Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
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परिवार

320 सूत्र · पृष्ठ 1 / 5

गृहस्थी में अगर सबका यह भाव रहे कि मेरे को सुख कैसे मिले तो सब दुःखी हो जायेंगे और यह भाव रहे कि दूसरे को सुख कैसे मिले तो सब सुखी हो जायेंगे।
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महिलाएँ पारिवारिक जीवन बखूबी निभा सकती हैं, शर्त यह है कि परिवार में उनकी तारीफ होती रहे।
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''परिवार रूपी बगीचे के माली बने मालिक नहीं।''
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बच्चे माता-पिता के प्यार से वंचित हो रहे हैं, तभी वे दूसरे के प्यार के चक्कर में जिन्दगी बर्बाद कर रहे हैं।
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स्त्री पुरुष से पूजा नहीं चाहती किन्तु सुख-दुःख में सहयोग चाहती है।
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बच्चों को खेलने का अवसर दीजिए, जो खतरों से नहीं खेलेंगे वे जीवन में आगे कैसे बढ़ेंगे? किसी बच्चे को वह पुस्तक मत दीजिए जो आप खुद नहीं पढ़ेंगे।
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उम्र के बड़े हो गये तो अब भावनाओं के भी बड़े होना चाहिए, लड़के वालों से लड़की ने कहा, ''रामायण तो आप अभी सुन लीजिए, महाभारत घर आकर सुनाऊँगी।''
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याद रखना जिस दिन आपके कारण माँ-बाप की आँखों में आँसू आते हैं, उस दिन आपका किया हुआ सारा धर्म माँ-बाप के आँसू में बह जाता है।
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जो रखती है मायके का मान, ससुराल का सम्मान, पति का अरमान, बच्चों का ध्यान रहती है खुद से अनजान वह है स्त्री की पहचान।
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एक बुद्धिहीन महिला अपने पति को अपना गुलाम बनाती है और खुद गुलाम की पत्नि बन जाती है, जबकि एक बुद्धिमती महिला अपने पति को राजा जैसा बनाकर खुद रानी बन जाती है।
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लड़कियाँ फैशन में, लड़के व्यसन में रहने से परिवार टेंशन में रहता है। सादा और पौष्टिक आहार लेवें, छोटी-छोटी बचत नियमित करते रहें क्योंकि खराब समय जीवन में कभी आने की सूचना नहीं देता है।
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यदि उदासी का कारण हटा दिया जाये तो सम्बन्धी का मन मुटाव दूर हो जाता है एवं वह पास में आ जाता है।
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हमारी आदत के कारण हम स्वयं से ज्यादा अपने निकट के लोगों को परेशान करते हैं।
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आप कैसे कृतघ्न बेटे हो जिस माँ ने दूध पिलाया उसे आप पानी भी नहीं पिलाना चाहते हो।
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वृद्धाश्रम में माँ बाप की दुर्दशा को देखकर सब बेटों को कोसते हैं परन्तु सब भूल जाते हैं कि दुर्दशा करने में किसी की ‘बेटी’ का अहम् रोल होता है।
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क्या बताऊँ बहन जब बहू थी, तो अच्छी सास नहीं मिली और अब सास बनी तो अच्छी बहू नहीं मिली अर्थात् महिलाएँ प्रायः अपनी गलती न स्वीकार करना चाहती हैं और न सुधरना चाहती हैं।
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आप कैसे कृतघ्न बेटे हो जिस माँ ने दूध पिलाया उसे आप पानी भी नहीं पिलाना चाहते हो।
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वृद्धाश्रम में माँ बाप की दुर्दशा को देखकर सब बेटों को कोसते हैं परन्तु सब भूल जाते हैं कि दुर्दशा करने में किसी की 'बेटी' का अहम् रोल होता है।
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क्या बताऊँ बहन जब बहू थी, तो अच्छी सास नहीं मिली और अब सास बनी तो अच्छी बहू नहीं मिली अर्थात् महिलाएँ प्रायः अपनी गलती न स्वीकार करना चाहती हैं और न सुधरना चाहती हैं।
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बचपन की यादों को अगर ठीक से सँजोकर रखा जाये तो वे बुढ़ापे का अच्छा सहारा बन सकती हैं।
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सन्तान के लिए तो माता-पिता ही प्रथम गुरु और सर्वथा पूज्य हैं।
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पशुओं के लिए माता दुग्धपान तक ही माता रहती है, अधम व्यक्तियों के लिए विवाह पर्यन्त तथा मध्यम व्यक्तियों को गृह कार्य देखभाल करने तक माता रहती है, उत्तम व्यक्तियों को तो माता जीवनपर्यन्त तीर्थ के समान रहती है।
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पुत्र पिता के सामने भूमि पर बैठा हुआ जैसा अच्छा लगता है वैसा सिंहासन पर नहीं। पुत्र को पिता के चरण दबाने में जो सुख मिलता है, वह राज्य पर शासन करने में नहीं। उसे पिता की जूठन खाने में जो सुख मिलता है, वह तीनों लोकों को भोगने में नहीं।
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माँ का कर्ज आदमी सात जन्मों तक नहीं उतार सकता है और गुरु का कर्ज अनेक जन्मों तक नहीं उतारा जा सकता है।
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माता-पिता का ऋण सन्तान जीवन भर नहीं चुका सकती है।
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माँ-बाप को वृद्धाश्रम में छोड़कर आप अपने घर से भगवान् को निकाल देते हैं।
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माता का गौरव पृथ्वी से भी अधिक है और पिता का गौरव आकाश से भी ऊँचा है।
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जिस घर में बड़े-छोटे की मर्यादा है वह घर स्वर्ग है।
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घर वह है जहाँ माँ है। आगन्तुक का मुस्कुराकर स्वागत करें।
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जन्मदाता, दीक्षादाता, विद्यादाता, अन्नदाता और भयत्राता ये पाँच पिता माने गये हैं।
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राजपत्नी, गुरु पत्नी, मित्र पत्नी, पत्नी की माता और अपनी माता ये पाँच माताएँ मानी गई हैं।
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बच्चों को पढ़ा-लिखा कर इतने लायक भी मत बना देना कि कल वह आपको ही नालायक समझने लगे।
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व्यक्ति को अपने घर की दुरावस्था आगन्तुकों के समक्ष प्रकट नहीं करना चाहिए।
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बड़ों के कहने का नहीं, व्यवहार का असर पड़ता है। माँ की शिक्षाओं का नहीं, दुलार का असर पड़ता है ॥ तुमने तो चाबी उल्टी पकड़ ली है, ताला कैसे खुले। आदमी पर फटकार का नहीं, प्यार का असर पड़ता है ॥
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आपका घर उतना ही बड़ा होना चाहिए जिसकी आप स्वयं देखभाल कर सकें, स्वच्छ साफ-सुथरा रख सकें।
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अगर किसी देश को भ्रष्टाचार मुक्त और सुंदर मन वाले लोगों का देश बनाना है तो, समाज के तीन सदस्य सक्षम हैं–माता-पिता और गुरु।
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शीशा पत्थर साथ रहें तो बात नहीं घबराने की। बस इतना सा ध्यान रहें कि जिद न हो टकराने की ॥
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अच्छी लोकेशन में घर होने से बच्चों को संस्कार भी अच्छे मिलेंगे क्योंकि बच्चे काफी वक्त घर के बाहर कालोनी में बिताते हैं।
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आप बच्चों को २० साल तक संस्कार दीजिए, वो आपको ८० साल तक सुख देंगे।
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आज के बच्चे सिखाने से नहीं करके दिखाने से सीखते हैं।
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सर्वप्रथम माँ ही पूर्ण गुरु हैं, तत्पश्चात् गुरु ही पूर्ण माँ होते हैं।
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जिस घर में कार्य करने के पहले बड़ों से सलाह नहीं ली जाती उन्हें बाद में वकीलों से सलाह लेना पड़ती है।
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स्त्री का चाम नहीं काम प्यारा होता है, इसलिए स्त्री परिवार में सेवा करके घर को स्वर्ग बना देती है।
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स्वर्ग-नरक स्वयं के भीतर है जैसा सोचोगे वैसा पाओगे। जिस घर में बड़े-छोटे की मर्यादा है, वह घर स्वर्ग है।
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शास्त्र को जानने वाला भी जो पुरुष लोक व्यवहार में पटु नहीं होता वह मूर्ख के समान है। जिस घर में मूर्खों की पूजा नहीं होती, जहाँ अन्न का संचित भंडार है तथा जिस घर में स्त्री पुरुष में कलह नहीं होता, उस घर में लक्ष्मी अपने आप सर्वदा विद्यमान रहती है।
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उस पुत्र को धिक्कार है, जो समर्थ होते हुए भी पिता के मनोरथ को पूर्ण नहीं करता जो पिता की चिन्ता को दूर नहीं कर सकता उस पुत्र के जन्म लेने से क्या प्रयोजन है?
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बंधु के अपरिचित होने पर भी उसके मिलने पर चित्त प्रसन्न होता है।
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बन्धुओं के गुण और दोष में गुणों पर दृष्टि डालनी चाहिए, दोषों पर नहीं।
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बालक का भाग्य सदैव उसकी माँ के द्वारा निर्मित होता है।
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माँ को सबसे ज्यादा दुःख तब होता है जब बेटा पत्नि के सामने माँ को डाँटता है।
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जिसने ९ माह पेट में रखा, दूध पिलाया, बड़ा किया उसी माँ के आँसू बहाये तब दूसरे के साथ क्या करोगे?
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नौकर की जरूरत पड़ती है तब बाप की याद आती है दरअसल बाप से ज्यादा भरोसेमंद नौकर कहाँ मिलेगा?
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एक माँ बेटे को जन्म देने के लिए सुन्दरता को त्याग देती है और वही बेटा एक सुन्दर पत्नि को पाने के लिए माँ को त्याग देता है।
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जिन्दगी में दो लोगों का ख्याल रखना बहुत जरूरी है एक पिता जिसने आपकी जीत के लिए सब कुछ हारा है और दूसरी 'माँ' जिसको तुमने हर दुःख में पुकारा है।
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माता-पिता और शिक्षकों को चाहिए कि वे बच्चों को घर से ही नियमितता का पाठ पढ़ायें।
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वर्तमान समय में घरों में और समाज में जो अशान्ति, कलह, संघर्ष, देखने में आ रहा है, उसमें मूल कारण यही है कि लोग अपने अधिकार की माँग तो करते हैं, पर अपने कर्तव्य का पालन नहीं करते हैं।
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पुत्र के प्रति पिता का कर्त्तव्य यही है कि उसे सभा में प्रथम पंक्ति में बैठने योग्य बना दें।
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बालकों की कर्त्तव्यशीलता ही सब गुणों की नींव है।
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श्रम से भरा हुआ पुरुषार्थ और कार्य कुशल सद्बुद्धि, इन दोनों की परिपक्वता ही परिवार को ऊँचा उठाती है।
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अमीर वह नहीं जिसके पास विपुल सम्पत्ति है, बल्कि अमीर वह है जिसके पास बूढ़े माँ बाप के लिए समय है।
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अपने कुटुम्ब के लोग गुण हीन हों तो भी उनकी रक्षा करनी चाहिए फिर जो आपके कृपाभिलाषी एवं गुणवान हैं उनकी तो बात ही क्या है?
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जो अपने घर को ही आदर्श न बना सका वह समाज, देश, राष्ट्र को क्या आदर्श बना सकेगा?
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पुत्र को सभा में अग्रिम स्थान में बैठने योग्य बनाना पिता का सबसे बड़ा उपकार होगा।
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जिस परिवार में तीन पीढ़ियाँ एक साथ मिलकर भोजन और भजन करते हैं वह घर धरती पर साक्षात् स्वर्ग है।
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जब घर में अतिथि हो तब चाहे अमृत ही क्यों न हो, अकेले नहीं पीना चाहिए।
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यदि माँ–बाप बच्चे का बचपन सम्हाल देते हैं तो बालक माँ–बाप का बुढ़ापा सम्भाल देता है।
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जो सन्तों की नहीं मानते हैं, सन्तान उनकी भी नहीं मानती हैं।
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सिंहनी एक ही सुपुत्र से निर्भय होकर सोती है, गधी दसों पुत्रों के साथ भार ढोती है।
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पुत्र बड़ा स्वार्थी होता है, जब सेवा करवाता है तो पिता के साथ रहता है और जब सेवा करने का समय आता है तो पिता को छोड़ पत्नि के साथ हो जाता है।
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प्रात: काल माता–पिता को प्रणाम करने से दीर्घायु, काम करने से पहले प्रणाम करने से सफलता अवश्य मिलती है, माता–पिता का आशीष सबसे बड़ा होता है।
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माँ–बाप को बेइज्जत करने वाला बेटा अपने भाग्य का दीपक स्वयं बुझाता है।
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अपने बच्चों को सुसंस्कार न देने वाले माता–पिता, उनके हितैषी नहीं अपितु शत्रु हैं।
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महानता सन्तान को जन्म देने में नहीं, अपितु उसे सुसंस्कारवान बनाने में है।
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जो बच्चों को सिखाते हैं, उसका पालन स्वयं बड़े करने लगे तो धरती स्वर्ग बन जाये।
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संस्कारित माँ ही संस्कार दे सकती है।
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