Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Non-violence

अहिंसा

187 सूत्र · पृष्ठ 1 / 3

दया से परिपूर्ण हृदय वाला जो गृहस्थ छने हुए जल से सब कार्य करता है वह मोक्ष को प्राप्त होता है।
अहिंसा
सत्पुरुषों ने जैनधर्म के नीति मार्ग में ऐसा ही कहा है कि पानी का छानना धर्म है, जैनियों का यह धर्म तीनों लोकों में प्रसिद्ध है।
अहिंसा
जिनेन्द्र भगवान् ने पृथ्वी पर जीव दया की सिद्धि के लिए मोटे सूत के दुहरे वस्त्र से पानी छानने को पुण्य कहा है।
अहिंसा
श्रीमज्जैनधर्म में निपुण तथा जीवदया में सदा तत्पर रहने वाले मनुष्यों को पानी छानने की शुभ क्रिया में प्रमाद नहीं करना चाहिए।
अहिंसा
जो छना जल पीते हैं वे इस जगत् में भव्य एवं बुद्धिमान् हैं, अन्यथा पाप से विकल हृदय वाले पुरुष पशु तुल्य हैं।
अहिंसा
नदियों और तालाबों का जो गहरा पानी, वायु तथा घाम से अच्छी तरह स्पृष्ट है, उस जल में प्रवेश कर स्नान के योग्य नहीं माना गया है बर्तन में लेकर प्रयोग कर सकते हैं।
अहिंसा
वायु से ताड़ित, पत्थर तथा घटीयन्त्र से ताड़ित एवं सूर्य की किरणों से संतप्त वापिका के जल को मुनि प्रासुक मानते हैं, यद्यपि उपर्युक्त लक्षण वाला जल आगम में प्रासुक कहा गया है तथापि अत्यावश्यकता वश उससे स्नान ही करना चाहिए, उसे बिना छने पीना नहीं चाहिए। वस्त्र धोने तथा नहाने का पानी जलाशय में नहीं जाना चाहिए।
अहिंसा
जो वस्त्र छत्तीस अँगुल लम्बा और चौबीस अँगुल चौड़ा है, उसे दुहरा कर पानी छानना चाहिए। वस्त्र के मध्य आये हुए जीवों को जल के मध्य में स्थापित करना चाहिए, ऐसा कर जो पानी पीता है वह उत्कृष्ट गति को प्राप्त होता है।
अहिंसा
छना हुआ पानी १ मुहूर्त (४८ मिनट) तक, प्रासुक २ पहर (६ घंटे) तक और अत्यधिक गर्म किया हुआ पानी दिन रात अर्थात् २४ घंटे तक चलता है, पश्चात् उसमें सम्मूर्छन जीव उत्पन्न हो जाते हैं।
अहिंसा
एक मुहूर्त के बाद पानी को फिर से नहीं छानना अथवा सछिद्र या मलिन वस्त्र से छानना और जीवानी को अन्य जलाशय में डालना, जलगालन व्रत में योग्य नहीं माना गया है।
अहिंसा
इस प्रकार जो सदा पानी छानने में यत्न करते हैं, वे धर्मस्नेही भव्य जीव निरन्तर सुखी रहते हैं। जिस जलाशय से यत्नपूर्वक छानकर जल लाया गया है, ज्ञानी पुरुष जीवसहित जल को उसी जलाशय में स्थापित करें अर्थात् जिवानी उसी जलाशय में डाले।
अहिंसा
बिना छने जल में असंख्यात जीव होते हैं, अतः बिना छना पानी पीने वाला पुरुष पाप का अर्जन करता है।
अहिंसा
एक व्यक्ति को मग से बिना देखे, बिना छना पानी पीने से, कुछ दिनों में पेट में तकलीफ होने लगी, तो एक्सरे करवाया डॉक्टर ने उपवास करने के लिए कहा–उसने कहा हम तो एक घंटे भी भूखे नहीं रह सकते, डॉक्टर ने कहा स्वस्थ होना है, तो उपवास करना ही होगा उसने जिस किसी तरह उपवास किया दूसरे दिन दस–पाँच चने के दाने खाने को दिए, जब चने की धंध पेट में पहुँची तो उल्टी की इच्छा हुई, डॉक्टर ने कहा उल्टी कर दो, उल्टी की तो साँप का बच्चा निकला यह अनछना पानी पीने का परिणाम था।
अहिंसा
वाणी में स्याद्वाद, विचारों में अनेकान्त, आचरण में अहिंसा ही मुक्ति का द्वार है।
अहिंसा
व्यवहार सर्वथा अभूतार्थ नहीं है क्योंकि अहिंसादि में धर्म का व्यवहार किया जाता है हिंसादि में नहीं? एवं अहिंसादि से निश्चय की प्राप्ति होती है।
अहिंसा
यदि आपके निमित्त से हिंसा हो रही है तो आप भी हिंसक हैं।
अहिंसा
जीना हमारा अधिकार है और दूसरों को जीने देना हमारा कर्त्तव्य है।
अहिंसा
अपने हृदय में दया का अभाव हो तो अपने पूर्व कृत पुण्यों का फल भी प्राप्त नहीं होता है। तीर्थों में श्रेष्ठ तीर्थ, पवित्र वस्तुओं में अति पवित्र वस्तु 'विशुद्ध हृदय' ही है।
अहिंसा
करुणा से आर्द्र हृदय वाले व्यक्ति सभी के निःस्वार्थ बंधु होते हैं।
अहिंसा
जो पर की करुणामयी आवाज नहीं सुन सकता, प्रभु भी उसकी भक्ति की आवाज कैसे सुन सकते हैं?
अहिंसा
दुःख भोगने वाला तो आगे सुखी हो सकता है, पर दुःख देने वाला कभी सुखी नहीं हो सकता है।
अहिंसा
एक आह सारे संसार में खलबली मचा सकती है, अतः किसी के भी दिल को मत दुःखाओ।
अहिंसा
अहिंसा की साधना से बढ़कर श्रेष्ठ दूसरी कोई साधना नहीं है।
अहिंसा
जैन दर्शन के सम्पूर्ण सिद्धान्त अहिंसा की नींव पर खड़े हैं।
अहिंसा
अहिंसा और कायरता पूर्ण रूप से परस्पर विरोधी है।
अहिंसा
अदालत द्रव्य हिंसा पकड़ती है तथा अध्यात्म द्रव्य व भाव दोनों प्रकार की हिंसा को पकड़ता है। हम दूसरों को बचायेंगे तो दूसरा हमें बचायेगा।
अहिंसा
अहिंसा परम धर्म है। अहिंसा परम तप है। अहिंसा परम ज्ञान है। अहिंसा परम पद है।
अहिंसा
अहिंसा सब धर्मों में श्रेष्ठ है, हिंसा के पीछे हर तरह का पाप लगा रहता है।
अहिंसा
सत्य और अहिंसा से तुम संसार को अपने सम्मुख झुका सकते हो।
अहिंसा
किसी को इतना मत सताओ कि वह आँसुओं का बदला खून से ले।
अहिंसा
जिनके करुणा के द्वार बंद हैं उनके लिए परमात्मा का द्वार भी बन्द है।
अहिंसा
भिखारी बनकर जीवन व्यतीत करना श्रेष्ठ है लेकिन शिकारी बनकर जीवन व्यतीत करना निकृष्ट है।
अहिंसा
जिसके जीने से लोग जीवित रहें इस संसार में वास्तव में वही जीता हैं।
अहिंसा
जिसका मन दया से द्रवीभूत रहता है उसी को ज्ञान और मोक्ष प्राप्त होता है।
अहिंसा
दया से लबालब भरा हुआ दिल ही सबसे बड़ी दौलत है क्योंकि दौलत तो हर किसी के पास देखी जाती है।
अहिंसा
दया से हीन धर्म पाखंड है।
अहिंसा
दूसरों को दुःख देकर कोई हमेशा सुख प्राप्त नहीं कर सकता।
अहिंसा
उठते-बैठते, सोते-जागते हर क्षण प्रभु से एक प्रार्थना अवश्य करना कि–हे भगवन्! मुझे हजारों कष्ट भले ही सहन करने पड़ें पर मेरे द्वारा किसी को एक भी कष्ट न मिलें।
अहिंसा
दुष्ट को मारने से दुष्टता नहीं मरती।
अहिंसा
जो धर्म अहिंसा की कसौटी पर खरा उतरे वही सच्चा धर्म है।
अहिंसा
नौकर के साथ घर के सदस्यों जैसा व्यवहार होना चाहिए।
अहिंसा
पानी छानकर पीने वाले दहेज के लिए जीवित बहु-बेटियों का खून पी रहे हैं। धूप जलाने में हिंसा देखने वाले अब दहेज के लिए बहु-बेटियों को जला रहे हैं, प्याज से पेट न भरने वाले गरीबों का पेट काटकर ब्याज से पेटी भर रहे हैं।
अहिंसा
मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है।
अहिंसा
निरपराधी मनुष्य पर अपराध का आरोप लगाना महापाप है।
अहिंसा
भूखा मनुष्य क्या पाप नहीं करता? दुर्बल (भूख से व्याकुल) मनुष्य निर्दयी हो जाते हैं।
अहिंसा
यदि मनुष्य शरीर में जो भी क्रूरता और कठोरता का भाव धारण करता है तो वह मनुष्य रूप में नारकीय जीव या यमदूत माना जायेगा।
अहिंसा
संस्कृति की रक्षा से ही प्राणियों की रक्षा सम्भव है।
अहिंसा
सत्य और दया को नहीं त्यागें उन्हें अपनी ग्रीवा पर माला की तरह पिरो लें, अपने हृदय पटल पर अंकित कर लें।
अहिंसा
जो दूसरे को दुःख देता है, उसका पूजन-भजन में मन नहीं लगता है।
अहिंसा
जो दूसरों का बुरा करता है, वह वास्तव में अपना ही महान् बुरा करता है और जो दूसरों को सुख पहुँचाता है, वह वास्तव में अपने को ही सुखी बनाता है।
अहिंसा
जितनी छूट या स्वतंत्रता आप अपने लिए चाहते हैं उतनी दूसरे को क्यों नहीं देना चाहते हैं? सिर्फ स्वाद, सौन्दर्य और सम्पदा (सम्पत्ति) के लिए हिंसा होती है।
अहिंसा
अपनी मान्यताओं को दूसरों पर थोपना हिंसा है।
अहिंसा
जीने के लिए साधु नहीं बना जाता, समाधि के लिए बना जाता है। अतः कितनी बड़ी बीमारी आ जाये परन्तु हिंसा की औषधि मत लेना।
अहिंसा
क्रांतिकारी की प्रशंसा मैं तब करूँगा, जब वह अहिंसक हो।
अहिंसा
जब तुम किसी दुर्बल को सताने के लिए उद्यत हो तो सोचो कि आपसे बलवान मनुष्य के आगे भय से जब तुम काँपोगे तब तुम्हें कैसा लगेगा?
अहिंसा
भगवान् महावीर का सूत्र है—जो तुम अपने लिए चाहते हो वही दूसरों के लिए चाहो और जो आप अपने लिए नहीं चाहते वह दूसरों के लिए भी मत चाहो।
अहिंसा
इन्द्रियों के निग्रह, राग-द्वेष पर विजय प्राप्त करने और प्राणीमात्र के प्रति अहिंसक रहने से साधक अमरत्व प्राप्त करता है।
अहिंसा
हर किसी को सुखी रखना हमारे वश में नहीं, लेकिन किसी को हमारी वजह से दुःख न हो ये हमारे वश में हैं।
अहिंसा
सबसे ज्यादा हिंसा बुरा चिन्तन करने से होती है।
अहिंसा
जो मनुष्य दूसरों पर दया करता है, वह स्वयं अपना हित करता है, पर निर्दयी मनुष्य स्वयं अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारता है।
अहिंसा
प्रेम से बढ़कर दूसरा बन्धन नहीं, विषय से बढ़कर दूसरा विष नहीं, क्रोध से बढ़कर दूसरा शत्रु नहीं, विवेक से बढ़कर दूसरा मित्र नहीं, जन्म से बढ़कर दूसरा दुःख नहीं, सन्तोष से बढ़कर सुख नहीं, लोभ से बढ़कर पाप नहीं, सेवा से बढ़कर पुण्य नहीं और दया-अहिंसा से बढ़कर धर्म नहीं है।
अहिंसा
किसी के अस्तित्व को मिटाने का अधिकार किसी को नहीं है।
अहिंसा
घृणा से घृणा को नष्ट नहीं किया जा सकता। घृणा को दूर करने के लिए स्नेह की आवश्यकता है।
अहिंसा
जिस आदमी के भीतर घृणा है, उसके लिए सारा जगत् शत्रु हो जाता है और जिस आदमी के भीतर प्रेम होता है, उसके लिए सारा जगत् मित्र हो जाता है।
अहिंसा
युद्ध मानव-जाति का विनाशक है, अतः उससे बचने के सभी उपाय काम में लिए जाने चाहिए।
अहिंसा
जो दूसरों के दुःख से दुःखी होता है, उसको अपने दुःख से दुःखी नहीं होना पड़ता है।
अहिंसा
जो अपना कल्याण चाहता है, उसे किसी के भी प्रति बुरी भावना नहीं करनी चाहिए।
अहिंसा
शान्ति की विजय युद्ध की विजय से श्रेष्ठ है।
अहिंसा
वीरता मारने में नहीं, मरने में है। किसी की प्रतिष्ठा बचाने में है, प्रतिष्ठा गँवाने में नहीं।
अहिंसा
लड़ने से ज्यादा लड़ाई से बचने के लिए बहादुरी की जरूरत होती है।
अहिंसा
दूसरों को मारने गिराने के भाव नर में नहीं नारकी में होते हैं।
अहिंसा
कोई भी दुःखी आदमी घृणा के योग्य नहीं हो सकता है।
अहिंसा
आप रक्तदान भले ही न कर पायें पर आप से किसी का रक्त शोषण न हो यह जरूर सोचिए।
अहिंसा
परोपकार न कर सको तो कोई बात नहीं, पर किसी का अपकार हरगिज न सोचो, न करो।
अहिंसा
राष्ट्र को आतंकवाद की नहीं अहिंसावाद व संत आशीर्वाद की आवश्यकता है।
अहिंसा