे दूर हो जाती है और यदि सांसारिक लक्ष्मी की उपेक्षा करता है तो मुक्ति लक्ष्मी निकट आती है।
अनासक्ति
राग-द्वेष से किये गये कार्य और त्याग से जीव को बन्ध होता है और तत्त्वज्ञान पूर्वक किये गये कार्य व त्याग से मोक्ष होता है।
अनासक्ति
खूबसूरती मदिरा से भी बुरी है, क्योंकि मदिरा पीने वाले को मदोन्मत्त करती है, खूबसूरती स्वयं को और देखने वालों को मदोन्मत्त करती है।
अनासक्ति
मछली मांस को ही देखती है, उसके नीचे छिपे काँटे को नहीं, वैसे ही यह जगत विषयों के बाह्य आकर्षण को ही देखता है, उससे होने वाले दुःख को नहीं देखता है।
अनासक्ति
जिसे संसार रैन बसेरा लगता है, उसे परिग्रह रखने की आवश्यकता नहीं होती है।
अनासक्ति
आसक्ति का राक्षस यदि नष्ट हो गया तो दुनियाँ तुम्हारी पूजा करेगी।
अनासक्ति
जो शरीर सुख में आसक्त है, वह आत्मा को ठगता है।
अनासक्ति
इष्ट पदार्थ कभी अलग न हो इस भाव को तृष्णा कहते हैं।
अनासक्ति
सुविधा का उपभोग करें पर सुविधा भोगी न बनें।
अनासक्ति
इच्छाओं का परिमाण और अनासक्ति यह अपरिग्रह का व्यवहारिक रूप है।
अनासक्ति
धर्म का आधार विरक्ति है और विरक्ति का फल विषय-कषाय का त्याग है।
अनासक्ति
भय वस्तु से पैदा नहीं होता राग से पैदा होता है, 'राग' विराग में बदला कि भय समाप्त हो जाता है।
अनासक्ति
हमारा आदर्श वीतरागता है उसे पाने का साधन संयम है।
अनासक्ति
चाह मोक्ष की हो जिसके बाद कोई चाह शेष नहीं रहती है।
अनासक्ति
विष और विषयों में अत्यन्त दूर का अन्तर है, क्योंकि विष तो खाये जाने पर मारता है परन्तु विषय स्मरण से भी मारते हैं।
अनासक्ति
महाकष्ट के चार कारण- 1.किसी वस्तु पर अधिकार रखना, 2.गर्भधारण करना, 3.कर्जदार होना, 4.कुत्ते की रति क्रिया प्रारम्भ में सुखकर अन्त में दुःखकर होती है।
अनासक्ति
प्रेम और घृणा करने वाले दोनों अन्धे होते हैं।
अनासक्ति
वैराग्य के पाँच सूत्र- 1.जीव यम के दाँतों के बीच रहकर भी जीने की इच्छा करता है, 2.संसारी प्राणी मोह उदय के कारण संसार से निकलने का उपाय नहीं करता है, 3.सारा संसार अज्ञान रुपी अन्धकार में जी रहा है, 4.पदार्थों के देखते ही राग या द्वेष रुपी जहर चढ़ता है, 5.पैर रखते ही पाप होना शुरू हो जाता है।
अनासक्ति
डाकिया पत्र लाता है, चाहे मृत्यु का हो या खुशी का सब में निरपेक्ष रहता है। आप भी डाकिया की तरह मध्यस्थ बने।
अनासक्ति
नदी के इस तरफ दर्पण रखा है उसमें नदी का पानी दिख रहा है व पर्वत पर लगी आग दिख रही है पर वह दर्पण पानी से गीला नहीं होता और अग्नि से जलता नहीं वह दोनों से निर्लिप्त रहता है।
अनासक्ति
जिससे ज्यादा राग हो वह धोखा दे तब लगता है राग दुःखदाई है।
अनासक्ति
वैराग्य के विना अध्यात्म का उपदेश पचता नहीं है।
अनासक्ति
सारा जीवन सुख के साधन जुटाने में और दुःख के साधन हटाने में निकल जाता है।
अनासक्ति
वैरागी को आभार भी भार लगता है।
अनासक्ति
जो अपना नहीं उसी की चिन्ता में संसार बसा है, संसार की असलियत देख लें तो राग खत्म हो जाये।
अनासक्ति
भोग का काल अल्प, लालसा का काल अनल्प होता है।
अनासक्ति
मोह से दूर होना याने मोक्ष के निकट होना है।
अनासक्ति
पर पदार्थ के आलम्बन से स्वसंवेदन छूट जाता है।
अनासक्ति
क्यों व्यर्थ रोते हो? तुम्हारा क्या गया जो रोते हो? तुम क्या लाये थे जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था जो नाश हो गया? तुम न कुछ लेकर आये थे, जो लिया यहीं से लिया, जो दिया यहीं पर दिया, खाली हाथ आये थे, खाली हाथ जाओगे, जो आज तुम्हारा है, कल किसी और का था, आगे किसी और का होगा, तुम इसे अपना समझकर मग्न हो रहे हो, बस यही प्रसन्नता तुम्हारे दुःख का कारण है।
अनासक्ति
खिलौने नष्ट होने के लिए ही होते हैं, बच्चे को पता नहीं होता इसलिए रोता है, किन्तु बड़े नहीं रोते पर बड़े खिलोने टूटने पर अज्ञानी रोने लगते हैं, ज्ञानी नहीं रोता है।
अनासक्ति
जीवन में कभी भूल करना नहीं और किसी से सम्बन्ध जोड़ना नहीं, सौ सगे सौ दुःख, हाथ जोड़ो पीछा छोड़ो।
अनासक्ति
क्या आप खाओ-पियो-मौज उड़ाओं के सिद्धान्त को ही अच्छा समझते हैं?
अनासक्ति
क्या आप पूजा-प्रतिष्ठा की चाह से मुक्त हैं?
अनासक्ति
क्या आप संसार की नश्वरता का कभी विचार करते हैं?
अनासक्ति
मानव ने जीवन में, विषय भोगों को चाह लिया। काजू की खीर में, हींग का बघार लगा दिया।।
अनासक्ति
परिवार में रहने से संसार बढ़ता है अतः व्यतीत रात्रि और व्यतीत जिन्दगी पर दृष्टि पात करो और आगे के लिए सजग हो जाओ।
अनासक्ति
भोग में रोग का भय है, सुख में क्षय होने का, धन में राजा का और अग्नि का, दास को स्वामी का, विजय में शत्रु का, कुल में खोटी स्त्री का, सम्मान में अपमान का, गुणों में दुष्ट का, शरीर में मृत्यु का सभी जगह भय है, 'केवल वैराग्य ही अभय है'।
अनासक्ति
यौवन, जीवन, मन, छाया व सौन्दर्य, लक्ष्मी और स्वामित्व ये छह चञ्चल हैं ऐसा जानकर धर्म में सलग्न होना चाहिए।
अनासक्ति
बुढ़ापे में जवानी से ज्यादा शौक होता है। भभकता है दीप जब बुझने को होता है।
अनासक्ति
सुख दुःख दाता कोई न आन, मोह राग रुष दुःख की खान। निज को निज पर को पर जान, फिर दुःख का नहीं लेश निदान।।
अनासक्ति
विपदा को धन राखिये, धन दीजे रख दार। आतम हित को छाड़िये, धन दारा परिवार।।
अनासक्ति
उत्तम जेल- संसार में सबसे उत्तम जेल ब्रिटेन में है, फ्रांस का एक व्यक्ति उसको देखने गया, प्रत्येक कमरे में रेडियो, टी-वी, टेलीफोन, फ्रिज, लाइब्रेरी सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं, जेल अधिकारी ने आगन्तुक से राय माँगी, उस व्यक्ति ने हँसकर कहा सब सुविधाओं के उपरान्त भी बन्धन तो बन्धन ही है, कैदी को सजा तो पूरी करना ही होगी, इसी प्रकार सांसारिक विषयों का बन्धन है।
अनासक्ति
मरघट में जाकर जगे, हर मन में वैराग्य। हर नाते को फूँक दे, वह मरघट की आग।।
अनासक्ति
दुनिया को छोड़ो तब भगवान् मिलते हैं, भगवान् को भी छोड़ो तब आत्मा मिलती है।
अनासक्ति