Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 31 / 41

सेठ की सत्यता- व्यापार हेतु एक सेठ जङ्गल से गुजर रहा था। डांकुओं ने उसे पकड़ लिया सब धन छीन लेने के बाद भी पाँचसौ स्वर्ण मुद्राओं को और माँगा, सेठ ने पत्र लिखा और कहा कि आप इस पत्र को ले जाओ हमारे बेटे से पाँच सौ स्वर्ण मुद्रायें ले आओ। एक व्यक्ति पत्र लेकर गया। उसके बेटे ने पाँचसौ स्वर्ण मुद्रायें दे दी। सभी डाकू प्रसन्न थे लेकिन सेठ उदासीन था, मेरे बेटे ने नकली मुद्रायें दे दी हैं, सेठ पुनः पत्र लिख कर देता है, और डाकुओं से कहता है! असली मुद्रायें ले आओ नहीं तो हमारे ऊपर से विश्वास उठ जायेगा। सेठ की सत्य निष्ठासे डाकुओं का जीवन परिवर्तित हो गया।
सत्य
गाँधी जी के सत्य के प्रयोग- गाँधीजी अफ्रीका में चोरी की पैरवी कर रहे थे, उन्हे पता चला कि ये व्यक्ति झूठ बोल रहा है, गाँधीजी ने उस केस को कैंसल कर दिया, उसने गाँधीजी को मनाया तब गाँधीजी ने कहा तुम सत्य बोलो उसने सत्य बोला, मजिस्ट्रेट ने सत्य से प्रसन्न होकर दूना जुर्माना करके छोड़ दिया।
सत्य
जब से खड़ा हूँ तब से कोई नहीं निकला- जङ्गल में साधु ध्यान कर रहे थे, तभी एक हिरन दौड़ता हुआ निकला, साधु का ध्यान बटा, उन्होंने देखा कि यह तो सताया हुआ है, अगर शिकारी ने आकर पूँछा तो क्या होगा, ऐसा सोच ही रहे थे कि शिकारी आ गया, साधु तत्काल खड़े हो गये जैसे ही शिकारी ने पूँछा कि यहाँ से कोई हिरन निकला है? तो साधु ने कहा जब से मैं खडा हूँ, तब से कोई नहीं निकला। जब हिरण निकला था तब साधु बैठे हुये थे, अर्थात् युक्ति पूर्वक जीव की रक्षा की और अपने सत्यधर्म की रक्षा की।
अहिंसा
शिकारी ने हाथ में जिंदा चिड़िया लेकर साधु से पूछा ये मरी है या जिन्दा? साधु ने कहा मरी है, वहाँ साधु का अभिप्राय झूठ बोलने का नहीं था चिड़िया के प्राण बचाने का था इसलिए झूठ होते हुए भी सत्य है।
अहिंसा
मैं चोर हूँ- एक चोर ने झूठ बोलने का त्याग किया, राजमहल में चोरी करने गया पहरेदार ने पूँछा! कौन हो? कहा! चोर हूँ, किसी ने विश्वास नहीं किया, सोचा कोई राजपुरुष होगा, जब वह चोरी करके ले जा रहा था तब पूँछा क्या ले जा रहे हो? तो उसने कहा चोरी करके ले जा रहा हूँ, तब भी किसी ने कुछ नहीं कहा, चोर स्वयं विरक्त हो गया, कि एक पाप के त्याग से इतना लाभ हुआ, तब सारे पापों का त्याग करेंगे तो कितना लाभ होगा?
सत्य
वचन चातुर्य-चार महिलायें एक साधु से बात करने के बहाने आती हैं, और पहली ने कहा विचारणीय बाबा! पानी दे दो, दूसरी ने कहा बाबा अग्नि दे दो, तीसरी ने कहा बाबा गोद में ले लो, चौथी महिला ने कहा बाबा आपके खेत में पशु घुस गये हैं, साधु चारों का एक ही उत्तर देते हैं कि 'वारि नहीं है', पानी को भी वारि कहते हैं, अग्नि वारी नहीं, वारी मतलब छोटी सी नहीं है, खेती वारी नहीं है।
वाणी
सत्य और सुन्दर- एक काना राजा था, उसने कई बड़े–बड़े चित्रकारों को बुलावाया, और आदेश दिया कि जो भी राजा का ऐसा चित्र बनाए जो सुन्दर भी हो और सत्य भी, तो कई चित्रकारों ने अपनी कला दिखायी, राजा ने एक चित्र देखा जिसमें एक आँख नहीं थी, राजा बोला ये सत्य है पर सुन्दर नहीं, दूसरे चित्र में दोनों आँखें थी, राजा बोला ये सुन्दर है पर सत्य नहीं, तीसरा चित्र दिखाया गया, जिसमें राजा धनुष से बाण को खींचता है, और एक आँख बन्द है, जैसे निशाना साध रहा हो, राजा देखकर प्रसन्न हो गया बोला यह सुन्दर भी है और सत्य भी, अतः वाणी ऐसी बोलो जो सत्य भी हो और सुन्दर भी।
वाणी
शनि का सौदा- एक बार एक राजा ने इस शर्त पर बाजार लगवाया कि जिसका जो भी सामान नहीं बिकेगा वह मैं खरीद लूँगा, सब दुकान दारों का सामान बिक गया, पर एक मूर्ति बेचने वाले की शनि देव की मूर्ति नहीं बिकी, तब वह राजा ने खरीद ली, एक रात राजा ने देखा कि, मेरे महल से लक्ष्मी, यश, सुख आदि अच्छे–अच्छे गुण जा रहे हैं, साथ में सत्य भी जा रहा है, तो राजा ने पूँछा आप लोग कहाँ जा रहे हैं? उन सभी ने कहा आपके यहाँ शनि देव आ गये हैं इसलिए हम लोग नहीं रहेंगे, तब राजा ने सत्य से कहा कि मैंने आपकी रक्षा के लिए ही शनि देव को खरीदा है, इसलिए आप नहीं जा सकते, तो सत्य लौट आया, और सत्य को वापस आया हुआ देखकर, बाकी के गुण भी वापस आ गये, कहने का तात्पर्य यह है कि जहाँ पर सत्य होता है, वहाँ पर सभी गुण होते है।
सत्य
वचन में चतुराई- राजा ने हाथी की रक्षा महावत को सौंपी और कहा कि हाथी को कोई कष्ट नहीं होना चाहिए। जो व्यक्ति राजा को हाथी की मृत्यु का समाचार देगा, उसको मृत्यु दण्ड होगा, कुछ दिन बाद हाथी मर गया, अब कौन राजा से कहे, सब सङ्कट में थे, एक वृद्ध ने जाकर कहा राजन! आज हाथी की विलक्षण दशा है, भोजन बन्द, स्पन्दन बन्द है, स्वर्गवास हो गया, राजा ने कहा हाथी मर गया? वृद्ध ने कहा! हमने मरना कहाँ कहा।
वाणी
मैं परधन कभी नहीं लेता- रिक्शा में सेठ का पैसों का थैला छूट गया, वह सेठ को लौटाने के लिये होटल में आया, सेठ ने उसे पाँच हजार रुपये पुरस्कार में देना चाहे पर उसने नहीं लिये और कह दिया मैंने टेक्सी का किराया ले लिया है, विना मेहनत के पराई कमाई नहीं लेता हूँ, ये सत्य व्यवहार है।
सत्य
बालक वर्धमान ने स्याद्वाद सिद्ध किया- बच्चों ने माँ त्रिशला से पूँछा वर्धमान कहाँ पर हैं? माँ ने कहा ऊपर हैं, बच्चे दौड़कर तीसरी मञ्जिल में गये, वहाँ पिता सिद्धार्थ विराजमान थे, बच्चों ने पिताजी से पूँछा कि वर्धमान कहाँ पर हैं, पिताजी बोले नीचे हैं, बच्चे दूसरी मञ्जिल पर गये, वर्धमान से कहा आपके माता–पिता झूठे हैं, वर्धमान ने कहा नहीं, दोनों सही हैं, माँ की अपेक्षा ऊपर हैं, और पिता की अपेक्षा नीचे हैं, यही स्याद्वाद कहलाता है।
विवेक
कर्तृत्व बुद्धि- पड़ोसी राजा ने चढ़ाई कर दी, राजा सामना करने में असमर्थ था, अतः रानी को घोड़े पर बैठा कर भाग गया, रानी गर्भवती थी, उसने रास्ते में बच्ची को जन्म दिया, सम्भाल न सकने से बच्ची को झाड़ी में फेक दिया, झाड़ी के ऊपर मधुमक्खी का छत्ता था, जिसका शहद उसके मुँह में गिरता रहा, जिससे वह सात दिन तक जीवित रही, राजा ने लौटते समय उसे बापस उठा लिया, आगे चलकर भारत सम्राट जहाँगीर की पत्नि नूरजहाँ बनी सोचो किसने किया उसका पालन? बालिका के पुण्य ने।
कर्म
रक्षक कौन- अञ्जना को उसकी सास ने घर से निकाल दिया था, जिससे वह भटकती–भटकती एक गुफा में अपनी दासी के साथ पहुँची, उसी गुफा में हनुमान जी का जन्म हुआ था, वहाँ से आकाश में जाते हुए प्रतिसूर्य विद्याधर ने गुफा में देखा, तो वह नीचे गुफा की ओर आया, और उसे अपनी बहन बनाकर अपने साथ ले जाने लगा, अञ्जना को विमान में बैठाया, हनुमान माँ की गोद में थे, अचानक माँ की गोद से नीचे गिर गये, नीचे घना जङ्गल था, सब लोग घबराए और विमान को जङ्गल में उतारा गया, सब लोग रोते हुए हनुमान की खोज करने लगे, माँ को हनुमान की आवाज आई, सुनकर पास गयी, वहाँ हनुमान एक चट्टान पर पड़े थे, जिस चट्टान पर गिरे थे उस चट्टान के टुकड़े–टुकड़े हो गये थे, और हनुमान हँस–खेल रहे थे, इतनी ऊँचाई से गिरने पर भी उनको चोट तक नहीं लगी, किसने की हनुमान की रक्षा? हनुमान के पुण्य ने।
कर्म
अभिमानी पिता के अनेक उपाय करने पर भी मैनासुन्दरी का भाग्य, किसने बनाया- एक बार मैनासुन्दरी ने पिता से कह दिया कि मैं अपने भाग्य का खाती हूँ, पिता ने गुस्से में आकर कुष्ट रोगी राजकुमार से मैनासुन्दरी का विवाह कर दिया, उसने सिद्धचक्र महामण्डल विधान में सिद्धों की आराधना करके गन्धोदक अपने पति को लगाया जिससे पति सहित सात सौ लोगों का कुष्टरोग ठीक हो गया था।
भक्ति
स्वारथ का संसार- बड़ा लड़का जङ्गल में निकलने वालों को लूटकर धन लाता था और घर चलाता था, एक दिन किसी बाबा को लूटने लगा, बाबा ने कहा संसार स्वार्थी है, क्यों मोह के वश हो पाप कमाकर दुर्गति में जाते हो, वह बोला हमारा सारा परिवार हमसे बहुत प्यार करता है, मेरा जहाँ पसीना गिरता है वहाँ सभी लोग खून बहाने को तैयार रहते हैं, बाबा ने कहा एक बार उनके सच्चे प्यार की परीक्षा कर लो, बाबा के कहे अनुसार घर जाकर बहाना बना कर लेट गया और जोर–जोर से कराहने लगा, बाबा वैद्य का भेष धारण करके आया और बोला मेरे पास मरे को जिन्दा करने की दवा है, लेकिन जो इसे पियेगा वो मर जायेगा और यह जिन्दा हो जायेगा, अभी तक जो विना उसके जीवित रहने को तैयार नहीं थे, रो रहे थे, अब वे सभी कहने लगे, हम स्वयं कमा कर खायेंगे, यहाँ तक कि माँ ने भी कह दिया कि हम समझ लेंगे कि हमारे छह ही बेटे हैं, वैद्य ने कहा इस दवा को हम पी लें? सबने कहा बड़ी कृपा होगी, स्वार्थी संसार देखकर उसको संसार से वैराग्य हो गया, सोचने लगा स्वार्थियों के लिये पाप करके हम दुर्गति में क्यों जायें और वह आत्म कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ गया।
अनासक्ति
पिता से प्रश्न- बादशाह ने सोचा जब बीरबल इतना चतुर है तो बीरबल के पिता कितने चतुर होगें? बीरबल से कहा कि कल तुम अपने पिता को सभा में लाना। सभा में गये, बादशाह ने प्रश्न किया– दो लोगों में झगड़ा हो गया हो तो क्या करना चाहिये? वे मौन रहे, दो दिन बाद बीरबल सभा में आये, तब बादशाह ने कहा तुम्हारे पिता जी बड़े मूर्ख हैं, बीरबल ने कहा हमारे पिताजी ने भी यही कहा था, कि तुम्हारे बादशाह बड़े मूर्ख हैं, हमने उनके प्रश्न का उत्तर दिया, लेकिन वो समझे नहीं, दो लोगों में झगड़ा हो तो मौन रहना चाहिए, बादशाह बीरबल की बात को सुनकर शर्मिन्दा हो गये।
वाणी
अपनी सुरक्षा- अमेरिका का एक व्यापारी हेनरी फोर्ड हीरे–जवाहरात लेकर दूसरे देश जा रहा था। रास्ते में गाड़ी खराब हो गयी, तो ट्रेन से गया, तब टी.टी. ने टिकिट पूँछा तो मौन रहे, टी.टी. ने उनको पुलिस के हवाले कर दिया, सुबह अधिकारी को टिकिट बता दिया, अधिकारी ने पूँछा कि आपने रात को टी.टी. के लिए टिकट क्यों नहीं बताया, तब हेनरी बोले कि रात को मेरी सुरक्षा हो गयी, अन्यथा में अपना माल कहाँ सुरक्षित रखता, इसी प्रकार आत्मा की सुरक्षा मौन से होती है।
संयम
व्रत रहित दयालु पुरुष को देवगति सुलभ होती है और दया रहित व्रती पुरुष को नरकगति सुलभ होती है, निर्दय मनुष्य चिरकाल तक तपस्या करे, खूब व्रत करे, दान देवे किन्तु उस तप, व्रत और दान के फल से वह दरिद्र ही रहता है, उसे उनका किञ्चित भी फल प्राप्त नहीं होता और केवल दया को पालने वाला उसके फल से पुष्ट होता है, हे मोक्ष के इच्छुक! यदि तेरा मन दया से भरा है, तो उपवास आदि के द्वारा व्यर्थ ही कष्ट उठाता है, तुझे दयाभाव से ही सिद्धि मिल जायेगी, यदि तेरा मन दया से शून्य है, तो तु मुक्ति के लिए व्यर्थ ही क्लेश उठाता है क्योंकि कोरे कायक्लेश से मुक्ति नहीं मिलती, जैसे मठा से सींचे गये प्रदेश में घास नहीं उगती वैसे ही दयालुपुरुष पर किसी असहिष्णु व्यक्ति के द्वारा लगाया गया हिंसा–चोरी आदि का दोष न उसकी अपकीर्ति का कारण होता है न दुर्गति का, बल्कि उल्टे गुणों को ही लाने में कारण होता है।
अहिंसा
महावीर की कहानी- पुरूरवा भील ने मद्य, मांस, मधु के त्याग से प्रारम्भ की, और बढ़ते–बढ़ते तीर्थंङ्कर महावीर बन गया।
आहार
व्याघ्री ने तन खाया- व्याघ्री ने सुकौशल स्वामी को खाया और कीर्तिधर मुनि का उपदेश सुनकर प्रायश्चित्त से रो–रो कर भीग गयी और संयम धारण कर स्वर्ग गयी, मुनि भक्षी व्याघ्री भी संयम के प्रभाव से स्वर्ग चली गयी तथा असंयम से क्षायिक सम्यग्दृष्टि श्रेणिक नरक गया था।
संयम
आचार्य श्री शान्तिसागर जी से एक व्यक्ति ने कहा पञ्चम काल में मोक्ष प्राप्त नहीं होता है, तब आप कष्ट क्यों सह रहे हैं, आचार्यश्री ने कहा यह पेड़ किसका है? व्यक्ति ने कहा- आम का, आचार्यश्री ने कहा- तो फल तोड़ लाओ, व्यक्ति बोला- मौसम में मिलेगा, आचार्यश्री ने कहा- इसी तरह मोक्ष का फल भी इसी मुनि मुद्रा में लगेगा। वे व्यक्ति आगे चलकर मुनि पायसागर बने।
पुरुषार्थ
शुभचन्द्र और भर्तृहरि–राजा सिंहल के शुभचन्द्र और भर्तृहरि दो पुत्र हुए, 'राज समाज महा अघ कारण बैर बढावन हारा' अर्थात् राज और समाज को बैर एवं पाप का कारण जानकर दोनों विरक्त हो गये, एवं शुभचन्द्र जी ने वन में जाकर एक मुनिराज के निकट मुनि दीक्षा ले ली एवं घोर तप करना प्रारम्भ कर दिया, एवं भर्तृहरि पञ्चाग्नि तप करने वाले तापस का चेला बन गया, बारह वर्ष रहकर भर्तृहरि बहुत सी विद्या, तन्त्र, मन्त्र, यन्त्र, सीखकर जब जाने लगा, तब योगी ने एक सतविद्या और रसतुम्बी दी जिससे ताम्बा स्वर्ण बन जाता था, कुछ दिनों में भर्तृहरि के सैकड़ों शिष्य हो गये, और तन-मन से सेवा करने लगे, एक दिन उन्हें अपने भाई शुभचन्द्र की याद आई, वे कहाँ रहते हैं, और किस प्रकार हैं, और पता लगाने एक शिष्य को भेजा, जाकर देखा तो न कोई खाने की व्यवस्था है, न तन पर एक लङ्गोटी, सुन कर भर्तृहरि को बहुत दुःख हुआ, और शिष्य के हाँथ आधा तुम्बी रस भेजा, शुभचन्द्र जी ने कहा की पत्थर पर डाल दो, यह सुनकर भर्तृहरि को बहुत दुःख हुआ, और स्वयं आधा तुम्बी रस लेकर भाई से मिलने चले गये, प्रणाम करके रस तुम्बी भेंट की, शुभचन्द्र जी ने उसे पत्थर पर फेंक दिया, देख कर भर्तृहरि को दुःख हुआ, और कहा की आपने मेरी बारह वर्ष की कमाई नष्ट कर दी, आपने अभी तक क्या प्राप्त किया है? दिखाइये, तब शुभचन्द्र जी ने पैर के नीचे की थोड़ी सी धूल उठा कर शिला पर डाल दी, तो शिला स्वर्णमय हो गयी, भर्तृहरि अवाक् हो गए और चरणों में गिरकर दीक्षा की प्रार्थना की, तब शुभचन्द्र जी ने विस्तृत धर्मोपदेश देकर उनके हृदय के कपाट खोल दिए, भर्तृहरि को दीक्षित करके योग का अध्ययन कराने के लिए ज्ञानार्णव ग्रन्थ की रचना की।
अनासक्ति
सन्त लेटे-लेटे आतेहैं, और बैठे-बैठे जाते हैं, और श्रावक लेटे-लेटे आते हैं, और लेटे-लेटे ही जाते हैं, उनकी अर्थी कफन से इसलिए ढकी होती है, कि उन्होंने जीवन में संयम नहीं पाला इसलिए मुँह दिखाने लायक नही हैं, सन्त की अर्थी खुली होती है और वे बैठे-बैठे जाते हैं।
संयम
वज्रदन्त चक्रवर्ती–वज्रदन्त चक्रवर्ती को माली ने सहस्रदल कमल भेंट किया, उसके अन्दर भौंरा मरा पड़ा था, देखकर सोचने लगे ओ हो! घ्राण इन्द्रिय के वशीभूत होकर मर गया। इससे चक्रवर्ती को वैराग्य हो गया, बड़े बेटे से कहा कि राज सम्भालो हम दीक्षा लेंगे, बेटा कहता है पिताजी राज अच्छा है या बुरा यदि अच्छा है तो आप क्यों छोड़ रहे हो, बुरा है तो प्यारे बेटे को क्यों दे रहे हो, हजार बेटों में से किसी ने भी राज नही लिया। गर्भस्थ शिशु को राज देकर सभी ने दीक्षा ले ली।
अनासक्ति
साधु ने एक व्यक्ति को पारस मणि चार माह के लिए दिया, जितना सोना बनाना चाहो बना लो, वह बाजार में लोहा खरीदने गया, आज महँगा हैं कल खरीदेंगे, यह कहते कहते चार माह में लोहा नहीं खरीद सका, साधु ने अपना मणि वापस ले लिया, हमें भी नर भव रूपी मणि मिला, संयम का पालन कल करेंगे, ऐसा सोचकर सारा जीवन खो देते हैं।
पुरुषार्थ
प्रद्युम्न का वैराग्य– द्वारकाधीश कृष्णजी ने नेमिनाथ भगवान् से पूँछा, भगवन्! ये द्वारका नगरी क्या हमेशा ऐसी ही हरी-भरी बनी रहेगी? भगवान् ने कहा हे कृष्ण! बारह वर्ष के बाद इस नगरी का द्वीपायन के द्वारा विनाश हो जायेगा, सुनकर बहुत लोगों ने दीक्षा ले ली, प्रद्युम्नजी को भी वैराग्य हो गया, प्रद्युम्नजी वसुदेव से आज्ञा लेने जाते हैं, वे कहते है बेटा! अभी तुम्हारे भोग भोगने के दिन हैं न कि वैराग्य धारण करने के, प्रद्युम्नजी ने कहा आप तो संसार के स्तम्भ बने रहो, मैं तो दीक्षा लेता हूँ, स्त्री से कहा प्रिय! मैं दीक्षा लेने जाता हूँ, स्त्री कहती है वैरागी ने प्रिय सम्बोधन कैसे किया? आप लो या न लो मैं तो दीक्षा लेने जाती हूँ, और प्रद्युम्न से पहले उनकी पत्नी दीक्षित हो गयी।
अनासक्ति
यमपाल का संयम– राजा ने अष्टान्हिक में सभी को हिंसा न करने का आदेश दिया, राजकुमार ने राजाज्ञा का उल्लङ्घन करके एक भेड़ को मारकर खा लिया, राजा को पता चला, तो राजा ने राजकुमार को फाँसी की सजा देने का आदेश दिया, चाण्डाल ने चतुर्दशी के दिन हिंसा का त्याग किया था जिसके कारण फाँसी देने से मना कर दिया, राजा ने दोनों को बाँधकर तालाब में फैकने का आदेश दिया, चाण्डाल के चतुर्दशी को हिंसा के त्याग के नियम के प्रभाव से, देवों ने सिंहासन की रचना की एवं राज कुमार को जल जन्तु खा गये।
अहिंसा
पिता ने बेटों को बीज दिये और कहा सम्भाल के रखना, एक लड़के ने बेंच दिये, दूसरे ने तिजोरी में रख दिए, तीसरे ने खेत में बो कर सैकड़ों बोरा अनाज बना दिया, कुछ वर्षों बाद पिता ने बेटों से बीज माँगे, तो पहला बाजार दौड़ा, दूसरा तिजोरी में देखने गया तो सड़ गए थे, तीसरे ने खेत में से लाकर पिता का मन जीत लिया, इसी तरह धर्म रूपी बीज को संयम रूपी खेत में बो दो तो अनन्त गुना फलता है।
पुरुषार्थ
धन्वन्तरि और विश्वानुलोम–धन्वन्तरि और विश्वानुलोम दोनों मित्र थे, एक जैन और एक जैनेत्तर, विश्वानुलोम ने सुन रखा था कि हाथी कुचल दे तो भी जैन मन्दिर मे नहीं जाना चाहिए, जबकि जैनेत्तर शास्त्र में जन मन्दिर पाठ था, जिसका अर्थ 'वेश्यालय अथवा मदिरालय' होता है, बाद में लोगों ने ईर्ष्या द्वेष के वश 'ज' के ऊपर दो मात्राएँ चढ़ा दीं, जिसका अर्थ जैन मन्दिर हो गया, जिससे लोग वेश्यालय और मदिरालय से तो परहेज करते नहीं हैं, जैन मन्दिर से परहेज करते हैं, इसलिए जब भी वह जैन मन्दिर के सामने से निकलता तब कानों में अङ्गुलि लगा लेता जिससे कोई शब्द कान मे न पढ़ जाए, एक बार उसे पैर में ठोकर लग गई जिससे उसके कान की अङ्गुलियाँ निकल गईं, तो 'देवों कि परछाई नहीं होती' यह शब्द कान मे पढ़ गया, उसकी पत्नी को कोई अदृश्य होकर परेशान करता था, उसने देखा तो उसकी परछाई थी, इसलिए उसने घर मे धुआँ करके उसके आँखों का अञ्जन दूर कर दिया और अपराधी को राजा के लिए सौंप दिया, वह विपत्ति से छूट गया, तब से उसका जैन मन्दिर के प्रति द्वेष दूर हो गया और वह मन्दिर जाकर दर्शन करने लगा और प्रवचन सुनने लगा, प्रवचन के बाद सबने नियम लिया तो उसने भी नियम लिया 'विना सात कदम पीछे हटे गलत काम नहीं करेंगे'। एक बार रात को बारह बजे जुआ खेलकर लौटा तो देखता है कि मेरी पत्नि किसी पुरुष के साथ सो रही है, तुरन्त तलवार निकाल कर मारने के लिए तैयार हुआ तो तुरन्त उसे याद आया कि 'सात कदम पीछे हटने के बाद ही गलत काम करना है' जैसे ही पीछे हुआ कि वहाँ से आबाज आई माँ पीछे खिसको गर्मी लग रही है, समीप आकर देखा तो वे सास बहु थीं, उस रात वे नाटक दिखाने गईं थीं और वेश-भूषा बदले विना ही सो गई थीं, उसकी पत्नी गर्भवती थी, अतः तीन प्राणियों कि रक्षा हो गई जिससे उसकी श्रद्धा और बढ़ गई।
भक्ति
पराग को पीते-पीते कमल बन्द हो गया, भौंरा विचार करता है, रात्रि व्यतीत होगी सूर्य उदित होगा, कमल खिल जाएगा हम उड़ जाएंगे, इतने में हाथी आकर के कमलनि सहित उसे खा जाता है, इसी प्रकार संसारी प्राणी योजनाएँ बनाता रहता है और सोचता है कि इसके बाद आत्म कल्याण कर लेंगे बीच में ही यमराज रूपी हाथी खा जाता है।
समाधि