Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 37 / 41

इन्दौर की एक मारूति जङ्गल में पकड़ी जाने वाली थी, उन्होंने देखा खतरा है इसलिये गाड़ी छोड़कर बाहर घूमने लगे, पुलिस ने पूँछा ये गाड़ी किसकी है, उन्होंने कहा हमारी नहीं हैं, तो खतरा से बच गये, इसी प्रकार हाट-हवेली हमारे नहीं हैं ऐसा मानेंगे तो कर्मबन्ध से बच जायेंगे।
अनासक्ति
जीव कहता है, हे भगवन्! इन कर्म रूपी दुष्टों ने हमें बेहाल कर दिया है, जाँच हुयी तो पुद्गल कहता है, कि भगवन्! इन्होंने राग-द्वेष से कर्मों का कर्जा लिया है, वो चुका देवें तो हम चले जायेंगे।
कर्म
''गुणसाम्ये सदृशानां''- जैसे चक्रवर्ती से चक्रवर्ती नहीं मिलते, तीर्थंकर से तीर्थंकर नहीं मिलते, नारायण से नारायण नहीं मिलते, उसी प्रकार अविभागी प्रतिच्छेदों की समानता होने पर पुद्गलों का बन्ध नहीं होता है, दो अधिक गुण होना आवश्यक है।
विविध
'पर्ययमूढ़ा'- एक धनाढ्य व्यक्ति ने सोने के गणेश और चूहा बनवाये थे, दैव योग से उन्हें बेंचने कि नौबत आ गई, दुकानदारों ने दोनों को एक ही भाव में माँगा, क्योंकि दुकानदारों की दृष्टि में वह सोना अर्थात् द्रव्य था और बेंचने वाले की दृष्टि में वह मूर्ति अर्थात् पर्याय थी, इसलिए वह दुःखी हो रहा था।
Discernment
परमार्थ से यदि काय से पाप हुआ है तो सौ प्रतिशत दण्ड, वचन से हजार प्रतिशत दण्ड, मन से दस हजार प्रतिशत दण्ड भोगना पड़ता है। लोकव्यवहार में मन से पाप हुआ है तो कोई दण्ड नहीं मिलता, वचन से पाप हुआ है तो हजार प्रतिशत दण्ड मिलता है और काय से पाप हुआ है तो दस हजार प्रतिशत दण्ड मिलता है।
कर्म
सारी बीमारी व स्वस्थता सोच पर निर्भर है 'थूबोनजी' क्षेत्र में प्रायः सभी सङ्घ बीमार था, एक बहन भी बीमार हो गयी, उनके लिये आचार्य श्री जी से उपाय पूँछा तो उन्होंने कहा ''नहा दो'' (नहा वनस्पति) यही बात उन बहन से कही तो उन्होंने आस्था वश औषधि की जगह नहा लिया (स्नान) और वे ठीक भी हो गयीं। जबकि नहा नामक दवा देने को कहा था।
मन
अणवः स्कन्धाश्च सूत्र में समास क्यों नहीं किया? क्योंकि यहाँ भेद रूप कथन किया है। इस सूत्र से पहले जो दो सूत्र कहे हैं, 'स्पर्शरसगन्धवर्णवन्तःपुद्गलाः', 'शब्दबन्धसौक्ष्म्यस्थौल्यसंस्थानभेदतमश्छायातपोद्योतवन्तश्च' के साथ अलग सम्बन्ध बताने के लिये किया है, अणु स्पर्श रस गन्ध वर्ण वाले हैं, किन्तु स्कन्ध शब्द बन्ध एवं स्पर्शादि वाले हैं।
ज्ञान
पच्चीस क्रियाओं में कुछ पुण्यबन्ध का कारण हैं, कुछ पाप बन्ध का कारण हैं, जैसे प्रारम्भ की पाँच क्रियायें पुण्य-पाप दोनों का कारण हैं, छः से दस तक हिंसा की प्रधानता से हैं, ग्यारह से पन्द्रह तक इन्द्रिय विषयों की प्रधानता से हैं, सोलह से बीस तक धर्माचरण से वञ्चित रखने वाली हैं, इक्कीस से पच्चीस तक उच्च धर्माचरण से गिराने वाली हैं, प्रारम्भ की क्रियाएं क्रमशः सम्यक्त्व और मिथ्यात्व को बढ़ाने वाली हैं।
कर्म
एक स्त्री पुत्रादि का राग, दूसरा पञ्च परमेष्ठी का राग, किसको छोड़ना? एक बुद्धि पूर्वक छोड़ना, दूसरा छूट जाएगा, एक आग है, दूसरा शीतल छाया है, एक का राग नरक तक ले जा सकता है सुभौम चक्रवर्ती की तरह और दूसरा सर्वार्थसिद्धि तक ले जा सकता है नकुल, सहदेव की तरह।
अनासक्ति
तन्दुलमच्छ- एक राजा ने अपने रसोइया से मांस बनवाया, लेकिन खा नहीं पाया, दो-तीन बार ऐसा होता रहा, इतने में राजा की मृत्यु हो गयी, राजा मरकर तन्दुलमच्छ बना, रसोइया राघवमच्छ बना, दोनों मरकर सातवें नरक गये।
कर्म
अधिकरण- बालक के हाथ में पिस्तौल आती है, तो वह किसी भी बालक को या माता-पिता, भाई-बहन के सीने में लगाने लगता है, यदि इसके हाथ में माला दे दो, तो वह सीधा अकड़ कर बैठ जाता है और यदि पिच्छी हाथ में आ जाये तो मुनि बनने की चेष्टा करने लगता है, अतः अच्छे उपकरणों को ही अपने पास रखना चाहिए।
विविध
'आओ चोर चोरी कर ले गओ, मोरी मूँदत मुगद फिरे' अर्थात् किसी के घर में चोरी हो गयी, दूसरे दिन उसने घर के पीछे की पानी बहने की मोरी बन्द कर दी, किन्तु खिड़की बन्द की ही नहीं, जहाँ से चोर आ सकता था, उसी प्रकार अज्ञानी प्राणी जिन भावों से कर्मों का बन्ध होता है उन्हें पहचानता ही नहीं है।
कर्म
फोटो बिगाड़ दी- फोटोग्राफर ने कहा! रेडी, तभी नाक पर मक्खी बैठी, उसे उड़ाने के लिये हाथ आगे आ गया, अब कहता तुमने फोटो बिगाड़ दी, इसी तरह आयु कर्म का बन्ध त्रिभाग (जीवन का दो हिस्सा बीत जाने पर) होता है, कब त्रिभाग पड़े, यह मालूम नहीं इसलिए सावधान रहना चाहिए अन्यथा भव विगड़ जाता है।
कर्म
एक व्यक्ति को पुत्र नहीं हो रहा था, ज्योतिषी ने कहा जब तुम बारह वर्ष का प्रवास करोगे, तो तुम्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हो जायेगी, वह विदेश गया, यहाँ पुत्र भी ग्यारह वर्ष का हो गया, पिता को कभी देखा नहीं था, फोटो देखकर स्टेशन पर लेने गया, बहुत ठण्ड थी वह बालक पिता की प्रतीक्षा में बैठा रहा, ठण्ड में चिल्लाता रहा, अपरिचित होने से अपने रूम से उसको बाहर निकाल दिया, ठण्ड के कारण मर गया, सुबह घर जाकर पता किया बेटा कहाँ है, पत्नी ने कहा! वह तो आप को लेने गया था, पता चला मेरा ही बेटा था, मैंने ही कमरे से निकाल दिया था, यह जगत का स्वभाव है।
अनासक्ति
एक-डेढ़ वर्ष की बच्ची रेंगते-रेंगते गयी और टी.वी. खोल कर देखने लगी, किसी ने पूँछा कैसे सीख गयी? उत्तर मिला! उसकी मम्मी देखती थी, इसलिए पेट से ही सीख कर आई है।
कर्म
वर्णीजी चिरोंजाबाई के साथ गोमटेश यात्रा को गये, वहाँ वर्णीजी स्नान करने नदी पर गये, नहाते समय पैसों का पर्स अलग रख दिया, वर्णीजी ने नहाया, कमरे में आ गये, भोजन करने बैठे तब पैसों का पर्स याद आया, जैसे-तैसे भोजन किया, नदी पर गये महिलायें पानी भर कर आ रहीं थीं, पर्स वहीं पड़ा था, वर्णीजी ने उनसे पूँछा, आपने पर्स को क्यों नहीं उठाया? उन्होंने जबाव दिया, हम गोमटेश के राज्य में विना दी हुयी वस्तु को कभी नहीं छूते, यह एक आश्चर्यकारी घटना थी।
चरित्र
एक व्यक्ति जीवन से परेशान होकर विष लेने बाजार गया, विष लाया खाया और सो गया, सुबह स्वस्थ होकर उठा, वह सोचता है, कि खुदा को मेरी मृत्यु मञ्जूर नही है, अब मजे से जीवन जीते हैं, वह बाजार गया चार पेड़ा लाया, और खाकर सो गया, वह आज तक नहीं उठा, सोचो जहर खा के जी गया, पेड़ा खा के मर गया।
विविध
पाँच मार्ग- 'बहुत आरम्भ और बहुत परिग्रह' 'नरकायु' के आस्रव के कारण हैं। 'अल्प आरम्भ और अल्पपरिग्रह' 'मनुष्यायु' के आस्रव के कारण हैं। 'मायाचारी' 'तिर्यञ्चायु' का कारण है। 'सरागसंयम, संयमासंयम, अकामनिर्जरा, बालतप और सम्यग्दर्शन' 'देवायु' के आस्रव के कारण हैं। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, और सम्यक्चारित्र की एकता ही मोक्ष का मार्ग है।
कर्म
लड़की ने जिद की, कि मैं नए कपड़े पहनूँगी पुराने नहीं, वह ठण्ड में काँप रही थी, उससे पूँछा क्या हो गया? उसने बोला पुराने कपड़े पहनना नहीं है नए कपड़े माँ देती नहीं है इसलिए ठण्ड में काँप रही हूँ। इसी प्रकार पञ्चम् काल में शुद्धोपयोग होता नहीं है। शुभोपयोग से संवर-निर्जरा के साथ बन्ध भी होता है, यदि बन्ध के भय से शुभोपयोग को नहीं अपनायेंगे तो अशुभोपयोग ही हाथ लगेगा और उससे दुर्गति में जाना पड़ेगा।
धर्म
कालसौकरिक कषायी ने हिंसा नहीं की, उसके पिता ने बहुत समझाया, उसने कहा हिंसा से जो दुःख होगा उसको तुम लोग बटाओगे? सबने हाँ कह दिया, उसने अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली, कहा दुःख हो रहा है बटाओ, लोगों ने कहा बेटा दुःख तो तुम को ही भोगना पड़ेगा, हम संवेदना प्रकट कर सकते हैं, कालसौकरिक कषायी की इस घटना से उस सहित पाँच सौ कषायी अहिंसक बन गये थे।
अहिंसा
तेली और क्षत्रिय का झगड़ा हो गया, तेली ने क्षत्रिय को पटक कर दबा दिया, जाति पूँछने पर जोश आया, क्षत्रिय ने तेली को क्षणभर मे नीचे दबा दिया, इसी प्रकार आत्मा क्षत्रिय है, कर्म तेली है, लेकिन अभी कर्मों की जाति नहीं जानी इसलिए आत्मा दबी हुई है।
कर्म
इन पाँचों का वर्णन पहले हो चुका है, ''तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्'' इसका प्रतिपक्षी मिथ्यात्व। 'हिंसानृतस्तेयाब्रह्म परिग्रहेभ्योव्रतिर्व्रतं' यहाँ अविरति का। ''प्रमत्तयोगात्प्राण व्यपरोपणंहिंसा'' यहाँ प्रमाद का। 'गतिकषायलिङ्ग' इत्यादि एवं 'इन्द्रिय कषायाव्रतक्रिया' इत्यादि सूत्र में कषाय का। 'काय वाङ्मनः कर्मयोगः' यहाँ योग का वर्णन हो गया है।
कर्म
नागश्री ने अणुव्रत पिता की आज्ञा के विना ले लिये, पिता जी को मालूम चला, तो व्रत वापस करने मुनिराज के पास गये। रास्ते में एक व्यक्ति की पिटाई हो रही थी, कारण पूँछा, बताया कि इसने हिंसा की है इसलिये पीटा जा रहा है। नागश्री ने पिता से कहा कि यही व्रत तो मैंने लिया है इसको छोड़कर शेष वापस कर दो। आगे जिव्हा छेदन, हाँथ काटना, लिङ्ग छेदन, छापा मारी आदि प्रसङ्ग पाकर पाँचों व्रतों की स्वीकृति ले ली, पिता ने सोचा चलो मुनिराज को उलाहना तो दे आयें, विना पूँछे व्रत क्यों दिये? मुनिराज ने कहा ये मेरी पुत्री है इसलिए व्रत दिये, वह घबरा गया और राजा से शिकायत कर दी, राजा मुनिराज से नम्रता पूर्वक पूँछते हैं, तो मुनिराज ने उन्हे अपने भव एवं पहले के रिश्ते बताये, राजा गद-गद हो गया और पुत्री ने कहा वास्तव में आप मेरे जन्म दाता हैं।
धर्म
आठ कर्मों का दृष्टान्त- देवता के मुख पर ढके वस्त्र के समान ज्ञानावरण, द्वारपाल के समान दर्शनावरण, शहद लपेटी तलवार के सामान वेदनीय, मदिरा के समान मोहनीय, बेड़ी के समान आयु, चित्रकार के समान नाम, कुम्भकार के समान गोत्र और भण्डारी के समान अन्तराय कर्म है, जिस प्रकार इनके भाव होते हैं उसी प्रकार ज्ञानावरणादि कर्मों का स्वभाव भी जानना चाहिए।
कर्म
स्त्यानगृद्धि निद्रा के उदय में सोता हुआ व्यक्ति उठा, नींद में ही दुकान खोली और कपड़ों को फाड़ कर आ गया, और उसे स्वयं पता नहीं चला कि कपड़ा किसने फाड़ा है।
कर्म
उदयपुर विद्यालय में एक बालक रात को नींद में उठकर नदी में नहाकर आता था, बच्चों ने पूँछा कहा जाते हो? उसने कहा! कहीं नहीं, बच्चों ने गुरुजी से कहा, गुरूजी उसके पीछे-पीछे नदी गये, बालक ने नदी में प्रवेश किया, गुरुजी ने आवाज दी, बालक की निद्रा भङ्ग हो गयी, भय के कारण बालक डूब कर मर गया।
कर्म
स्तवुक सङ्क्रमण- विरोधी राजा ने चढ़ाई की और कहा कोई पुरूष नहीं निकल सकता लेकिन स्त्रियाँ निकल सकती हैं, राजा ने स्त्री का वेश धारण किया और नगर के बाहर चला गया, इसी प्रकार जो प्रकृतियाँ अन्य प्रकृति रूप परिणमन करके उदय में आती हैं उसे स्तवुक सङ्क्रमण कहते हैं।
कर्म
दशकरण दृष्टान्त- 1.बन्ध- रविवार को भोजन का निमन्त्रण है उसे स्वीकार करना बन्ध है। 2.सत्ता- सोमवार से रविवार के बीच का समय सत्ता है। 3.उदय- रविवार को ठीक समय भोजनार्थ आना उदय है। 4.उपशम- भोजन में देर होने से थोड़ी देर प्रतीक्षा करना उपशम है। 5.उदीरणा- 10 बजे के स्थान में 9:30 पर आना उदीरणा है। 6.अपकर्षण- रविवार के स्थान पर शुक्रवार को आना अपकर्षण है। 7.उत्कर्षण- रविवार को न आकर मङ्गलवार को आना उत्कर्षण है। 8.सङ्क्रमण- जिसको निमन्त्रण दिया उसके बदले में किसी दूसरे को भेजना सङ्क्रमण है। 9.निधत्ति- ठीक उसी दिन 10 बजे भोजन में स्वयं आना निधत्ति है। 10.निकाचित- रविवार को स्वयं समय पर घर आना, न अगले दिन न पिछले दिन निकाचित है। 11.उदयाभावी क्षय- भोजन को आना किन्तु अस्वस्थ होने से भोजन नहीं करना उदयाभावी क्षय है। 12.देशघाती- फलाहार लिया, भोजन नहीं किया देशघाती है। 13.सर्वघाती- भरपेट भोजन करना सर्वघाती है। 14.क्षय- भोजन से पहले स्वर्गवास हो जाना क्षय है।
कर्म
दशकरण के अन्य दृष्टान्त- 1.बन्ध- 50 थान कपड़ा गोदाम में रखा है। 2.उदय- कुछ माल बिक गया है। 3.सत्ता- जितना रखा वह सत्ता है। 4.उपशम- भाव गिरने से बेचना बन्द करना। 5.उदीरणा- समय से पहले दुकान खोलना। 6.सङ्क्रमण- उसके स्थान पर दूसरा माल बेंचना। 7.अपकर्षण- भाव बढ़ने से, समय से पहले ही बेंचना। 8.उत्कर्षण- भाव घटने से कुछ दिन बाद बेंचना। 9.निधत्ति- उसी समय उसी भाव से माल बेंचना। 10.निकाचित- समय पर वही माल बेंचना, न आगे, न पीछे।
कर्म
गुणस्थानों के उदाहरण- 1.मिथ्यात्व गुणस्थान- ज्वर पीड़ित रोगी को मधुर रस भी कटु लगता है, उसी प्रकार मिथ्यादृष्टि को धर्म नहीं रुचता है। 2.सासादन गुणस्थान- पर्वत के शिखर से गिरना भूमि के सम्मुख होना। 3.मिश्र गुणस्थान- दही-गुड़ के समान मिश्रित स्वभाव होना। 4.सम्यक्त्व गुणस्थान- फिटकरी युक्त स्वच्छ जल उपशम, पूर्ण स्वच्छजल क्षायिक, कुछ मलिन जल क्षयोपशम। 5.देशविरत गुणस्थान- सङ्कल्पी त्रसहिंसा से विरत तथा आरम्भी-उद्योगी-विरोधी एवं स्थावर की हिंसा से अविरत। 6.प्रमत्तविरत गुणस्थान- व्यक्ताव्यक्त प्रमाद, चितकबरे मृगवत्। 7.अप्रमत्तविरत गुणस्थान- अधःकरण, मोटी धार वाला आरा, यहाँ स्थिति बन्धापसरण (पाप प्रकृतियों की स्थिति का घटना) होता है। 8.अपूर्वकरण गुणस्थान- अपूर्वकरण परिणाम, पैनी धार वाला आरा, स्थिति काण्डक घात (पाप प्रकृतियों की स्थिति का तेजी से घटना) होता है। 9.अनिवृत्तिकरण गुणस्थान- तेज धार वाला छोटा आरा, कम समय में अधिक कार्य होता है। 10.सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थान- हल्दी से रङ्गे हल्के रङ्गीन वस्त्र के समान सूक्ष्म कषाय होती है। 11.उपशान्तमोह गुणस्थान- फिटकरी युक्त जल या शरदऋतु के निर्मल जल के समान परिणाम होते हैं। 12.क्षीणमोह गुणस्थान- स्फटिक के पात्र में रखे निर्मल जल के समान वीतराग भाव होता है। 13.सयोगकेवली गुणस्थान-केवलज्ञान अन्धकार नाशक सूर्य के समान होता है। 14.अयोग केवली गुणस्थान-शरद ऋतु की पूर्णमासी के चन्द्रमा की कलाओं के समान, शील के अठारह हजार भेदों का स्वामी एवं शुद्ध स्वर्ण के समान होता है।
कर्म