जे णय दिट्ठि विहीणा, तेसिं ण होई वत्थु रूव उवलद्धि। वत्थु सहाव विहीणा सम्माइट्ठि कहा हुंति।।
जो नयदृष्टि से विहीन है उन्हें वस्तु स्वरूप की उपलब्धि नहीं होती और वस्तुस्वभाव से विहीन सम्यग्दृष्टि ही कहाँ होता है ?
Those devoid of the standpoint of naya do not attain the true form of a thing; and how can there be right faith at all in one devoid of the nature of the thing?
— आराध्य सूत्र · लघुनयचक्र · #1
–