Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
विवेक

आत्मीय गुणों की वृद्धि करना ही इसका लक्षण है, आत्मशुद्धि में दुर्बलता नहीं आने देना उपबृह्रण अथवा उपगूहन है, आत्मा को रत्नत्रय भाव से च्युत नहीं होने देना ही उपबृह्रण है, इससे गुण श्रेणी रूप से निर्जरा होती है। जिनेन्द्रभक्त सेठ की तरह, निन्दा उसी के कान में करें और प्रशंसा माइक से करें।

Its mark is the increase of one's own virtues; not letting weakness enter self-purity is upabrimhana or upaguhana; not letting the soul fall from the disposition of the Three Jewels is upabrimhana, whereby karmic shedding occurs in ascending grades of virtue. Like the Jina-devoted merchant, speak censure only into the person's own ear, but praise over the microphone.

— आराध्य सूत्र · #3

इसी विषय के और सूत्र

सभी विवेक →
प्रकृति ने सूर्योदय, सूर्यास्त, गर्मी, बरसात, ठंड सब का समय निश्चित कर रखा है केवल मनुष्य को ही हर बात की छूट दे रखी है, कब सोना, कब जागना, क्या करना सब कुछ स्वयं मनुष्य के हाथ में है वह सब कुछ करने में स्वतंत्र है।
विवेक