Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 32 / 41

जो यह संसारी जीव है उसके यह राग-द्वेष आदि अशुद्ध भाव होते हैं, उनसे ज्ञानावरणादि आठ कर्मों का बन्ध होता है, कर्मों से एक गति से दूसरी गति को प्राप्त होता है, गति को प्राप्त हुए जीव के औदारिकादि शरीर होता है, शरीर में इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं, इन्द्रियों से विषय ग्रहण होता है और उससे राग तथा द्वेष उत्पन्न होते हैं, संसार रुपी चक्र में भ्रमण करने वाले जीव के ऐसे अशुद्ध भाव अभव्य के अनादि-अनन्त और भव्य के अनादि-सान्त होते हैं, ऐसा श्री जिनेन्द्रदेव ने कहा है।
कर्म
पंजाब में एक मुस्लिम भाई रोज मुर्गी लाकर घर में काटता था, उनकी पीड़ा पर उसको आनन्द आता था, उसके तीन बच्चे थे, एक बच्चे ने छोटे भाई पर छुरी चलाई, वह चिल्ला कर मर रहा था, यह आनन्द ले रहा था, माँ के डर से वह छत से गिर कर मर गया, माँ छोटे बच्चे को टब में नहला रही थी, उसको छोड़कर ऊपर तक गई तब तक छोटा बच्चा टब में गिरा और डूबकर मर गया। इस प्रकार उसे हिंसा का फल उसी जन्म में मिल गया।
अहिंसा
मासोपवासी मुनि कंस बना– राजा उग्रसेन धर्मात्मा पुरूष थे, एक दिन उनके नगर में एक मासोपवासी मुनिराज का आगमन हुआ, राजा ने नगर में घोषणा करा दी कि मुनि का आहार राज महल में होगा, कोई साधु का पड़गाहन न करे, जब साधु चर्या को आये तब राजा के यहाँ पहली बार दासी का उपद्रव हो गया, साधु वापस चले गये और एक माह का पुनः उपवास ले लिया, पुनः साधु आये तो राजा ने वही घोषणा करायी, दूसरी बार नगर में हाथी का उपद्रव हो गया, पड़गाहन नहीं हो सका, साधु ने पुनः एक माह का उपवास किया, तीसरी बार साधु आये, तो उस समय नगर में आग लग गयी, इस प्रकार चार माह के उपवास हो गये। साधु बगीचे में ध्यान कर रहे थे, वहाँ से लोग निकले और चर्चा करने लगे कि ये राजा कितना दुष्ट है न स्वयं आहार देता है और न ही दूसरों को देने देता है। ये शब्द सुनकर साधु की कषाय भड़क गयी, निदान कर लिया कि अगले भव में मैं इसका बेटा बनूँ, मुनिराज संक्लेश परिणामों से मरे और उसी राजा की रानी के गर्भ में आये, तब रानी को ये भाव हुआ कि राजा के पेट को चीर कर खून पी लूँ, वे मुनि कंस बने और पिता को कारागार में डालकर यातनाएँ दीं।
क्षमा
भूल वश नींद की गोली खाई– जगदलपुर के डॉ. जगदीशचन्द्रमिश्र का बेटा उस दिन स्कूल जाने से मना कर रहा था, माँ ने कहा बेटा आज अन्तिम दिन है, कल से छुट्टियाँ होना है, स्कूल चले जाओ, टेबल पर तुम्हारी गोली रखी है उसको खालो, बेटा ने अपनी गोली के स्थान पर नींद की गोली खाई और स्कूल चला गया, वहाँ उसको नींद आने लगी तो वह क्लास से स्टोर रूम में जाकर सो गया, छुट्टी हो गयी, चपरासी ताला लगा करके चला गया, बच्चा वहीं सोता रहा, जब नींद खुली तो रो-रो कर भूख-प्यास के कारण स्वयं का मूत्र तक पिया और पुस्तकें तक फाड़ कर खालीं और मर गया, पन्द्रह दिन बाद पता चला, माँ की भूल से बच्चे की मौत हो गई।
विविध
पाँच मिनिट सेज पर सोने में ये सजा– एक दासी ने राजा की सेज लगाई और सोचा थोड़ी देर सोकर देखूँ, इतने में राजा आ गया, उसने कोड़े लगाये वह हँसती रही, राजा के पूँछने पर उसने कहा कि पाँच मिनट की इतनी सजा तो आप को कितनी सजा मिलेगी।
अनासक्ति
न्याय पूर्वक आजीविका हो, नव देवता की पूजा करने वाला हो, प्रशस्त वचन बोलने वाला हो, धर्म, अर्थ, काम पुरुषार्थ का एक-दूसरे की क्षति करने वाला न हो, गृहस्थ धर्म के योग्य स्त्री हो, सत्सङ्गति वाला स्थान हो, अयोग्य कार्य के करने में लज्जा वाला हो, योग्य आहार-विहार करने वाला हो, गुणवानों की सङ्गति करने वाला हो, बुद्धिमान हो, इन्द्रिय जेता हो, धर्म कथा सुनने वाला हो, कृतज्ञ हो, दयालु हो, पाप भीरु हो वह श्रावक कहलाता है।
चरित्र
जहाँ पर ज्ञान आगे है, लज्जा साथी है, तप का सम्बल है, चारित्र की पालकी है, ठहरने का स्थान स्वर्ग है, गुण रक्षक हैं, सरलता रुपी मार्ग है, समता रुपी घनी शीतल छाया है और दया की भावना है उस वाहन पर यात्रा करने वाले मुनि विना विघ्न के मोक्ष प्राप्त करते हैं।
धर्म
नरकाया को सुरपति तरसे- भगवान् के दीक्षा कल्याणक के समय पालकी उठाने में जब मनुष्यों को पहले अवसर मिलता है तो इन्द्र कहता है, कि हमारी पूरी इन्द्रपुरी कोई ले ले और कुछ समय के लिए नर पर्याय दे दे, उस समय उसे इन्द्रपुरी से भी मनुष्य पर्याय का मूल्य अधिक लगता है।
ज्ञान
आचार्यश्री से किसी ने पूँछा आपने गृहस्थी नहीं बसाई, संसार का सुख नहीं देखा और घर छोड़ दिया, तो आपको कैसे पता कि संसार असार है? आचार्यश्री ने कहा कि गृहस्थी वालों के संकट ग्रस्त और उदासीन चेहरे देखकर समझ लिया, कि संसार में सुख नहीं है।
अनासक्ति
विषम परिस्थिति में भी आचार्यश्री के मुख से समयसार निसृत होता है- ज्ञानी जीव ऐसा विचार करता है, कि शरीर आदि पर द्रव्य छिद जावे, भिद जावे, इसे कोई ले जावे, विनाश को प्राप्त हो जावे अथवा जिस-तिस तरह चली जावे तो भी परिग्रह मेरा नहीं है।
अनासक्ति
पिता की अन्तिम सीख- लोगों ने कहा पण्डितजी आपका बेटा बिगड़ रहा है, पण्डितजी ने कोशिश की लेकिन सुधार नहीं हुआ अन्त में पिताजी ने कहा बेटा अब हम जा रहे हैं, आप यदि व्यसन नहीं छोड़ते तो विपरीत क्रम से सेवन करें, वेश्या सेवन प्रातः करने जाय, दारू काउन्टर के पीछे से खरीदें, जुआ जब सज्जन कहे तब खेलें, अन्त में अनुभव आने पर बेटा सुधर गया।
चरित्र
एक नगर में राजा बनने के पाँच साल बाद राजा को जङ्गल में छोड़ दिया जाता था, इसलिए कोई राजा नहीं बनना चाहता था, एक राजा ने उस जङ्गल में नगर बसा लिया और अपने अनुकूल सारी व्यवस्था बना ली। इसी तरह मनुष्य पर्याय रुपी राजा बनकर मोक्ष नगर बसायें अन्यथा चौरासी लाख योनि के वन में जाने से कोई नहीं रोक सकता है।
समाधि
ससुर का तो जन्म ही नहीं हुआ- बहु ने मुनिवर से पूँछा आप इतनी जल्दी कैसे आ गये? मुनिवर ने कहा समय का क्या भरोसा, मुनिवर ने पूँछा तुम्हारी उम्र कितनी है? बहु ने कहा मेरी उम्र तीन वर्ष, पति की एक वर्ष, सासु की छः माह और ससुर का अभी जन्म ही नहीं हुआ, ससुर को सुनकर गुस्सा आया और बोला कि मेरे विना तेरा पति कहाँ से आया? और मुनि महाराज से इसका समाधान पाने के लिए गया, मुनि महाराज ने कहा जिसके जीवन में जब धर्म उतरता है तभी से उसका जन्म होता है इस अपेक्षा बहु ने ऐसा उत्तर दिया है।
धर्म
यह आँख खुली का वह आँख बन्द का-राजा का इकलौता बेटा मर गया, राजा की आँख खुली तो हँसने लगा, रानी के पूँछने पर बोला अभी-अभी स्वप्न में आठ आज्ञाकारी पुत्रों को देख रहा था, पर आँख खुलने पर वे गायव हो गये अब मैं सोच रहा हूँ, कि उसके खोने के लिए रोऊँ या इसके लिए रोऊँ, मन में आता है कि वो बन्द आँख का स्वप्न था और ये खुली आँख का स्वप्न है, दोनों झूठे है अतः रोना व्यर्थ है और राजा आत्म कल्याण में लग गया था।
समाधि
अभय दान प्रदाता मृगसेन धीवर- अवन्ती देश के अन्तर्गत शिरीष नामक ग्राम में मृगसेन नाम का धीवर रहता था। क्षिप्रा नदी में मछली मारने जाते समय यशोधर मुनिराज से जाल में आई प्रथम मछली न मारने का नियम लिया, एक बड़ी मछली पाँच बार जाल में आई पर उसने नहीं पकड़ा, खाली हाथ आता देख कर उसकी पत्नी 'घण्टा' ने नाराज होकर दरवाजा बन्द कर लिया। धीवर घर के बाहर पुराने काष्ठ पर 'णमोकार मन्त्र' पढ़कर सो गया, रात में सर्प के काटने से मर गया, पत्नी भी अगले जन्म में ये ही मेरे पति हों ऐसा निदान कर, साथ में उसी चिता में जलकर मर गयी। विशाला नगरी में राजा विश्वम्भर राज करते थे, रानी का नाम विश्वगुण था। वहीं गुणपाल सेठ एवं धनश्री सेठानी पुत्री के साथ रहते थे। धनश्री के गर्भ में मृगसेन धीवर का जीव आया। राजा से नर्मभर्म मन्त्री ने अपने पुत्र नर्मधर्म के लिए गुणपाल की पुत्री से विवाह करवाने के लिए कहा, सेठ अपनी स्त्री को अपने मित्र श्रीदत्त के पास छोड़कर पुत्री एवं कुछ धन लेकर कौशाम्बी में रहने लगा। आहार को आये शिवगुप्त व मुनिगुप्त में से छोटे मुनि ने धनश्री को देखकर शिवगुप्त मुनि से कहा ''इसके गर्भ में कोई अभागा आया है'', शिवगुप्त मुनि बोले ''तुम्हारा अनुमान गलत है, इसके गर्भ में धर्मात्मा पुत्र आया है और उसका विवाह राजपुत्री से होगा'', श्रीदत्त ने सुनकर ईर्ष्या वश पुत्र को मारने का विचार किया। प्रसव के समय धनश्री मूर्छित हो गयी। श्रीदत्त ने चाण्डाल को पुत्र देकर मारने को कहा, वह सुरक्षित स्थान पर छोड़ कर चला गया। श्रीदत्त का बहनोई इन्द्रदत्त माल बेचने आया, ग्वालों से सुनकर पुत्र को ले गया। श्रीदत्त को पता चला तो वह मायाचारी से बहन व भाञ्जे को लाकर पुनः चाण्डाल को लोभ देकर मारने को दिया, उसने दयावश नदी के किनारे गुफा में छोड़ दिया, वहाँ से ग्वालों का मुखिया गोविन्द ले गया। एक दिन श्रीदत्त घी खरीदने आया और सन्देश देने के बहाने धनकीर्ति को घर भेजा और पत्र में लिख दिया कि 'पत्र वाहक को विष देकर मार देना'। धीवर का जीव 'धनकीर्ति' पत्र गले में बाँधकर चला, रास्ते में थकान दूर करने एक वृक्ष के नीचे सो गया, फूल तोड़ने आई 'मछली का जीव' अनङ्गसेना वेश्या ने वह पत्र पढ़ा और आँख के काजल से उन शब्दों को बदल दिया, कि 'प्रिय यदि तुम अपना स्वामी समझती हो और पुत्र महाबल तुम मुझे अपना पिता समझते हो तो पत्र वाहक के साथ पुत्री श्रीमती का विवाह कर देना। नींद खुलते ही उसने जाकर पत्र दिया, शुभमुहूर्त में श्रीमती के साथ उसका विवाह हो गया। श्रीदत्त को पता चला तो उसने गाँव के बाहर पार्वती के मन्दिर में उसको मारने के लिए व्यक्ति नियुक्त किया। आकर दामाद को पूजा की सामग्री देकर भेजा, रास्ते में साले 'महाबल' ने सामग्री लेली और मन्दिर गया तो महाबल मारा गया। हताश होकर पत्नी से दामाद धनकीर्ति को मारने को कहा, पत्नी ने साफ़ लड्डू विष मिश्रित व मैले लड्डू सादे बनाये और पुत्री से साफ़ लड्डू दामाद को व मैले लड्डू पिता को परोसने को कहकर नदी नहाने को चली गयी। पुत्री ने लज्जा वश मैले लड्डू पति को व साफ़ लड्डू पिता को परोस दिए, श्रीदत्त का मरण जान उसकी पत्नी ने भी विषैले लड्डू खाकर मरण किया। राजा ने धन कीर्ति के गुण व ब्रह्मचर्य की प्रशंसा सुनकर अपनी पुत्री की शादी कर व दहेज़ देकर राज श्रेष्ठी के पद पर नियुक्त किया। गुणपाल पिता अपने पुत्र के भाग्योदय को सुनकर पुत्र से मिला, कुछ दिन बाद सपरिवार यशोधर मुनि की वन्दना कर धनकीर्ति के पूर्व भव की कथा सुनी। धनकीर्ति पूर्व भव में धीवर था, घण्टा स्त्री इस भव में श्रीदत्त कि पुत्री श्रीमति वनी, मछली अनङ्गसेना वेश्या वनी, धनकीर्ति ने दीक्षा लेली। श्रीमति और अनङ्गसेना ने भी दीक्षा लेली, धनकीर्ति सन्यास पूर्वक प्राण त्याग कर सर्वार्थसिद्धि में अहमिन्द्र हुआ और आगे केवली हो मोक्ष प्राप्त करेगें। श्रीमति और अनङ्गसेना भी स्वर्ग गयीं। सच है दया धर्म रुपी कल्पवृक्ष से मनोवाञ्छित फल मिलता है।
अहिंसा
दो तरह के मार्ग- एक साधनों का मार्ग और एक साधना का मार्ग, साधनों का मार्ग सुख-सुविधा का एवं साधना का मार्ग स्वाधीन तपश्चर्या का मार्ग है, अतः भारतीय संस्कृति ने धर्म के लिए साधन सम्पन्न नहीं, साधना सम्पन्न निरूपित किया है, यहाँ भोग को नहीं योग को, राग को नहीं त्याग को स्थान मिला है, सारा संसार विषयासक्त है, यहाँ विषय विरक्ति और आत्मानुरक्ति बड़ी दुर्लभ है, पर शुद्धि और सिद्धि का मार्ग एक तपश्चरण ही है, बुद्ध और महावीर की चिन्तन धारा का फर्क यही है कि बुद्ध ने कहा कि मन में उठे विकल्पों की पूर्ति करके मन को विश्राम भी देना चाहिए, इसलिए उन्होंने न अति भोग न अति त्याग, उन्होंने मध्यम मार्ग अपनाया, किन्तु भगवान् महावीर ने कहा, कि तृप्ति इच्छा की पूर्ति में नहीं त्याग में है। आत्मशान्ति के लिए त्याग और तप के मार्ग को अपनाना चाहिए। एक विचारक ने तो यहाँ तक लिखा कि जो लोग बीमार होने तक खूब खाते हैं, उन्हे ठीक होने तक उपवास और लङ्घन करने पढ़ते हैं, इन सभी विचार धाराओं में मन की कामनाओं पर नियन्त्रण बहुत जरूरी है, साकाङ्क्ष साधना खोखली मानी जाती है, सम्यक् तप आत्म शोधन में परम रसायन माना जाता है।
धर्म
धर्मसागरजी ने सागर में भुट्टा से कोई पड़गाहे तो आहार लेंगे ऐसी विधि ली थी, 4 दिन बाद विधि मिली।
धर्म
आचार्य शान्तिसागर जी घड़ी पहने हुए लोगों से आहार नहीं लेते थे, लेकिन सन् 1928 में कटनी चतुर्मास के दौरान नियम लिया कि जो हाथ में घड़ी लेकर पड़गाहन करेगा तब आहार लेंगे, आचार्य श्री पण्डित जगन्मोहनलाल जी के सामने से निकल गये थे, पण्डितजी ने सोचा कि अब पड़गाहन नहीं मिलेगा इसलिए उतारी हुई घडी पुनः हाथ में ले ली, आचार्य श्री लौट कर आये और घड़ी देखकर पड़गाहन हो गया, एक बार नियम लिया कि बैल के सींग में गुड़...
संयम
शिष्य की परीक्षा- एक शिष्य जिससे गुरु को बड़ा लगाव था, एक दिन गुरु की पत्नी ने कहा कि आपको इस शिष्य से कुछ ज्यादा ही लगाव है, बाकी अन्य शिष्यों से इतना लगाव क्यों नहीं रखते, तब गुरु ने अपनी पत्नी को बताने के लिए शिष्य की परीक्षा की और एक आम को पैर में बाँधकर फोड़ा जैसा बनाया और सब शिष्यों से कहा की यह फोड़ा चूसने पर ही ठीक होगा, ऐसा वैद्य ने कहा है, यह सुनकर बहाना बनाकर सभी शिष्य चले गये, तब वही शिष्य आया और गुरु के फोड़े को चूसने लगा, तब गुरु की पत्नी उस शिष्य को देखकर हैरान हो गयी, वह आम था, यह जानकार सारे शिष्य को बड़ी शर्मिन्दगी हुई और शिष्य की परीक्षा हो गयी कि वास्तव में उसके पास श्रद्धा, भक्ति, विनय, सेवा भाव एवं कृतज्ञता थी।
भक्ति
स्वाध्याय-''ताश का विश्वास मोक्षमार्ग का''-पन्द्रह मिनट के स्वाध्याय ने जीवन बदल दिया। एक जुआरी ने साधु के दर्शन से दो नियम लिए, पहला देव दर्शन, दूसरा पन्द्रह मिनट का स्वाध्याय और पाँच मिनट का चिन्तन, एक दिन वह मन्दिर देरी से गया, भगवान् के दर्शन खिड़की से हो गये, लेकिन स्वाध्याय को शास्त्र जी नहीं मिला, जेब से ताश के पत्ते निकाल कर चिन्तन शुरू किया। पहला पत्ता इक्का पर विचार करता है- निश्चय से मैं एक हूँ, शुद्ध हूँ, दर्शन-ज्ञान मय हूँ, सदा अरूपी हूँ, परमाणु मात्र भी अन्य द्रव्य मेरा कुछ नहीं है। 2 नं. के पत्ते पर विचार- जिस प्रकार दो छोर वाली रस्सी से मथानी मटकी में भ्रमण करती है उसी प्रकार राग-द्वेष रुपी दो छोरों के माध्यम से यह जीव संसार रुपी मटकी में भ्रमण करता है। 3 नं. पर विचार- मिथ्यादर्शन-ज्ञान-चारित्र ये तीन संसार के कारण हैं एवं सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र ये तीन मोक्ष के कारण हैं। 4 नं. पर विचार चार कषाय से चार गति में भ्रमण होता है। पाँच पापों से पञ्च परावर्तन होता है। छह लेश्याओं में तीन शुभ और तीन अशुभ होती हैं। सप्त व्यसनों के सेवन से सातों नरकों में भ्रमण होता है। अष्ट मद एवं अष्ट शंकादि दोष त्यागे नहीं तथा अष्ट मूलगुण धारण नहीं किये। नौ पथार्थों को जाना नहीं। दस धर्म धारण नहीं किये। ग्यारह प्रतिमा पाली नहीं। बारह तपों को तपा नहीं। ''इस प्रकार बारह भावनाओं का चिन्तन करने से वैराग्य हो गया'', तब तेरह प्रकार का चारित्र पालन करेंगेऔर मोक्ष प्राप्त करेंगे। सीधे क्रम से चिन्तन करता है कि आदमी अकेला आया है, अकेला ही जायेगा, पुनः शरीर धारण नहीं करना पड़ेगा, यदि रत्नत्रय को धारण किया है, चार अनुयोगों का अध्ययन किया है, पाँच महाव्रतों को धारण किया हैं, छः आवश्यकों का पालन किया है, सात तत्त्वों का चिन्तन किया है, आठ कर्मों से छूटेंगे, नव देवताओं में नम्बर आ जायेगा, दस धर्मों का उदय होगा, अब मन का गुलाम नहीं बनना पड़ेगा, इन्द्रियाँ बेगम नहीं बनेगी, आत्मा बादशाह होगी।
ज्ञान
सेठ को मुक्ति चाहिए- एक सेठ भगवान् की प्रतिदिन भक्ति करता एवं भगवान् के कान में निवेदन करता, कि भगवान् मुझे मुक्ति चाहिए, एक दिन एक देव ने आकर उसकी परीक्षा की, और कहा कि हम आपको आज से दसवे दिन मोक्ष ले चलेंगे, सेठ ने कहा दसवे दिन क्यों? देव ने कहा दस दिन में आपके दस लड़कों का एवं दस कारखानों का वियोग होगा, आप हलके हो जायेंगे, तब हम आपको मोक्ष ले जायेंगे, सेठ ने कहा यह तो टेड़ी खीर है, हमारे गले में नहीं उतरेगी, कोई दूसरी किस्म का मोक्ष हो तो आप आना, अन्यथा कष्ट नहीं करना।
अनासक्ति
यमराज का पत्र- सेठ ने यमराज से दोस्ती की और कहा आने के पूर्व पत्र देना, उसने वादा किया, पहला पत्र- सफेद बाल किये पर सेठ ने हेयर डाय करा लिया, दूसरा पत्र दाँत गिराये तो बत्तीसी लगवा ली, तीसरा पत्र आँख कान खराब किये, तो चश्मा और मशीन लगवा ली, चौथा पत्र अटैक आया तो बायपास सर्जरी करवा ली, जब यमराज लेने आया तो सेठ ने कहा आपने धोका किया, यमराज ने कहा हमने चार पत्र दिये थे पर आपने आत्म कल्याण के लिए प्रयत्न नहीं किया।
समाधि
मनुष्य की उम्र चालीस वर्ष (बाल कहानी)- ब्रह्माजी ने मनुष्य, कुत्ता, गधा और उल्लू इनको चालीस-चालीस वर्ष की उम्र दी, मनुष्य ने अपना काम पूछा, कि हमें क्या करना है? ब्रह्माजी ने बताया तो मनुष्य ने कहा, बहुत कम उम्र है, गधे ने कहा हम कब तक भार ढ़ोते रहेंगे। कुत्ते ने कहा हम कब तक द्वारे-द्वारे जाकर अपमानित होकर टुकड़े खाते रहेंगे, उल्लू ने कहा हम कब तक अन्धे बनकर जियेंगे, तब इन जीवों की आधी-आधी उम्र लेकर मनुष्य को दे दी, इसलिए मनुष्य चालीस वर्ष के बाद गधे की तरह भार ढ़ोता रहता है, साठ वर्ष के बाद कुत्ते की तरह द्वार पर बैठा रहता है और अस्सी के बाद उल्लू की तरह अन्धा बनकर बैठा रहता है।
समय
तीनों अवस्था व्यर्थ खो दीं- एकगरीब व्यक्ति पर प्रसन्न होकर राजा ने उसे तीन घण्टे के लिए रत्नों के कोठे में प्रवेश दे दिया, इतने समय में तुम जितने रत्न ले जाना चाहो ले जाओ, इसके बाद उस कोठे से एक भी रत्न नहीं ले सकते, उस मूढ़ ने रत्नमयी गोरख धन्धे का खिलौना देखा, हाँथ लगाते ही वह बिखर गया, द्वारपाल ने कहा इसको ठीक करो, तभी आगे जा सकते हो, उसने उसे ठीक करने में ही सारा समय निकाल दिया, एक भी रत्न नहीं ले पाया, द्वारपाल ने पकड़कर बाहर कर दिया। कृपालु राजा ने दुबारा उसे तीनघण्टे के लिए सोने, चाँदी, के कोठे में भेजा वहाँ पर स्त्रियाँ स्वागत के लिए खड़ीं थी, उनके स्वागत में वह भूल गया और सोने-चाँदी का कुछ भी सामान नहीं ले पाया, अन्त में राजा ने पीतल-ताम्बे के कोठे में भेजा, वहाँ पर भोजन-पानी रखा था, वह खा पीकर सो गया और सारा समय खत्म कर दिया और खाली हाथ घर गया, इसी तरह मानव बाल अवस्था खेल-खिलौनों में, जवानी भोगों में, बुढापा खा-पी कर सोने में गुजार देता है और मानव पर्याय में कुछ भी आत्महित नहीं करता है।
समय
जल तरणी विद्या- एक शिष्य ने बारह वर्ष में जल तरणी विद्या सिद्ध की, और उत्सुकता पूर्वक गुरु को बताया, तो गुरु ने कहा अरे दस रुपए की विद्या के लिए तुमने बारह वर्ष नष्ट कर दिए, नाविक को दस रुपए देकर पार हो जाते दस वर्ष क्यों गंवा दिए, यदि भव तरणी विद्या सीखी होती तो संसार से पार उतर गए होते।
विवेक
पाषाण से प्रतिमा- प्रतिमा की पूजा देख पाषाण खण्ड बोला, बहिन लोग बड़े पक्षपाती हैं तुम्हारा और हमारा अंश और वंश एक है, लोग तुम्हे पूजते हैं, और हमसे टिककर बैठते हैं, प्रतिमा ने कहा तुमने हमारी साधना और समर्पण नहीं देखा, हमारी छाती पर बैठकर छैनी-हथौड़ा से अनावश्यक कलेवर निकाला गया, तब आज हमारी पूजा हो रही है, पूज्य बनने के लिए साधना आवश्यक है।
पुरुषार्थ
गणेश प्रसाद वर्णीजी ने एक गरीब को ठण्ड में अपना गद्दा दे दिया था, तब से गद्दा छोड़ दिया था, बरुआ सागर से आ रहे थे, रास्ते में एक गरीब को चादर दे दिया था, एक बार गरीब को पानी पिलाया, लोगों ने कहा, तुमने लोटा खराब कर दिया, तो लोटा भी उसी गरीब को दे दिया था।
दान
कृष्णजी ने मुनिराज के रोग को दूर करने का निश्चय किया, वैद्य की सलाह से औषधि के लड्डू पूरे नगर के चौकों में भेजे, साधु स्वस्थ हो गये इसके फल स्वरूप कृष्ण जी ने तीर्थंङ्कर प्रकृति का बन्ध किया था।
दान
अनङ्गसरा से विशल्या- वज्रनाभि चक्रवर्ती की बेटी अनङ्गसरा को एक विद्याधर हरण करके ले गया, पत्नि के भय से जङ्गल में छोड़ गया, अनङ्गसरा तीन हजार वर्ष तक जङ्गल में रही, स्थान का परिमाण कर सल्लेखना ले ली थी, एक अजगर ने उसको निगल लिया, तभी पिता को मालूम हुआ, तब वे जङ्गल में लेने गये, सर्प को मारने की सोची, बेटी ने रोका और अभय दान दिलाया, जिसके फल से विशल्या हुयी, उसके स्नान का पानी औषधि के समान था, जब लक्ष्मण जी को शक्ति लगी थी तो विशल्या के आते ही वह निकल कर भाग गयी थी।
अहिंसा
धोबी और नाई दोनों मित्र थे, दोनों ने मिलकर धर्मशाला बनवाई धोबी ने लाकर मुनि महाराज को ठहरा दिया, नाई उन्हें भगाने लगा, दोनों आपस में लड़कर मरे धोबी सूकर एवं नाई शेर बना, मुनि महाराज गुफा में ध्यान कर रहे थे, शेर मुनि महाराज को खाना चाहता था एवं सूकर बचाना चाहता था, दोनों आपस में लड़कर के मरे सूकर अभय दान के प्रभाव से स्वर्ग गया, और शेर मारने के भाव से नरक गया।
अहिंसा