Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
चरित्र

न्यायोपात्तं धनो यजन् गुणगुरून् सदगीस्त्रिवर्गं भजन्, अन्योन्यानुगुणं तदर्ह गृहणी स्थानालयो ह्री मयः। युक्ताहार विहार आर्य समिति प्राज्ञः कृतज्ञो वशी, श्रृण्वन् धर्म कथां दयालु रघभी सागार धर्मं चरेत्।।

न्याय पूर्वक आजीविका हो, नव देवता की पूजा करने वाला हो, प्रशस्त वचन बोलने वाला हो, धर्म, अर्थ, काम पुरुषार्थ का एक-दूसरे की क्षति करने वाला न हो, गृहस्थ धर्म के योग्य स्त्री हो, सत्सङ्गति वाला स्थान हो, अयोग्य कार्य के करने में लज्जा वाला हो, योग्य आहार-विहार करने वाला हो, गुणवानों की सङ्गति करने वाला हो, बुद्धिमान हो, इन्द्रिय जेता हो, धर्म कथा सुनने वाला हो, कृतज्ञ हो, दयालु हो, पाप भीरु हो वह श्रावक कहलाता है।

He whose livelihood is just, who worships the nine deities, who speaks noble words, who lets the pursuits of dharma, wealth and desire not harm one another, who has a wife fit for household dharma, dwells in a place of good company, feels shame at unworthy acts, keeps proper food and habits, associates with the virtuous, is wise, has conquered the senses, listens to religious discourse, is grateful, compassionate and fearful of sin — such a one is called a shravaka.

— आराध्य सूत्र · #13

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