Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 33 / 41

अकलङ्क और निकलङ्क-मान्यखेट के राजा शुभतुङ्ग के मन्त्री का नाम पुरुषोत्तम पत्नी का नाम पद्मावती इनके दो पुत्र थे अकलङ्क और निकलङ्क। एक वार अष्टान्हिक पर्व में मन्त्री और उनकी पत्नी ने आठ दिन का ब्रह्मचर्य व्रत लिया, साथ ही दोनों पुत्रों को भी व्रत दिला दिया। युवावस्था में जब पिताजी ने दोनों से विवाह करने को कहा, तो दोनों ने मना कर दिया। पिताजी ने उनको खूब समझाया कि व्रत की अवधि तो केवल आठ दिन की थी, अब विवाह करने में कोई परेशानी नहीं है। परन्तु दोनों ने कहा व्रत की अवधि आठ दिन थी, पर हमारे लिए आठ दिन की अवधि नहीं थी। यह बोलकर दोनों ने आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया और धार्मिक अध्ययन में तत्पर हो गये। दोनों बौद्ध धर्माचार्य के पास पढ़ने लगे, एक दिन बौद्धगुरु पढ़ाते-पढ़ाते किसी विषय को समझा नहीं सके और वे चिन्तित होकर बाहर चले गये। प्रकरण सप्तभङ्गी का था, अकलङ्क ने समय पाकर उसे हल कर दिया। बौद्ध गुरु ने उसे देखा, तो सोचने लगे की यहाँ कोई जैन विद्यार्थी है, जो भेष बदलकर पढ़ रहा है। उसकी खोज करने के लिए रात को सिपाहियों को भेजा और दोनों को पहचानकर जेल में बन्द करा दिया। समय पाकर दोनों जेल से भाग निकले तो किसी ने देख लिया और सैनिकों को उनके पीछे भेज दिया। दोनों भागते-भागते एक तालाब के पास पहुँचे वहाँ निकलङ्क ने भाई अकलङ्क से कहा कि आप यहाँ छिप जाइये आप एक पाठी हैं, आप सुरक्षित रहोगे तो जैन धर्म आगे चलता रहेगा। बहुत मनाने के बाद अकलङ्क वहाँ छिप गये, निकलङ्क आगे भाग गये। एक स्थान पर एक धोबी ने पूँछा की आप क्यों भाग रहे हो? तो उन्होंने बताया की मेरे पीछे सैनिक पकड़ने के लिए आ रहे हैं, तो डर कर वह धोबी भी साथ में भागने लगा। जब वे थक गये तो सैनिकों ने दोनों को अकलङ्क-निकलङ्क समझ कर मार डाला। जब अकलङ्क को यह पता चला तो बहुत दुखी हुए। उन्होंने बाद में मुनि दीक्षा लेली और तत्त्वार्थ राजवार्तिक सभाष्य, अष्टशती लघीयस्त्रय सविवृत्ति, न्याय विनिश्चय सविवृत्ति, सिद्धि विनिश्चय, प्रमाण सङ्ग्रह, स्वरूप सम्बोधन बृहत्त्रयम्, न्याय चूलिका, अकलङ्क स्तोत्र इत्यादि ग्रन्थों की रचना की। जिनशासन की प्रभावना के लिए आचार्य अकलङ्क देव ने अपने भाई निकलङ्क का महान त्याग किया था।
धर्म
भीम ने नगाड़ा पीटा- एक याचक ने धर्मराज से कुछ याचना की, धर्मराज ने कल के लिये कहा भीम ने सुना भैया ने काल को जीत लिया,तो नगाड़ा पीट दिया, इसलिये अच्छे कार्य आज ही करना चाहिये।
समय
पण्डित दौलतराम जी गरीब थे, छहढाला की रचना कर रहे थे, तभी बेटी ने आकर भोजन मांगा, तब उनके मुख से निकलता है, 'आतम को हित है सुख सो सुख आकुलता बिन कहिये, आकुलता शिव माहीं न तातें शिव मग लाग्यो चहिये' आत्मार्थी को हर परिस्थिति में मोक्ष मार्ग ही दिखाई देता है।
धर्म
वर्णी जी का श्रोता- गणेशप्रसाद वर्णी जी के प्रवचन सुनने एक साहुजी आते थे, एक दिन वह देर से आये, लोगों ने बहुत कहा महाराज प्रवचन करो, वर्णी जी ने कहा श्रोता आ जाय, जब साहुजी आये तब वर्णीजी ने प्रवचन शुरू किया, वर्णीजी ने पूँछा 'भैया आज लेट काय हो गये' उनने कहा आज पत्नि से झगड़ा हो गया, कारण? कि आज रात में चोर आये थे, उन्होंने चारों कोने छाने पर कुछ नहीं मिला, हम करवट से लेटे थे, उन्होंने हमारी घड़ी, अङ्गूठी उतार ली, करवट बदला कि ये सोने का कड़ा भी उतार ले लेकिन वे विना कड़ा उतारे भाग गये, पत्नि ने कहा तुमने करवट काय बदली बेचारे विना कड़ा लिये भाग गये,ये है निरीह वृति।
अनासक्ति
वृक्ष की उदारता- धरती ने वृक्ष से कहा मैं तुम्हें रस प्रदान करती हूँ, तुम यूँ ही बर्बाद कर देते हो, किसी को दिया मत करो, अपने पास रखो, वृक्ष बोला नहीं माँ मैं देता हूँ तभी फलता हूँ, देने...
दान
सेठ की सम्पत्ति बीस हजार- धनी सेठ से साधु ने पूँछा तुम्हारी कितनी सम्पति है सेठ ने कहा बीस हजार क्योंकि हमने इतना ही दान दिया है, बाकी की सम्पत्ति परिवार की है, अर्थात् जितना दान देते हैं उतना ही अपना मानना चाहिए।
दान
आहार का दाता- इस अवसर्पिणी में दान तीर्थ के कर्ता राजा श्रेयाँस हुये, जिनकी यश चन्द्रिका लोक में फैली है, तीर्थंङ्कर या ऋद्धिधारी मुनि को आहार देने से पञ्चाश्चर्य होते हैं, तीर्थंङ्कर का प्रथम आहारदाता तद्भव मोक्षगामी होता है, राजा श्रेयाँस का दस भव पूर्व का संस्कार था, भरत चक्रवर्ती राजा श्रेयाँस के दर्शनार्थ आये, छेवले के वृक्ष के नीचे राजा श्रेयाँस का सम्मान किया था, उसी दिन से अक्षय तृतीया पर्व प्रारम्भ हुआ था।
दान
त्याग से नदी पार- एक साधु को नदी पार करना थी, नाविक ने पाँच रुपये माँगे, साधु ने कहा नहीं हैं, तभी एक व्यक्ति आया, उसने सोचा इनको भी पार करा देते हैं, नदी के बीच में साधु से व्यक्ति ने कहा, आप त्याग का बहुत उपदेश देते हो, अब मत देना, साधु ने कहा भैया जब पाँच रुपये का त्याग किया तभी तो नदी पार हुये, उसी प्रकार जब तक सम्पूर्ण त्याग नहीं करेंगे, तब तक संसार सागर से पार नहीं हो सकते हैं।
अनासक्ति
मन में नवधा भक्ति लेकर, तू जो दान करेगा। ऊपर वाला तेरा खजाना, रातों रात भरेगा।। जञ्जीरों में बँधी चन्दना, दान नहीं बँध पाये, इक्षु रस देकर श्रेयाँस भी दान तीर्थ कहलाये, अञ्जुलि भर देने वाले, दरिया (समुद्र) भरके मिलेगा।। ऊपरवाला।। पुण्य कोश तेरा रिक्त हो रहा, कुछ तो सञ्चय कर ले, नादानी को छोड़ रे मानी, दान को अक्षय करले। पद रज श्री चरणों की ले ले, शिवपद तुझको मिलेगा।। ऊपरवाला।। जिसने दिया उसी ने पाया, जो जोड़े सो छोड़े, खाता-वही सही रख पगले, कलम काहे को तोड़े, कैसे मिलेगा वक्त पड़े जब, जमा ही कुछ न करेगा।। ऊपरवाला।।
दान
गरीब का बेटा बीमार हो गया, पैसा पास में नहीं था, कर्जा करके पैसा लगाया, पच्चीस रुपये शुल्क थी, डॉ. को लाया तब तक बेटा मर गया, डॉ. को पच्चीस रुपये दिये उसने लेने से मना कर दिया, डॉ. ने तीन रुपये रिक्शे वाले को दिये उसने भी मना कर दिया यह भी त्याग है।
अनासक्ति
राजा भोज बहुत दानी थे, मन्त्रियों को चिन्ता हुई कि राज्य का सञ्चालन कैसे होगा, अतः उन्होंने राजा से कहा, 'आपदार्थे धनं रक्षेत्' आपत्ति काल के लिए धन की रक्षा करना चाहिए, राजा भोज ने कहा, 'श्रीमतां कुत आपदा' भाग्यवानों को विपत्ति कहाँ से आ सकती है, मन्त्रियों ने कहा, 'दैवात् क्व चित् समायाति' दुर्भाग्य से कहीं से आ गयी तो, राजा ने कहा, 'सञ्चितोऽपि विनश्यति' पाप के उदय से सञ्चित धन भी नष्ट हो जाता है।
दान
रामचन्द्रजी सीता और लक्ष्मण के साथ वन-वन भटकते हुए एक ऐसे महा एकान्त वन में आये, जहाँ राम-लक्ष्मण और सीता ने स्नान पूर्वक शुद्धि से भोजन तैयार किया और पड़गाहन के लिए बाहर खड़े हुए, तो सीता ने आकाश मार्ग से चारण ऋद्धिधारी दो मुनि आते हुए देखे, राम-सीता ने उनका पड़गाहन कर नवधाभक्ति पूर्वक निरन्तराय आहारदान दिया, वहाँ एक वृक्ष पर गिद्ध पक्षी (जटायु) बैठा था, आहार चर्या देख उसको जातिस्मरण हो गया, महामुनि के दर्शनार्थ वृक्ष से नीचे आया, मुनियों के गन्धोदक के प्रभाव से उसका शरीर महाकान्ति से युक्त हो गया और भक्ति करता हुआ मुनि के आगे नाचने लगा तथा पाप से डरकर श्रावक के व्रत ग्रहण किये और व्रती बना।
दान
सेठ ने धीवर को एक रुपये का दान दिया, उसने जाल खरीद कर मछली मारना शुरू कर दिया, सेठ कङ्गाल हो गया, मुनि से पूँछा तो उन्होंने कहा, तुमने धीवर को दान दिया है, जिससे ऐसा हुआ।
दान
दान से अच्छा कोई धर्म नहीं- कञ्जूस सेठ धर्म कर्म से दूर रहता था, पत्नि धार्मिक थी, एक बार नगर में सन्त आये, दान पर प्रभावी प्रवचन हुआ, सेठजी भी प्रवचन सुनने गये थे, पत्नि ने पूँछा प्रवचन अच्छा लगा? सेठ ने कहा आज के प्रवचन का सार यह है कि दान से अच्छा कोई धर्म नहीं, इसलिये कल से दान माँगने का कार्य प्रारम्भ करूँगा।
दान
राजकुमार के खजाने में साँप रहता था, कोषाध्यक्ष और मन्त्री को देखकर फुङ्कार मारता था, लेकिन राजकुमार को देखकर हट जाता था, वह राजकुमार के पिता का जीव था, राजा परिग्रह आसक्ति के कारण अपने ही भण्डार में मरकर सर्प बना था, मुनिराज के मुख से पिता के पूर्व भव सुनकर राजकुमार को वैराग्य हो गया।
अनासक्ति
लोग माल उड़ाकर भी बुरा कहते हैं- एक सेठ के चार बेटे थे, उसने पाँच-पाँच लाख रुपए सबको बराबर बाँट दिये, बेटों ने सोचा समाज का मुख मीठा कर दो, छोटे बेटे ने अच्छी नमकीन-मिठाईयाँ खिलाई, खा-पीकर लोग चर्चा करने लगे, बाप का धन तो इसी ने उड़ाया है, तभी तो इतना खर्च कर रहा है, लोग माल भी उड़ा रहे थे और बुराई भी कर रहे थे, दूसरे बेटे ने केवल मिठाई बनायी, खा-पीकर लोग बोले ये तो बदमाश है, तीसरे ने पूड़ी-साग खिलाई तो लोगों ने कहा कञ्जूस है, चौथे ने दाल-रोटी खिलाई तो लोग बोले कि मक्खीचूस है, इसलिए इस जगत में प्रशंसा की दृष्टि से खर्च करना व्यर्थ है क्योंकि महावीर भगवान् की भी सब प्रशंसा नहीं करते हैं।
संगति
प्रशंसा के लोभी इस तरह लुट जाते हैं- चार धूर्तों ने प्रशंसा के लोभी कञ्जूस राजा को लूटने का उपाय सोचा और स्यारों के बोलने के समय राजा के पास आये, राजा ने पूँछा स्यार क्यों रो रहे हैं? धूर्तों ने कहा हुजूर! आपके राज्य में सभी प्रजा सुखी है केवल इन बेचारों के आवास की व्यवस्था नहीं है राजा ने प्रशंसा सुन कर बीस लाख रुपये दे दिये। बार-बार यही कहकर धूर्तों ने राजा से साठ लाख रुपये ऐंठ लिये, चौथी वार राजा ने पूछा अब क्यों रो रहे हैं? धूर्तों ने कहा हुजूर! इनके रोने और गाने की आवाज एक जैसी ही है अतः अब ये रो नहीं रहे आपका गुणगान कर रहे हैं, राजा लुट कर के भी खुश हो गया।
संगति
दानवीर की चेरी- दानवीर सेठ की लक्ष्मी रोज सेवा करती थी, किसी ने इसका रहस्य समझना चाहा, लक्ष्मी ने कहा मेरा पति वह है जो मेरा सदुपयोग करता है मैं उसकी चरण चेरी बन जाती हूँ, जो सञ्चित करता है उसके लिये खञ्जर बन जाती हूँ।
दान
धन्यकुमार चरित्र- अकृतपुण्य नामक दरिद्र जीव ने पूर्व भव में बलभद्र माँ के घर रहते हुए मासोपवासी सुव्रत मुनि को दान की भावना व नवधाभक्ति सहित खीर का आहार दिया, उसी पुण्य से वह अगले भव में धनपाल वैश्य का पुण्यशाली पुत्र धन्यकुमार हुआ, जिसके पुण्य से निधियाँ प्रकट हुईं; ईर्ष्यालु भाइयों के अनेक उपद्रव णमोकार मन्त्र व पुण्य के प्रभाव से टलते रहे, अन्त में वर्धमान भगवान् के समवसरण में दीक्षा लेकर, बाईस परीषह सहते हुए महामुनि बनकर सल्लेखना पूर्वक मरण कर सर्वार्थसिद्धि में अहमिन्द्र हुआ और मोक्षगामी है — यह कथा दान के श्रेष्ठतम फल को दर्शाती है।
दान
अकिञ्चन जगत का स्वामी कैसे हो सकता है? अतः कहते हैं कि सन्त पुरुषों का चरित्र अलौकिक होता है, हे भव्य! आकिञ्चन्य रूप सुसिद्ध मन्त्र का निरन्तर अभ्यास कर, जो मन्त्र गुरु के उपदेश के अनन्तर तत्काल अपना काम करता है उस मन्त्र को सुसिद्ध मन्त्र कहते हैं, जो काल पाकर सिद्ध होता है वह सिद्धमन्त्र है, जो जप-होम आदि से साधा जाता है वह साध्यमन्त्र है और जो तत्क्षण ही शत्रु को मूल से नष्ट कर देता है वह सुसिद्ध मन्त्र है, ऐसा ही आकिञ्चन्य रूपी सुसिद्ध मन्त्र मोह को तत्काल नष्ट करने वाला है, चारित्र की रक्षा और मोक्ष की प्राप्ति के लिए अन्तरङ्ग चौदह प्रकार के और बाह्य दस प्रकार के परिग्रहों को छोड़ना चाहिए।
अनासक्ति
ज्ञानी और अज्ञानी का लक्षण- जो पुरुष अपने से अन्य पर द्रव्य, सचित्त स्त्री पुत्रादिक, अचित्त धन धान्यादिक अथवा मिश्र ग्राम नगरादिक हैं उन्हें यह समझता है कि मैं यह हूँ, यह द्रव्य मुझ स्वरुप है, मैं इसका हूँ, यह मेरा है, यह मेरा पहले था, इसका मैं भी पहले था, यह मेरा भविष्य में होगा, मैं भी इसका भविष्य में होऊँगा, ऐसा झूठा आत्म विकल्प करता है वह मूढ़ है, मोही है, अज्ञानी है, और जो पुरुष परमार्थ वस्तुस्वरुप को जानता हुआ वैसा झूठा विकल्प नहीं करता वह मूढ़ नहीं ज्ञानी है।
ज्ञान
अनाथपने का बोध- वन में घूमते हुये श्रेणिक ने मुनिराज को शिलातल पर विराजे हुये देखकर कहा, आपका कोई संरक्षक नहीं है, अनाथ हो तो मेरे राज में चलो? मुनिराज ने कहा राजन्! एक बार मैं बीमार पड़गया था, मेरा दुःख कोई बटा नहीं सका, अतः स्वयं का नाथ बनने आया हूँ, तब राजा को अपने अनाथपने का बोध हुआ था और अहङ्कार चूर हो गया था।
विनम्रता
निज की ओर वापसी- एक नगर का राजा मर गया, राजा किसको बनाया जाए? मन्त्रियों ने विचार किया कि प्रातः काल गेट खोलने पर जिसका प्रथम दर्शन होगा उसे राजा बनायेंगे, प्रातः काल गेट खोला तो एक लंगोटी वाले संयासी दिखे, उनसे कहा तुम्हे राजा बनना है, उसने मना कर दिया, लोग नहीं माने, उन्हें लाकर राजसी वेश पहना कर राजा बना दिया, पर उन्होंने अपनी लंगोटी सुरक्षित रखी, दो वर्ष बाद एक राजा ने चढ़ाई कर दी, राजा के पास बैठकर मन्त्रियों ने सलाह की, क्या करना चाहिए? संयासी ने अपना सन्दूक बुलवाया लंगोटी पहनी, जङ्गल की ओर चले गये, 'तेरा तुझको सौंपते क्या लागे है मोर' इसी तरह गृहस्थी में जीवन व्यतीत करना चाहिए, जिसने जो माँगा दे दिया।
अनासक्ति
साधु ने सेठ से कहा! ये कोठी नही धर्मशाला है, सेठ कहता है महाराज ये तो कोठी है धर्मशाला आपको छुड़वा देते हैं, साधु ने कहा इसको किसने बनवाया? पिताजी ने, कितने दिन रहे? पाँच वर्ष, वो छोड़कर चले गये तुम भी छोड़कर जाओगे तब धर्मषाला नहीं तो क्या है।
अनासक्ति
रत्न आते ही भाव बिगड़े- अहिदेव और महिदेव दोनों भाइयों ने विदेश में बहुत धन सञ्चित किया, जब घर आने लगे तो एक रत्न खरीद लिया, वह जिस भाई के पास रहता था, उसके भाव खराब हो जाते थे, घर आकर माता को दिया, उसके भाव भी बेटों को मारने के हो गये, सुबह मुनिराज के दर्शन प्रवचन को गयी, वहाँ भाव परिवर्तन हो गये, घर आकर माँ ने वह रत्न बेटों को देकर कहा यह रत्न समुद्र में फेक आओं, उसके बाद शान्ति से रहने लगे, यदि शान्ति चाहिए तो आकिञ्चन्य धर्म को अपनाना पड़ेगा।
अनासक्ति
चाणक्य के पैर में काँटा लगा, चाणक्य ने काँटे को जड़ से उखाड़कर उसकी जड़ में मट्ठा डाल दिया, जिससे दोबारा न उगे, इसी तरह काम-क्रोध आदि अन्तरङ्ग शत्रुओं को जड़ से उखाड़ देना चाहिए।
संयम
पण्डित पन्नालालजी साहित्याचार्य सागर वालों का बेटा इन्दौर अस्पताल में भर्ती था, पण्डित जी बहुत दुःखी थे, एक सज्जन उन्हें देखने आये, उन्होंने कहा चलो अस्पताल घूम कर आते हैं, अस्पताल में किसी का हाँथ टूटा है, किसी का पैर टूटा है, किसी का आग से पूरा शरीर जल गया है, सज्जन ने पण्डितजी से कहा, इन्हें देखकर अपन को दुःख नहीं हो रहा है, इसी तरह दुनिया में रोज हजारों लोग मरते हैं, जेलों में हजारों बन्द होते है, हजारों पेट भरने के लिये रोते हैं, लाखों एक-एक रुपये को मुहताज हैं, उनको देखकर हमें कुछ नहीं होता, तथा हमारा बेटा बीमार हो जाये तो हमें कष्ट होता है, यह राग या ममत्व भाव का परिणाम है।
अनासक्ति
सेठ का चार साल का बच्चा गुम गया, सेठ ने बहुत ढूँढा पर कही नहीं मिला, तब एक नौकर को रख लिया, उससे रात दिन काम लेते थे, एक दिन नौकर बीमार हो गया सेठानी ने आवाज दी, उसने नहीं सुना, गुस्से में जाकर सेठानी ने उसका चादर खींचा और कहा चल काम कर, तभी उसके हाँथ में गुदा हुआ नाम देखा, पढ़ा तो सोचा यही नाम तो हमारे बेटे का था, पन्द्रह वर्ष हो गये अभी तक वापस नहीं आया, बच्चे से पूँछा, तो उसने कहा! मैं अपने माँ बाप को नहीं जानता, मैं पन्द्रह साल पहले खो गया था, बाद में माता-पिता नहीं मिले, यही मेरा पुत्र है ऐसा समझ कर सेठ-सेठानी खुशी से उछल पड़े, अब मेरा बेटा मिल गया और उसे छाती से लगा लिया, पहले उससे शक्ति से ज्यादा काम लेते थे पर अब उसे जरा भी कष्ट नहीं देना चाहते थे, मोही जीव अपने और पराये से ऐसा व्यवहार करते हैं।
अनासक्ति
स्नेह रहित मनुष्य निर्वाण को प्राप्त होता है तथा स्नेह अनर्थ का कारण है, यह रहस्य स्नेह (तैल) रहित दीपक ने प्रकट किया है, भावार्थ- जब तक दीपक में तैल रुपी स्नेह रहता है तब तक उसे जलना पड़ता है और जब तैल रुपी स्नेह समाप्त हो जाता है तब वह निर्वाण को प्राप्त हो जाता है (बुझ जाता है), इसी प्रकार संसारी प्राणी स्नेह-प्रीति के कारण निरन्तर आकुलता में पड़कर दुःखी रहते हैं और प्रीति का त्याग करने वाले मुनिराज निर्वाण को प्राप्त होते हैं।
अनासक्ति
पण्डित जगन्मोहनलाल जी मूर्ति खरीदने जयपुर गये, कृष्ण, राम, हनुमान आदि की मूर्ति चार हजार रुपये की थी, एवं महावीर भगवान् की चालीस हजार रुपये की थी, पण्डितजी ने कहा कि जैनियों को लूटते हो, शिल्पी ने कहा अन्य मूर्तियों के दोष को हम रङ्ग में ढँक देते हैं, पर वीतराग मूर्ति के दोष को कहाँ ढँके, जैनियों की मूर्ति दस-बीस पत्थरों में एक बनती है उसकी प्रकार आकिञ्चन्य धर्म में दोषों को स्थान नहीं होता है।
धर्म