Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Nature

प्रकृति

16 सूत्र

गाय घास खाकर दूध देती है, साँप दूध पीकर भी जहर उगलता है, अतः प्रकृति को बदलने की कोशिश मत करो, ''वस्तु स्वरूप विचार खुशी से, सब दुःख संकट सहा करे''।
प्रकृति
जल संरक्षण—पानी की कितनी कमी है और इसका महत्त्व पानी को कम से कम उपयोग करना। किस तरह पानी बचाना, एक ही पानी को दो-तीन बार कैसे उपयोग किया जाए और भविष्य के लिए पानी कैसे बचाया जाय इसकी शिक्षा अत्यन्त आवश्यक है।
प्रकृति
प्रकृति का साथ स्वच्छ और सुरुचि पूर्ण वातावरण- स्वच्छता के बाद ही आप ईश्वर को पा सकते हैं, वातावरण का मन पर बहुत प्रभाव पड़ता है।
प्रकृति
कुटिलता का स्वभाव- एक किसान ने खेत की मेड़ पर आम, नीबू, नीम के तीन वृक्ष लगाये धूप, पानी, खाद सबको एक जैसा मिला फिर भी वह खट्टा, मीठा, कड़वा बना, किसी ने भी अपना स्वभाव नहीं छोड़ा।
प्रकृति
अर्जन और विसर्जन, ग्रहण और त्याग, प्रकृति का शाश्वत नियम है।
प्रकृति
मनुष्यों का जीवन असंयमित होने के कारण प्रकृति विरूद्ध हो गयी है, जैसे अतिवृष्टि-अनावृष्टि, अकाल, भूकम्प आदि।
प्रकृति
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, केवली, आहारकशरीर, देव और नारकियों के शरीर में निगोदिया जीव नहीं होते हैं, शेष सभी जीवों के शरीर में निगोदिया जीव होते हैं।
प्रकृति
पृथ्वी जलादि को कायिक कहते है निगोद को कायिक नहीं जीव कहते हैं।
प्रकृति
अग्निकाय, वायुकाय के चार शरीर राजवार्तिकार मानते हैं- औदारिक, तैजस, कार्मण और वैक्रियक।
प्रकृति
जैसे मिट्टी में अनाज का दाना हो तो अङ्कुर उत्पन्न होता है, उसी प्रकार विकलत्रय की संवृत योनी जानना चाहिए, कुछ अनाज जो ठण्ड में होते हैं उनकी शीत योनी होती है और जो गर्मी में होते हैं उनकी ऊष्ण योनी होती है, मनुष्य मिश्र योनिवाले होते हैं, इस प्रकार योनियों के चौरासी लाख भेद होते हैं।
प्रकृति
शरीर उत्पत्ति का क्रम- माता के उदर में वीर्य प्रवेश के बाद रज-वीर्य के संयोग रूप दस दिन तक कलल दशा में, फिर दस दिन कालिमा दशा में, दस दिन स्थिर होता है, तांबा और चाँदी का रस मिलने पर जो दशा होती है, वही रज और वीर्य के संयोग से होती है, एक माह तक स्थिर अवस्था होती है, दो माह में बुलबुले जैसा होता है, तीसरे माह में घट के आकार होता है, चार माह में मांस के पिण्ड रूप होता है, पाँच माह में उस आकार में पाँच अङ्कुर होते हैं, जिनसे दो हाथ, दो पैर और सिर बनता है, छ: माह में आँख, कान, नाक आदि उपाङ्गों की रचना होती है, सातवें माह में चर्म-रोम, हाथ-पैर के नख उत्पन्न होते हैं, आठवें माह में हलन-चलन होता है, नौ या दस माह में गर्भ से बाहर आता है।
प्रकृति
शरीर में तेज, तापमान और भोजन पचाना तैजस शरीर के ये तीन कार्य होते हैं।
प्रकृति
तीन वात वलय- जैसे साईकिल में तीन वलय होते हैं ट्यूब, टायर, रिङ्ग इन तीनों का समान अनुपात होता है, तो साईकिल वजन खींच ले जाती है, उसी प्रकार इन तीन वातवलयों के ऊपर ही तीन लोक का भार है, इस प्रकार मनुष्य, के शरीर में भी तीन वात वलय हैं, वात, पित्त, कफ इन तीनों के आधार से शरीर चलता है।
प्रकृति
एकेन्द्रिय जीव के सूक्ष्म बादर ये दो भेद होते हैं, सूक्ष्म का अर्थ साधारण नहीं है, पृथ्वीकायिक से वायु कायिक तक प्रत्येक ही होते हैं।
प्रकृति
गाय एक वर्ष में तीन हजार रुपए का घास खाती है, बीस हजार रुपए का सिर्फ गोबर देती है।
प्रकृति
माँ के दो स्तन होते हैं गाय के चार, दो बछड़े के लिए और दो पालक के लिए होते हैं।
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