मणुआ सुरामरिंदा, अहिंछुदा इंदिएहिं सहजेहिं। असहंता तं दुःखं, रमन्ति विषयेषु रम्येषु।।
चक्रवर्ती, असुरेन्द्र और सुरेन्द्र स्वाभाविक इन्द्रियों से पीड़ित होते हुए, उस दुःख को सहन न कर सकने से रम्य विषयों में रमण करते हैं।
Emperors, lords of demons and lords of gods, tormented by their natural senses and unable to bear that pain, take delight in charming sense-objects.
— आराध्य सूत्र · #3
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