Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
विवेक

अभ्यस्यान्तरदृशं किमु लोकभक्तया, मोहं कृषी कुरुत किं वपुषा कृषेन। एतद्द्वयं यदि न किं बहुभिर्नियोगैः, क्लेशैश्च किं किमपरैः प्रचुरैस्तपोभिः।।

अन्तर दृष्टि का अभ्यास करो, लौकिक ख्याति से क्या होगा? मोह कृष करो, शरीर कृष करने से क्या होगा, ये दोनों अगर नहीं हैं तो बहुत सारे आवश्यकों का पालन करने से एवं प्रचुर काय क्लेश करने से क्या होगा?

Practise inner vision - what use is worldly fame? Thin down your delusion; what use in merely thinning the body? If these two are absent, what use is observing many rituals or undergoing much bodily austerity?

— आराध्य सूत्र · #32

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प्रकृति ने सूर्योदय, सूर्यास्त, गर्मी, बरसात, ठंड सब का समय निश्चित कर रखा है केवल मनुष्य को ही हर बात की छूट दे रखी है, कब सोना, कब जागना, क्या करना सब कुछ स्वयं मनुष्य के हाथ में है वह सब कुछ करने में स्वतंत्र है।
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