Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भक्ति

मध्यलोक के चार सौ अठ्ठावन अकृत्रिम जिनालय- ढाईद्वीप में पञ्चमेरु के अस्सी,

The four hundred and fifty-eight natural Jinalayas of the middle world: in the two-and-a-half islands, eighty of the five Merus...

— आराध्य सूत्र · #58

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हे जिनेन्द्र भगवान्! हे देवों के देव! बाल्यावस्था से आज तक आपके श्रीचरणों की सेवा में आसक्त शिष्यों को कल्पलता सम सेवा से जो काल व्यतीत हुआ है, आज उस सेवा का वह फल आपसे चाहता हूँ कि प्राणों के निकलते समय आपके नाम से सहित अक्षरों के पढ़ने में मेरा गला कुण्ठित न हो।
भक्ति