Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 35 / 41

तिलोयपण्णत्ति- सौधर्मेन्द्र विक्रिया से इक्यावन करोड़, बाईस लाख, अठ्ठासी हजार, तेरह देवाङ्गनाओं के साथ क्रीड़ा करता है, लोकपाल साढ़े तीन करोड़, प्रतीन्द्र, सामानिक, तथा त्रायस्त्रिंश, देव भी इन्हीं के समान देवाङ्गनाओं के साथ क्रीड़ा करते हैं, ये सभी देव देवाङ्गनाओं के साथ मनुष्यों के समान प्रवीचार करते हैं, फिर भी वासना शान्त नहीं होती है।
ब्रह्मचर्य
काजल की कोठरी में कैसो हु सयानो जाय- उन जम्बूस्वामी का ध्यान करना चाहिये, जिनने माँ के आदेश से शादी की लेकिन सुहागरात की बात थी, तो एक तरफ से राग का जाल डाला जा रहा था, दूसरी तरफ से विराग की छुरी उस जाल को छेदती जा रही थी, विद्युच्चर चोर चोरी करने आया था, वह सङ्गोष्ठी सुनता रहा, सुबह जम्बूस्वामी के साथ दीक्षित हो गया, इसी तरह गजकुमार का भी विचार करना चाहिए।
ब्रह्मचर्य
एक पत्नि व्रत का पालन करने वाले सेठ सुदर्शन ने अपने मन को अडिग रखा, रानी सारी रात विषयों की मारी तड़पती रही, पुरोहिता, वेश्या आदि के अनेक उपसर्ग सहे, ब्रह्मचर्य का पालन किया और मुनि बनकर पटना गुलजार बाग से मोक्ष गये।
ब्रह्मचर्य
देशभूषण कुलभूषण- उस समय बच्चों की शिक्षा गुरुकुल में हुआ करती थी, पाँच वर्ष की उम्र में कुलभूषण देशभूषण राजपुत्रों के माता-पिता ने पुत्रों को गुरू के पास भेज दिया, विद्याध्ययन करके वापस आये, नगर प्रवेश के समय स्वागत हुआ, झरोखे में बैठी सुन्दर कन्या को देख कर शादी का भाव हुआ, एक दूसरे में द्वन्द हो गया, अन्त में मालूम हुआ ये उनकी ही बहिन है, घर में प्रवेश किये विना दीक्षा ग्रहण कर ली, रामचन्द्र जी ने उपसर्ग निवारण किया, केवली हुये, दिव्यध्वनि खिरी, कुन्थलगिरी से मोक्ष को प्राप्त हुए थे।
ब्रह्मचर्य
बुढ़िया को तो हमने वहीं छोड़ दिया- एक बार ब्रह्मचारीजी यात्रा कर रहे थे, रास्ते में नदी पार करने लगे, तभी ब्रह्मचारीजी की दृष्टि एक बुढ़िया पर गयी जो असहाय थी, उसने कहा ! महात्माजी अपने साथ हमें भी नदी पार करा दो, नहीं तो रात भर यहीं रहना पड़ेगा, ब्रह्मचारीजी को दया आगयी, अपने कन्धे पर उसे बैठाकर नदी पार करा दिया, कुछ लोगों ने उनके गुरु से कहा, कि इन्होने स्त्री को छुआ है, ब्रह्मचारीजी ने कहा ! हम तो स्त्री को वहीं छोड़ आये, आप लोग तो यहाँ तक ले आये हैं।
ब्रह्मचर्य
वेष भूषा- इंस्पेक्टर की लड़की भड़कीले वस्त्रादि पहनकर निकल रही थी, एक लड़के ने छेड़ दिया, उसने अपने पिताजी को घटना की जानकारी दी, रिपोर्ट की गई। उस बच्चे को बन्दी बना लिया, केस चला, जज ने लड़के से पूँछा इसके साथ छेड़खानी की है? उसने कहा नहीं, यदि ये उसी वेषभूषा में आये तो मैं पहचान सकता हूँ, जज ने लड़की को उस दिन के वेष में बुलाया, लड़के ने कहा मैंने इसको वेश्या समझा था, इंस्पेक्टर शर्म से नतमस्तक हो गया, अतः हमारी वेषभूषा साधारण होना चाहिए।
ब्रह्मचर्य
बनारसी साड़ी- गणेश प्रसाद वर्णी जी के विद्यागुरू पण्डित ठाकुरदासजी की सर्विस बनारस में लग गयी थी, वे छः माह बाद जब घर आये, तो पत्नि के लिए पाँच रुपये की बनारसी साड़ी लेकर आये, जब पत्नि को दिखाई तो पण्डित जी ने सोचा कि पत्नि प्रसन्न होगी, लेकिन पत्नि उदासीन होकर कहती है कि जब मैं ये साधारण साड़ियाँ पहनती हूँ तब भी आप बनारस से यहाँ दौड़े आये, अब इस बनारसी साड़ी को पहनकर मैं किसको रिझाऊँ ? पण्डित जी चुप हो गये, उनकी पत्नी ने पाँच रुपये की साड़ी साढ़े चार रुपये में पड़ोसी को बेच दी, लेकिन उन्होंने वह भड़कीली साड़ी नहीं पहनी।
ब्रह्मचर्य
पत्नि ने पति को पिताजी कहा- पण्डित ठाकुरदास जी की पत्नि भोगों से उदासीन हो गयी, बार-बार कहती थी, कि अब ब्रह्मचर्य व्रत ले लेवें, लेकिन पण्डित जी टाल देते थे, एक दिन पण्डित जी की गोद में बैठकर बोलीं 'पिताजी अब मुझे क्षमा कर दो, मैं व्रत पालना चाहती हूँ', पण्डित जी ने आँखों में आँसु भरकर कहा बेटी आज से अपन अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करेंगे, तुमने मुझे वह शिक्षा दे दी जो अनेक शास्त्र भी नहीं दे सके।
ब्रह्मचर्य
जब राम बनता हूँ- रावण और मन्दोदरी सीता को रिझाने में असफल रहे तो मन्दोदरी ने कहा तुम राम का रूप क्यों नहीं बना लेते, तब रावण ने कहा जब मैं राम का रूप बनाता हूँ तो सीता के साथ भोग भोगने का भाव समाप्त हो जाता है, वेश मात्र से भाव परिवर्तित हो जाते हैं।
ब्रह्मचर्य
मैं आपका पुत्र हूँ- पन्ना नरेश राजा छत्रसाल से एकयुवती प्रभावित होकर बोली महाराज आप दुखियों के दुःख दूर करते हैं, मेरे कोई सन्तान नहीं है, आप जैसा पुत्र चाहिए, राजा ने कहा इसके लिए पाप करने की क्या जरूरत है ? मैं ही आपका पुत्र बन जाता हूँ चरणों में बैठ कर कहते हैं माँ आपका पुत्र आपकी जीवन भर सेवा करेगा, बोलिए क्या आज्ञा है ? नारी अवाक् रह गयी।
ब्रह्मचर्य
सात दिन का जीवन- राजा ने साधु से पूँछा कि आप स्त्रियों के बीच में रहते हो, मालपुआ खाते हो, इससे तुम्हारा मन चञ्चल नहीं होता है ? मुनि ने कहा इसका जबाव बाद में देंगे, कुछ समय बाद राजा को बुलाया, कहा आपका जीवन सात दिन का है, इन दिनों में खूब भोग भोग लो अन्यथा भोग कहाँ मिलेंगे, राजा घर गया चिन्ता में भोजन भी भूल गया, सात वे दिन सब लोग रोने लगे, लोगों का तांता लग गया, राजा मरा नहीं, आठवे दिन मुनि के पास गया, साधु ने कहा कि इन दिनों खूब भोग भोगे होंगे ?राजा ने कहा भोग नहीं भोगे रोते रहे, साधू ने कहा इसी प्रकार मृत्यु पर दृष्टि होने पर भोग रुचते नहीं हैं।
समाधि
अन्धे के हाथ में लेम्प- किसी ने अन्धे को धक्का मार दिया, उसका घड़ा फूट गया, फिर भी उसी को डाँटते हैं, क्यों अन्धे हो दिखता नहीं ? अन्धे ने जबाब दिया जी नहीं दिखता, दूसरे दिन अन्धा हाथ में लेम्प लेकर पानी भरने जा रहा था, वही व्यक्ति उसको फिर मिला, पूछा ! आप कल कह रहे थे, हम अन्धे हैं फिर आपने लेम्प क्यों ले रखा है ? उसने जबाब दिया आप जैसे आँखों वालों को राह दिखाने के लिये, सज्जन पुरूषों का कितना भी नुकसान हो जाये वे क्रोधित नहीं होते हैं।
क्षमा
बेटे ने पिता जी से पूँछा, आज क्या है? पिताजी बोले क्षमावाणी है, पिता जी यह क्या होता है ? बेटा ! जो क्रोध करता है, वह नरक जाता है। बेटे ने पापा की जेब से चुपके से पाँच रूपये निकाल लिये। पिता क्रोधित होकर पूँछने लगे, किसने निकाले ? बेटा ने कहा पापा आपकी क्षमावाणी बड़ी सस्ती है, पाँच रुपये में बिक गयी। ''हम को सीख लेना चाहिए कि पैसों की नहीं धर्म की कीमत है।''
क्षमा
राजा मधु की क्षमा- शत्रुघ्न को मथुरा का राज लेने के लिये राजामधु से घमासान युद्ध करना पड़ा, जब मधु का शरीर वाणों से जर-जर हो गया, तो हाथी पर बैठे-बैठे सब परिग्रह का त्याग कर मुनि बन गए, शत्रुघ्न को मालूम हुआ तो क्षमा माँगी, नमस्कार किया, राजा ने कृतज्ञता ज्ञापित की कि आपने बहुत उपकार किया कल्याण का अवसर दिया।
क्षमा
नाम अशान्ति सागर- एक व्यक्ति अपनी स्त्री से बार-बार कहता है मैं दीक्षा ले लूँगा, लेकिन लोग उसे लौटा लाते, इस बार किसी ने नहीं रोका, दीक्षा ले ली, नाम शान्तिसागर हो गया, किसी लड़के ने नाम पूँछा, बता दिया, दो-तीन बार पूँछने आया तो गुस्से में बोले अब नहीं आना, नहीं तो पीटूँगा, उसने नाम बदल दिया शान्ति नहीं अशान्ति सागर हैं आप।
क्षमा
एक सज्जन ने स्वाध्याय का नियम ले लिया, दीवाली की सफाई में चौका, लेम्प, शास्त्र कहीं रख कर भूल गया, नहीं मिलने पर, डण्डा उठाकर सबको पीटना शुरू कर दिया, अतः स्वाध्याय ऐसा करें कि शास्त्र कहीं शस्त्र न बनें।
क्षमा
वज्रकर्ण का नियम- एक बार वज्रकर्ण ने मुनि महाराज से नियम लिया कि मैं देव-शास्त्र-गुरु के अलावा किसी को नमस्कार नहीं करूँगा, जब वह अपने स्वामी सिंहोदर के सामने जाता था तो अपनी अङ्गूठी में मुनिसुव्रतनाथ भगवान् के चित्र को नमस्कार करता था, एक बार किसी ने सिंहोदर राजा से शिकायत कर दी, कि वज्रकर्ण आपको नमस्कार नहीं करता है, तो सिंहोदर ने आदेश दे दिया कि ! वज्रकर्ण का सर्वस्व हरण करके बन्दी बना लो, इसी समय राम-लक्ष्मण-सीता वहाँ पहुँचते हैं, लक्ष्मण को भोजन के लिए आया जानकर वज्रकर्ण ने तीनों को स्वादिष्ट भोजन कराया, रामचन्द्रजी लक्ष्मण से कहते हैं ! 'ऐसा भोजन तो कोई अपने जमाई को भी नहीं करायेगा', अतः इस धर्मात्मा की विपत्ति दूर करना चाहिए, लक्ष्मण जाकर सिंहोदर को बन्दी बना लाते हैं, वज्रकर्ण से पूँछते हैं कि इसको क्या सजा दी जाय ? तब वज्रकर्ण कहता है की ये हमारे स्वामी हैं, इनको क्षमा कर दीजिये, सिंहोदर ने क्षमा से प्रभावित होकर आधा राज्य वज्रकर्ण को दे दिया।
क्षमा
धवल सेठ ने श्रीपाल जी को समुद्र में गिरा दिया, उनकी पत्नी रयणमञ्जूषा से बलात्कार करना चाहा, श्रीपाल जी को भाण्ड सिद्ध करने की भी कोशिश की, फाँसी लगने की नौवत आ गयी, इसके बाद भी राजा से कहा कि ये हमारे धर्म पिता हैं, इन्हें फाँसी पर न चढ़ाया जाये और धर्मात्मा श्रीपाल जी ने पाँच सौ लोगों के साथ धवलसेठ का निमन्त्रण किया, अपने हाथ से पड्डा झुलाते हुए खीर-पुड़ी का भोजन कराने लगे, सेठ को अत्यधिक पश्चात्ताप व आत्मग्लानी हुयी और हृदयाघात से मरण को प्राप्त हो गया था।
क्षमा
दस लक्षण पर्व के तत्काल बाद मनाया जाने वाला क्षमावाणी पर्व एक ऐसा महापर्व है जिसमें हम बैरभाव को छोड़कर एक दूसरे से क्षमा याचना करते हैं, इसे क्षमापना भी कहते हैं, मन के मैल को धो डालने वाला यह पर्व आज मात्र शिष्टाचार बन कर रह गया है, यह बात नहीं कि इसे हम बड़े उत्साह से न मनाते हों, आज न हम इससे उदास हुये हैं तथा मात्र उत्साह से ही नही, अति उत्साह से मनाते हैं, इस अवसर पर सारे भारत वर्ष में लाखों रूपयों के कार्ड छपाये जाते हैं, उन्हें चित्रित सुन्दर लिफाफों में रखकर हम इष्ट मित्रों को भेजते हैं, लोगों से गले लगकर मिलते हैं, क्षमा याचना भी करते हैं, पर यह सब यन्त्रवत् चलता है, हमारे चेहरे पर मुस्कान भी होती है पर बनावटी, हमारी असलियत न मालूम कहाँ खो गयी है? क्षमा याचना जो कि बिल्कुल व्यक्तिगत चीज थी, वह आज बजारू बन गयी है, वास्तविक क्षमावाणी तो यह होना चाहिए कि अपनी गलतियों का उल्लेख करते हुए विनय पूर्वक आमने-सामने या पत्र द्वारा शुद्ध हृदय से क्षमा याचना करें एवं पवित्र भाव से दूसरों को क्षमा करें अर्थात् क्षमा भाव धारण करें, इस प्रकार जब हमारा हृदय दश धर्मों की आराधना से क्षमा भाव से आकण्ठ आपूरित हो उठे और वाणी में भी छलकने लगे, तब वस्तुतः क्षमावाणी होती है।
क्षमा
फूल लाल या सफेद- हनुमान जी ने रामचन्द्र जी से कहा ! अशोक वाटिका मुझे सबसे अच्छी लगी उसमें लाल फूल खिले थे, तभी बीच में सीता बोल पड़ी मैं उसमें बहुत दिन रही हूँ उसमें सफेद फूल खिले थे, हनुमान जी और सीताजी में लाल-सफेद रञ्ज पर बहस छिड़ी थी, तभी रामचन्द्रजी ने कहा आप दोनों सत्य बोल रहे हैं, तब हनुमानजी ने कहा सत्य तो एक ही होगा, रामचन्द्रजी ने कहा हनुमानजी जब आप अशोक वाटिका में थे तब क्रोध में थे, इसलिए लाल फूल दिखे, सीताजी उस समय आँसुओं से युक्त थी, इसलिए उसे सफेद फूल दिखे, अतः अपेक्षा से दोनों कथन सही हैं इसी प्रकार प्रत्येक विषय में समझना चाहिए।
विवेक
व्यवहार- कृष्ण जी शान्तिदूत बनकर दुर्योधन के पास गये, कहा पाण्डव पाँच गाँव में सन्तुष्ट हैं, युद्ध न करो, दुर्योधन ने कृष्णजी को फटकारते हुये बन्दी बनाने का आदेश दिया, तब कृष्णजी ने विराट रूप बनाकर दुर्योधन से कहा तू कौन सी मूली की जड़ है ? देखते-देखते उखाड़ कर फेक दूँगा, इस प्रकार व्यवहार नय से समझाया था।
विवेक
निश्चय- अर्जुन ने युद्ध क्षेत्र में कृष्णजी से पूँछा, किस-किस के साथ युद्ध करना है ? कृष्णजी ने बताया भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, दुर्योधन आदि के साथ, अर्जुन ने कहा रथ वापस ले चलो, जिनकी गोद में खेले, उनसे युद्ध कैसे करेंगे ? तब कृष्ण जी ने निश्चय का सहारा लेकर समझाया था- अर्थात्- आत्मा शस्त्र से छिदती नहीं है, आग से जलती नहीं है, पानी से भीगती नहीं है और वायु से सूखती नहीं है, इसलिए हे अर्जुन ! युद्ध करो।
विवेक
क्षेत्र- आज का बच्चा कहता है मन्दिर क्यों जाऊँ ? आत्मा या भगवान् का ध्यान घर में बैठकर भी कर सकते हैं, इसका उत्तर हमें उसी की भाषा में देना होगा कि जिस प्रकार एक घर में रसोई अलग, स्नानघर अलग, पखाना अलग, शयन कक्ष अलग-अलग होते हैं, उसी प्रकार परमात्मा का ध्यान करने के लिये मन्दिर हैं, यदि पखाना खाने के स्थान पर और खाना पखाने के स्थान पर हो तो आपको कोई आपत्ति तो नहीं ? यदि यह अयोग्य है, तो मन्दिर का कार्य मन्दिर मे होना चाहिये, घर का कार्य घर में होना चाहिये, मन्दिर की वेदी पर कोई भोजन की थाली रखकर नहीं खाता तथा आपरेशन थियेटर पर ही आपरेशन होता है रसोईघर या दुकान पर नहीं उत्तर सुनते ही बच्चे को समझ में आ जायेगा।
भक्ति
निमित्त और उपादान-राधा ने कृष्ण जी से कहा मुझे बाँसुरी सुनाओ, सुनने की तीव्र इच्छा थी, दुनिया का ये स्वभाव है कि जिसको जो कला आती है, उसे करने को कहो तो वह पहले फूलता है, कृष्णजी ने कहा आज हमारा सुनाने का मन नहीं है, किसी को अपने पक्ष में करना है तो उसकी प्रशंसा कर दो, तब राधा ने कहा, 'अर्थ तो है तुम्हारी श्वाँस का, वरना ये टुकड़ा है बाँस का' असंख्यात जीव भगवान् के चरणों में बैठते हैं, तो भी क्षायिक सम्यक्त्व सबको नहीं होता, निमित्त तो सबके लिए बराबर है पर उपादान नहीं है, इसलिए जरूरी नहीं कि निमित्त है तो उपादान जाग ही जाए, कृष्णजी प्रशंसा सुनकर बजाने बैठ गए, घण्टों निकल गये, अब राधा को भूख लगी यदि काम बन्द कराना है तो निन्दा कर दो, राधा ने कहा- 'अर्थ क्या है तुम्हारी श्वाँस का, गर न होता ये टुकड़ा बाँस का', कृष्ण जी ने बाँसुरी बजाना बन्द कर दिया, बताओं दोनों में कौन मुख्य है ? वस्तुत: यदि श्वाँस में जुकाम हो जाए तब कितनी अच्छी बाँसुरी हो स्वर नहीं आयेगा, श्वाँस अच्छी है और बाँसुरी फटी है तो भी सुर नहीं आता, अत: निमित्त उपादान की बहुत बड़ी महिमा है, बाँसुरी की उतनी ही कीमत जितनी श्वाँस की।
कर्म
रामचन्द्रजी सम्यग्दृष्टि थे तो भी कहते थे कि मैं सीता और लक्ष्मण के विना जीवित नहीं रह सकता, सीता की दीक्षा के बाद और लक्ष्मण की मृत्यु के बाद भी राम जीवित रहे, जैसे भारतीय रेल को अपनी सम्पत्ति कहता है लेकिन मानता नहीं, माता-पिता को अपने कहता है पर मानता नहीं, यदि कोई अपने या पड़ोसी के मां-बाप को मार डाले तो भी धारा 302 का केस बनता है।
अनासक्ति
''तदनन्तभागेमन:पर्ययस्य'' इस सूत्र के विषय में दो मत हैं, एक मत के अनुसार सर्वावधि ज्ञान परमाणु को जानता है, इस मत के अनुसार मन:पर्ययज्ञान परमाणु के अनन्तवे भाग को जानता है, दूसरे मत के अनुसार सर्वावधिज्ञान कार्मण द्रव्य को जानता है, इस मत के अनुसार मन:पर्ययज्ञान कार्मण द्रव्य के अनन्तवे भाग को जानता है।
ज्ञान
अनुमान मतिज्ञान का भेद है और निमित्तज्ञान श्रुतज्ञान का भेद है, नारद और पर्वत जङ्गल में जा रहे थे, एक ने कहा यहाँ हाथी गया है, पैरों के चिन्हों से जाना, आगे जाकर कहता है, हथिनी गई है, वह एक आँख से कानी है, उस पर रानी बैठी है, वह गर्भवती है, उसको पुत्र होगा, ये सब अनुमान से जाना, बड़े पैर से हाथी का ज्ञान, लघुशङ्का से हथिनी का ज्ञान, एक तरफ की डालियाँ खाने से कानी हथिनी का ज्ञान, उतरते समय वजन पड़ा, इसलिए गर्भवती का ज्ञान, दाईं ओर से उतरी इसलिए लड़के का ज्ञान हुआ।
ज्ञान
प्यासे दो मित्र पानी की खोज में थे, देखा यहाँ से ठण्डी हवा आ रही है, पक्षी उड़ रहे हैं, हरे भरे वृक्ष हैं, महिलाएँ पानी ला रही हैं, अन्त में तालाब पर पहुँच गए, ये अनुमान ज्ञान है।
ज्ञान
भाव- बरसात में मेरे कपड़े गीले न हो जायें, मैं घर पहुँच जाऊँ इसके बाद खूब पानी गिरे, फिर चाहे गरीब का आटा गीला हो जाये। ट्रेन लेट हो जाये जिससे हमें मिल जाये, चाहे उसमें बैठे हजार लोग भूखे तड़फ रहे हों। इसकी कोई चिन्ता नहीं रहती। ट्रेन पर बैठे, सीट मिल गयी तो स्वयं लेट जाते हैं, चाहे दूसरे खड़े हों। हमें माल खरीदना है तो सस्ता हो जाए, और बेचना है तो महँगा हो जाए, चाहे दूसरे को कितना भी नुकसान हो जाए। हमें आवश्यकता है तो पानी बरस जाए अन्यथा नहीं बरसे भले ही दूसरे की खेती सूख जाए, वकील और डॉक्टर कभी ये भावना नहीं भा सकते कि सभी जीव सुखी रहें, अन्यथा उनकी दुकानदारी बन्द हो जाएगी। लोग भगवान् से प्रार्थना भी अपने स्वार्थ के अनुसार करते हैं ये सब भावों के भेद हैं।
मन
ब्राह्मण से तत्त्वार्थसूत्र जी के पहले अध्याय के 'एकादीनि भाज्यानि युगपदे कस्मिन्नाचतुर्भ्य:' सूत्र का अर्थ पूँछा तो इस प्रकार का अर्थ किया-'एक को लेकर सबको मारो और चारों दिशाओं में जहाँ रास्ता मिले भाग जाओ', इसलिये 'सूत्रेष्वदृष्टं पदं सूत्रान्तरादनुवर्तनीयं सर्वत्र' अर्थात् सूत्रों में नहीं दिखाई देने वाले पद की आगे-पीछे से अनुवृत्ति कर लेना चाहिए।
ज्ञान