Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 36 / 41

गजब का तमाशा- रामकृष्णपरमहँस जी का इन्दौर में प्रवचन था, प्रवचन के प्रारम्भ में उन्होंने दो-तीन बार कहा ! आज हमने गजब का तमाशा देखा, श्रोताओं को सुनने की उत्कण्ठा हुई, उन्होंने कहा ! एक महिला दो-तीन बच्चों के साथ धान कूट रही थी, वह बीच-बीच में बच्चों से बातें भी करती जाती थी, और फटाफट मूसल भी पटकती जाती थी, लेकिन एक भी मूसल उसके हाथ में नहीं लगा, उसी प्रकार ज्ञानी भी घर में रहता है, घर के सारे काम करता है, पर पाप कर्म से अपने को हमेशा बचाता रहता है।
विवेक
भावों का प्रभाव- राजा भटक गया, जङ्गल में बुढ़िया की कुटिया पर गया पानी माँगा, बुढ़िया ने कहा बेटा लू लग जायेगी, बगीचा से एक अनार का लौटा भर रस लाकर राजा को पिलाया, राजा ने सोचा इतना सुन्दर बगीचा मेरे राज्य में आता है या नहीं ? मन्त्री से पता करवाया, अपना है तो 'कर' लगाना है, अगली बार राजा फिर भटक कर, बुढ़िया के यहाँ गया, जूस माँगा, अब बुढ़िया ने पचास अनारों को निचोड़ा फिर आधा लोटा जूस निकला, वह भी बेस्वाद था, राजा ने पूँछा आज क्या हो गया, बुढ़िया ने कहा ! राजा का भाव बिगड़ गया है, भावों का प्रभाव पड़ता है।
मन
मन के हारे हार है- जापान का सेनापति तेगूलाङ्ग बड़ा चतुर था, अपनी सेना के मनोबल को कम देखकर उसने कहा कि देवी ने प्रसन्न होकर ये सिक्का दिया है, यदि दो बार उछालने पर चित्त आये तो अपनी जीत होगी सिक्का उछाला दोनो बार चित्त आया क्योंकि उसमें पट्ट था ही नहीं, सेना का हौसला बढ़ गया और कम सेना भी विशाल सेना से जीत गयी।
मन
शरीर उत्पत्ति का क्रम- माता के उदर में वीर्य प्रवेश के बाद रज-वीर्य के संयोग रूप दस दिन तक कलल दशा में, फिर दस दिन कालिमा दशा में, दस दिन स्थिर होता है, तांबा और चाँदी का रस मिलने पर जो दशा होती है, वही रज और वीर्य के संयोग से होती है, एक माह तक स्थिर अवस्था होती है, दो माह में बुलबुले जैसा होता है, तीसरे माह में घट के आकार होता है, चार माह में मांस के पिण्ड रूप होता है, पाँच माह में उस आकार में पाँच अङ्कुर होते हैं, जिनसे दो हाथ, दो पैर और सिर बनता है, छ: माह में आँख, कान, नाक आदि उपाङ्गों की रचना होती है, सातवें माह में चर्म-रोम, हाथ-पैर के नख उत्पन्न होते हैं, आठवें माह में हलन-चलन होता है, नौ या दस माह में गर्भ से बाहर आता है।
प्रकृति
सप्त धातु की मात्रा- मनुष्य के शरीर में दुर्गन्ध मज्जा से भरी तीन सौ हड्डियाँ होती हैं, सम्पूर्ण शरीर में तीन सौ सन्धि, नौ सौ स्नायु, सात सौ शिराएं, पाँच सौ मांसपेशियाँ, चार शिराओं के जाल, सोलह रक्त से पूर्ण 'महाशिराएँ', छ: शिराओं के मूल हैं, दो माँस रज्जू जो एक पीठ और एक पेट के आश्रित हैं, सातत्वचाएँ, सातकालेचक, 'अस्सीलाख करोड़ रोम', पक्वाशय और आमाशय में सोलह आँते, दुर्गन्धित मल के सात आशय, तीनस्थूण, एक सौ सात मर्म स्थान, नौमल द्वार जिनसे नित्य मल बहता है, स्वयं के एक अञ्जुलि प्रमाण मस्तक, एक अञ्जुलि प्रमाण मेद, एक अञ्जुलि प्रमाण वीर्य, एकअञ्जुलि प्रमाण ओज (शुक्र), तीन अञ्जुलि प्रमाण बसा, छ: अञ्जुलि प्रमाण पित्त, छ: अञ्जुलि प्रमाण कफ, आधा आठक प्रमाण खून, एकआठक प्रमाण मूत्र, छ: प्रस्थ प्रमाण विष्ठा, बीस नख, बत्तीस दाँत, जैसे घाव में कीड़े भरे रहते हैं वैसे ही शरीर बहुत से कीड़ों से भरा है इस प्रकार शरीर के सभी अवयव अशुभ पुद्गल रुप हैं एक भी अवयव ऐसा नहीं है जो पवित्र और सुन्दर हो।
अनासक्ति
प्रथम पृथ्वी, एक लाख अस्सी हजार योजन मोटी है, उनमें खर भाग सोलह हजार योजन, पङ्कभाग चौरासी हजार योजन, अब्बहुल भाग अस्सी हजार योजन मोटा है। द्वितीय पृथ्वी बत्तीस हजार योजन, तृतीय पृथ्वी अठ्ठाईस हजार योजन, चतुर्थ पृथ्वी चौबीस हजार योजन, पञ्चम पृथ्वी बीस हजार योजन, षष्टम पृथ्वी सोलह हजार योजन, सप्तम पृथ्वी आठ हजार योजन, इनके सब ओर बीस-बीस हजार योजन मोटे वातवलय हैं।
Misc.
देव और नारकी दोनों का उप्पाद जन्म होता है पर देवों का सुखकर है, नारकियों का दु:खकर है, नरक में कोई दु:ख की कथा सुनने वाला नहीं, जिसको सुनावें वही भाला बनकर दु:ख देता है, यहाँ चींटी आदि को तो सुख है, किन्तु वहाँ क्षण मात्र भी सुख नहीं है, वहाँ का शोरगुल सुनलें, तो मनुष्य का हार्ट फेल हो जाये।
कर्म
'परिणाम' स्पर्श- हजार बिच्छू काटें उससे अधिक पृथ्वी के स्पर्श का कष्ट है। रस- हलाहल जहर के समान रस का कष्ट है। गन्ध- सप्तम नरक की मिट्टी का चने के बराबर दाना मध्यलोक में आ जाये, तो 'साड़े चौबीस' कोस के पञ्चेन्द्रिय जीव उसकी दुर्गन्ध से मर जायेंगे। रूप- नारकियों का रूप देखने मात्र से हार्टफैल हो जाये। देह- नारकियों का शरीर समस्त रोगों से ग्रसित होता है एवं नरक में कोई औषधि नहीं मिलती है।
कर्म
एक-एक विजयार्द्ध पर एक सौ दस-एक सौ दसविद्याधरों की नगरियाँ हैं, एक-एक नगरी के आश्रित एक-एक करोड़ नगर हैं, इस तरह ढाईद्वीप में एक सौ सत्तर विजयार्द्ध हैं और अठारह हजार सात सौ कुल उनकी नगरियाँ हैं, पाँच अरब कुल जनसंख्या है।
Misc.
मध्यलोक में सबसे ज्यादा जिनधर्म हैं और उससे कम जिनबिम्ब हैं, कृत्रिम जिनबिम्ब अधिक हैं अकृत्रिम कम हैं। मध्यलोक में 458 चैत्यालयों की प्रसिद्धि है किन्तु असंख्यात द्वीपों में असंख्यात अकृत्रिम चैत्यालय है। जैसे नन्दीश्वर भक्ति में लिखा है ''अगणित द्वीपों में अगणित हैं अगणित गुण गण मण्डित हैं''।
भक्ति
सोलह अङ्ग प्रमाण जीव राशि में एक अङ्कको अनन्त के बराबर जानना चाहिए, तीन अङ्क मध्यम अनन्तानन्त प्रमाण सिद्ध हैं और तेरह अङ्क प्रमाण सभी जीव जानना, किन्तु बारहअङ्क प्रमाण अनाद्यनन्त निगोदिया और एक अङ्क में बहु भाग निगोदिया हैं और शेष में चारों गतियों के जीव हैं, देव राशि भी मध्यम अंसख्यात है।(उनतीस अङ्क मनुष्यों का प्रमाण कहा है, वह सामान्य है)।
Misc.
पञ्चम काल में प्रथम तीन हजार वर्ष में चौसठ जीव विदेह क्षेत्र जाकर नौ वर्ष में दीक्षा ले कर अलग-अलग केवल ज्ञान प्राप्त कर, नौ वर्ष कम एक करोड़ पूर्व काल तक विहार कर मुक्त होंगे, अगले तीन हजार वर्ष में बत्तीस, इसके अगले तीन हजार वर्ष में सोलह, आठ, चार, दो, एक, क्रमश: इक्कीस हजार वर्ष में एक भवावतारी होंगे।
Misc.
भरत-बाहुबली ने बन्दर और नेबला की पर्याय में दान की अनुमोदना की थी, उसके बाद उन्होंने कभी दान नहीं दिया, अत: इनको जाति स्मरण नहीं हुआ, राजा श्रेयाँस ने श्रीमति (वज्रजङ्घ की पत्नी) की पर्याय में आहार दान दिया था, इसलिये उनको जाति स्मरण हो गया था।
दान
विदेह क्षेत्र में बत्तीस नगरियाँ हैं, एक-एक नगरी में एक तीर्थङ्कर हो सकते हैं, छ: खण्ड होते हैं, हमेशा चौथा काल होता है, सामान्य केवली हमेशा रहते हैं, आचार्य, उपाध्याय, साधु परमेष्ठी भी हमेशा रहते हैं, एक नगरी के तीर्थङ्कर दूसरी नगरी में नहीं जाते हैं।
Misc.
भोगभूमि में सात दिन तक उत्तानाशय (पीट के सहारे लेटना), सात दिन तक अङ्गूठा चूसना, सात दिन तक रेंगना, सात दिन तक लड़खड़ाकर चलना, सात दिन तक स्थिर चलना, सात दिन में कलाएँ प्राप्त करना, सात दिन में गुणों की प्राप्ति करना, इस प्रकार जघन्य भोगभूमि में मनुष्य उनञ्चास दिन में जवान, मध्यम भोगभूमि में पैंतीस दिन में और उत्तम भोगभूमि में इक्कीस दिन में जवान हो जाते हैं।
Misc.
भोगभूमि का वैभव- भूमि निर्मल दर्पणवत् साफ-स्वच्छ, कीड़ों से रहित, पाँच वर्ण की चार अङ्गुल प्रमाण मधुर सुगन्धित घास। जल जन्तु रहित वापिकाएँ। औषधि युक्त अमृत तुल्य निर्मल जल। अनेक प्रकार के अनुपम आसनो से युक्त मृदु शय्याओं वाले प्रासाद, स्वर्ण एवं रत्न मयी पर्वत, नदियों के दोनों तटों पर रत्नों से युक्त सीढ़ियाँ। विकलत्रय असंज्ञी जीवों से रहित जल, रोग-कलह-ईर्ष्या का अभाव। रात-दिन एवं सर्दी-गर्मी-अन्धकार के भेद से रहित मौसम। पापों से रहित, पति पत्नी के अलावा परिवार-ग्राम-नगरादि से रहित। एक पुरुष में नौ हाथियों का बल। प्रशस्त बत्तीस लक्षणों से युक्त कवलाहारी होकर भी नीहार से रहित। दस प्रकारके कल्पवृक्ष, बत्तीस प्रकार के पेय पदार्थ, नाना प्रकार के वादित्र, सोलह प्रकार के आहार। सत्रह प्रकार के व्यञ्जन, चौदह प्रकार के छाल, एक सौ आठ प्रकार के खाद्य पदार्थ, तीन सौ त्रेसठ प्रकार के (मिष्टान्न) स्वाद्य पदार्थ। त्रेसठ प्रकार के रस, सोलह हजार प्रकार की फूल मालाएं, सोलह प्रकार के भवन-स्वस्तिक-नन्द्यावर्त, ''चक्रवर्ती के भोग से अनन्तगुणे भोग'', विक्रिया द्वारा अनेक प्रकार के शरीर, भोग सामग्री, पुरूष के सोलह प्रकार व स्त्री के चौदह प्रकार के आभूषण, चौसठ कलाओं से युक्त कला गुण, वज्रवृषभनाराच संहनन, सम चतुरस्र संस्थान युक्त शरीर। पुरुष का छींक से व स्त्री का जम्भाई से कष्ट रहित मरण होता है एवं स्वर्ग ही जाते हैं।
Misc.
इस जम्बूद्वीप में सात क्षेत्र, एक मेरू, दो कुरू(देवकुरु उत्तरकुरु), जम्बू और शाल्मलि दो वृक्ष, छह कुलाचल, कुलाचलों पर स्थित छह महा सरोवर, चौदह महानदियाँ, बारह विभङ्ग नदियाँ, सोलह वक्षारगिरि, चार गजदन्त, चौंतीस नगरियाँ, चौंतीस रजतगिरि, चौंतीस वृषभाचल, अड़सठ गुफाएँ, चार गोलाकार नाभिगिरि एवं सैंतीस सौ चवालीस विद्याधर राजाओं के नगर हैं, इन सभी से यह जम्बूद्वीप अत्यधिक सुशोभित है। इस से दूने धातकीखण्ड में और पुष्करार्ध में हैं। लक्ष्मणजी के समान कृष्णजी ने भी कोटि शिला उठाई प्रतिनारायण जरासन्ध को मारने का निश्चय किया।
Misc.
समुद्रों के जल का स्वाद- लवण समुद्र के जल का स्वाद नमक के समान है। वारुणीवर समुद्र के जल का स्वाद शराब के समान है, घृतवर का जल घी और क्षीरवर का जल दूध के समान है। कालोदधि और अन्तिम स्वयम्भूरमण समुद्र का जल पानी के समान है। पुष्करवर समुद्र का मधु और पानी के समान तथा बाकी समस्त समुद्र इधु रस के समान स्वाद वाले हैं।
Misc.
समुद्रों में मत्स्यों की अवगाहना- लवण समुद्र के तीर पर सम्मूच्छन जन्म से उत्पन्न हुये महामत्स्य नौ योजन लम्बे तथा समुद्र के मध्य में अठारह योजन लम्बे हैं, गर्भ जन्म से उत्पन्न होने वाले मत्स्यों की लम्बाई सम्मूच्छन मत्स्यों की लम्बाई से आधी होती है। स्वयम्भूरमण समुद्र के तीर पर मत्स्यों की लम्बाई पाँचसौ योजन की, समुद्र के मध्य में एक हजार योजन लम्बे, पाँच सौ योजन चौड़े, ढ़ाई सौ योजन ऊँचे मत्स्य हैं, राघवमत्स्य का घनफल साढ़े बारह करोड़ योजन से ज्यादा निकलता है। लवणसमुद्र में नौ योजन, कालोदधि में अठारह योजन और स्वयम्भूरमण में एक हजार योजन इन तीन समुद्रों के सिवाय अन्य समुद्रों में मत्स्यादि जलचर जीव नहीं होते हैं।
Misc.
कुलकर वंश और भवन- प्रथम कुलकर प्रतिश्रुति महाप्रभाव से सम्पन्न एवं अपने पूर्व भव के स्मरण से सहित थे। प्रतिश्रुति कुलकर के स्वर्गस्थ होने पर उन्हीं का पुत्र सन्मति द्वितीय कुलकर हुआ इसी प्रकार सभी कुलकर एक ही वंश के थे। उस समय भरत क्षेत्र में कल्पवृक्ष रूप प्रासाद अन्यत्र नष्ट हो गये थे परन्तु राजा नाभिराय का जो कल्पवृक्ष रूप प्रासाद था वही पृथ्वी निर्मित बन गया था, राजा नाभिराय के उस प्रासाद का नाम सर्वतोभद्र था, उसके खम्भे स्वर्ण मय थे, दीवालें नाना प्रकार के मणियों से निर्मित थीं वह पुखराज तथा मोती आदि की मालाओं से सुशोभित था, इक्यासीखण्ड से युक्त था और कोट, वापिका तथा बाग-बगीचों से अलङ्कृत था। वह अधिष्ठाता नाभिराय के प्रभाव से अकेला ही अनेक कल्पवृक्षों से आवृत था तथा पृथ्वी के मध्य अपने स्थान पर अधिष्ठित था।
परिवार
राजा श्रेयांस-आहारदान- राजा श्रेयाँस के जीव श्रीमति और आदिनाथ जी के जीव वज्रजङ्घ ने दस भव पूर्व चारण ऋद्धि के धारक अपने ही दो पुत्रों के लिए जिस विधि से दान दिया था, वह सब विधि भगवान् के दर्शन करते ही श्रेयाँस की स्मृति में आ गयी, आहार के बाद ऋषभ देव तप की वृद्धि के लिए वन को गये तब देवों ने अभिषेक पूर्वक दान तीर्थङ्कर राजा श्रेयाँस की पूजा की थी। दान, पूजा, तप और शील यह गृहस्थ का चार प्रकार का धर्म शरीर से करने योग्य है।
दान
सेनापति जय कुमार की दीक्षा- भरत चक्रवर्ती के सेनापति जयकुमार के साथ एक सौ आठ राजाओं ने दीक्षा धारण की और उनकी पत्नी सुलोचना ने अनेक सपत्नियों के साथ ब्राह्मी और सुन्दरी आर्यिका के पास दीक्षा ली। दीक्षोपरान्त जयकुमार शीघ्र ही द्वादशाङ्ग के पाठी होकर भगवान् के गणधर हो गये और आर्यिका सुलोचना ग्यारह अङ्गों की धारक हो गयी एवं नमि-विनमि भी छिहत्तर-सतत्तर वें गणधर हुये थे।
धर्म
श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव के बैरी सूर्पक नामक देव ने वसुदेव का हरण किया, उन्होंने मुक्कों से उसकी पिटाई की तो छूटकर गझ्झा नदी में गिरे, वहाँ से निकलकर जङ्गल में घूमने लगे वहाँ म्लेच्छों के राजा ने उन्हे देखा जिससे म्लेच्छराज की जरा नामक कन्या को व्याहकर वहीं रहने लगे और उस कन्या से जरत्कुमार नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। नेमिनाथ भगवान् जब गर्भ में आये तब प्रतिदिन, दिन में तीन बार साढ़े तीन करोड़ रत्नों की वर्षा होती थी, चौदह रत्नों की एक-एक हजार देव रक्षा करते थे।
Misc.
नव निधियाँ-1.कालनिधि- में ज्योतिष्शास्त्र, निमित्तशास्त्र, न्यायशास्त्र कलाशास्त्र, व्याकरणशास्त्र पुराण आदि का सद्भाव होता है। 2.महाकालनिधि- में विद्वानों के द्वारा निर्णय करने योग्य पञ्च लोह आदि नाना प्रकार के लोहों का सद्भाव होता है। 3.पाण्डुकनिधि- में शालि, ब्रीही, जौं आदि समस्त प्रकार के धान्य तथा कड़वे-चरपरे आदि पदार्थों का सद्भाव होता है। 4.माणवकनिधि-में कवच, ढाल, तलवार, बाण, शक्ति, तोमर, चक्रादि नाना प्रकार के दिव्य शस्त्रों का सद्भाव होता है। 5.सर्पनिधि- में शय्या, आसन आदि नाना प्रकार की वस्तुओं तथा घर के उपयोग में आने वाले नाना प्रकार के बर्तनों का सद्भाव होता है। 6.सर्वरत्ननिधि- इन्द्रनीलमणि, महानीलमणि, वज्रमणिआदि बड़ी-बड़ी दो शिखा के धारक उत्तमोत्तम रत्नों का सद्भाव होता है। 7.शङ्खनिधि-भेरी, शङ्ख, नगाड़े, वीणा, छल्लरी और मृदङ्ग आदि आघात से तथा फूँककर बजाने योग्य नाना प्रकार के बाजों का सद्भाव होता है। 8.पद्मनिधि- पाटाम्बर, चीन, महानेत्र, दुकूल, उत्तम कम्बल तथा नाना प्रकार के रङ्ग-बिरङ्गे वस्त्रों का सद्भाव होता है। 9.पिङ्गलनिधि-कड़े कटि सूत्र आदि स्त्री-पुरूषों के आभूषण और हाथी-घोड़ा आदि के आभूषणों का सद्भाव होता है। ये नवनिधियां कामवृष्टि नामक गृहपति के अधीन होती हैं और सदा चक्रवर्ती के मनोरथों को पूर्ण करती हैं।
Misc.
इस अध्याय में वर्णनीय विषय: 1. जम्बूद्वीप का वर्णन नक्शा द्वारा, 2. सुमेरुपर्वत का वर्णन एवं उसकी गणना, कौन सा वन कहाँ है, कितनी ऊँचाई पर है 3. नन्दीश्वर द्वीप का वर्णन, सभी द्वीप और समुद्रों को दूना करके एक सौ त्रेसठ करोड़ चौरासी लाख योजन प्रमाण निकलता है, 4. छियानवे अन्तर्द्वीप का वर्णन, 5. पैतालीस लाख योजन प्रमाण ढाईद्वीप का नक्शा द्वारा वर्णन करना चाहिए, 6. मध्यलोक के चार सौ अठ्ठावन जिनालय का वर्णन, 7. पाँच भरत, पाँच ऐरावत के त्रिकाल सम्बन्धी तीस चौबीसी के सात सौ बीस तीर्थङ्करों का वर्णन करना चाहिए।
Misc.
मध्यलोक के चार सौ अठ्ठावन अकृत्रिम जिनालय- ढाईद्वीप में पञ्चमेरु के अस्सी,
भक्ति
सौधर्मेन्द्र अपनी सभा को सम्बोधित करते हुये ऐसे भाव विभोर हो जाते हैं, कि देखों हमारे पास रत्नत्रय धारण करने की योग्यता ही नहीं है, देव कहते हैं कि हे सुरेश्वर! मनुष्य बनकर रत्नत्रय धारण कर सकते हैं, तब इन्द्र ने कहा जो मनुष्य बन जाता है, उनको कल्याण करने की भावना ही नहीं होती है, पृथ्वी पर ब्रह्मलोक से गये रामचन्द्रजी कैसे राग में फँसे हुये हैं, अभी तक कल्याण की भावना ही नहीं हो रही, उनको राज्य और रानियों से मोह नहीं, किन्तु लक्ष्मण जी से अधिक मोह है, इस बात को सुनकर देव उनके स्नेह की परीक्षा करने आये, लक्ष्मणजी से मिले और कहा रामचन्द्रजी मर गये, यह सुनते ही लक्ष्मण जी की मृत्यु हो गयी।
अनासक्ति
भरत-ऐरावत में उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी का विधान है, विजयार्द्ध पर्वत और म्लेच्छखण्ड में नहीं, अतःपञ्चम काल के अन्त में कुवृष्टि के समय विद्याधर और देव विजयार्द्ध की गुफाओं में मनुष्यों को छिपा देते हैं।
विविध
चन्द्रमा के विमान को सोलह हजार, सूर्य के विमान को आठ हजार, ग्रह के विमान को चार हजार, नक्षत्र के विमान को दो हजार, प्रकीर्णक के विमान को एक हजार, पूर्व से दक्षिण तक बैल के मुखाकार वाले, दक्षिण से पश्चिम तक सिंह के मुखाकार वाले, पश्चिम से उत्तर तक हाथी के मुखाकार वाले, उत्तर से पूर्व तक घोड़े के मुखाकार वाले देवता हमेशा खींचते हैं।
विविध
सत्यनारायण के छह पुत्र- ज्ञानचन्द्र, रूपचन्द्र, धर्मचन्द्र, अधर्मचन्द्र, गगनचन्द्र और कालचन्द्र छहों को पिता ने बुलाकर काम सौंपा। ज्ञानचन्द्र! तुम्हें जानने-देखने का काम है। रूपचन्द्र! तुम्हे रूप प्रदर्शन करना है। धर्मचन्द्र! जीव-पुद्गल तुम्हारे दोनों बड़े भैया हैं, उनको चलने में सहायता देना। अधर्मचन्द्र! जीव-पुद्गल चलकर आयें तो विश्राम देना। गगनचन्द्र! आवास मन्त्री है, सबको आवास देना। काल! सबको परिवर्तन करने में सहयोग देना। ज्ञानचन्द्र सबसे बड़े थे अतः मनमानी करने लगे, ज्ञायक स्वभाव से उल्टा राग-द्वेष करने लगे, इससे संसार में दुःख भोगने लगे, दुःखों से बचने के लिए अपने ज्ञायक स्वभाव में आना आवश्यक है।
ज्ञान