Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
Mind

मन

369 सूत्र · पृष्ठ 1 / 5

निषेधात्मक दृष्टि कोण व्यक्ति को हताश किये बिना नहीं रहता, एवं सकारात्मक दृष्टिकोण व्यक्ति को संक्लेश से बचाता हैं।
मन
आपके पास सिर्फ तीन ही चीजें हैं तन-मन और धन। अतः आप तन को अपने बीबी-बच्चों को दे देना, धन कुटुंब-कबीले को देना तो चल भी सकता है किन्तु 'मन' किसी को मत देना, मन तो मात्र परमात्मा के स्मरण में लगाना चाहिए।
मन
जीव का 'अपवित्र मन' ही प्रधान नरक है। उस मन की वेदना–चिंता, भय और अशान्ति ही नारकीय यातना है।
मन
तन से नहीं, मन से मिलें, पर से नहीं, स्व से मिलें।
मन
जिसकी अनुभूति जितनी गहरी होती है, उसकी संवेदना उतनी ही व्यापक होती है।
मन
चिन्ता नहीं चिन्तन करो।
मन
अच्छी जीवन शैली के लिए आवश्यक है कि अगर हम गर्मी से बचने के लिए कमरे में एयर कंडीशनर का उपयोग कर रहे हैं तो दिमाग हीटर की तरह गर्म न रखें।
मन
आजकल ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण, पर्यावरण प्रदूषण का इतना आतंक नहीं है जितना कि मानसिक प्रदूषण का है।
मन
सुन्दर विचार जिनके साथ हैं, वे कभी अकेलेपन में नहीं रहते हैं।
मन
तन की पवित्रता से नहीं मन की पवित्रता से परमात्मा प्रसन्न होते हैं।
मन
परिस्थिति नहीं बदल सकते तो अपनी मनःस्थिति बदल लो सब दुःख-सुख में बदल जायेंगे। जो परिणामों को विशुद्ध बनाये उसका नाम पर्व है।
मन
अपने भाव और भाग्य पर भरोसा नहीं करना चाहिए क्योंकि भाव कब बिगड़ जायें और भाग्य कब रूठ जाए, इसका कोई भरोसा नहीं।
मन
भाव बिगड़ता है तो भव बिगड़ जाता है और भाग्य बिगड़ता है तो भविष्य बिगड़ता जाता है। अतः अच्छे भाव (परिणाम) और अच्छे भाग्य का सदुपयोग कर लो क्योंकि भाव सम्भलते ही भव सम्भल जाता है और भाग्य सँवरते ही भविष्य सँवर जाता है।
मन
भावना जल है, उस पर देश-काल-गति का प्रभाव बड़ी जल्दी पड़ता है।
मन
भावना के आधार पर कोई विचार स्थिर कर लेने में सदैव कष्ट होता है क्योंकि भावना स्थायी नहीं होती है। परिस्थियाँ बदलते ही मान्यताएँ बदल जाती हैं।
मन
मन पवित्र हो तो बुराई में भी अच्छाई दिखाई देती है।
मन
मन को मारने की नहीं मन पर विजय प्राप्त करने की आवश्यकता है क्योंकि मन पर विजय ही समस्त संसार पर विजय पाने जैसा है।
मन
वस्त्र मैला हो जाए किन्तु मन मैला नहीं होना चाहिए।
मन
वातावरण के जहर से ज्यादा जहरीला है मन का जहर।
मन
मनुष्य का सबसे बड़ा नुकसान उसके मन में बुरे विचारों का आना है।
मन
स्वर्ग नरक स्वयं के भीतर है जैसा सोचोगे वैसा पाओगे।
मन
दूसरे के प्रति बुरा विचार करके अपनी उपयोगी ऊर्जा का दुरुपयोग मत करो।
मन
किसी पर सन्देह करने से अपना चित्त मलिन होता है।
मन
स्थान बदलने से नहीं मनःस्थिति बदलने से सुख मिलता है।
मन
सुख के लिए शरीर को सुन्दर नहीं मन को सुन्दर बनाओ।
मन
यदि अन्तर्मन में आनंद हो तो स्वर्ग आपके साथ में है।
मन
आत्मन्! यह मनुष्यत्व अति दुर्लभ है, चिंताग्रस्त रहकर जीवन व्यर्थ मत करो।
मन
आपके जैसे भाव होते हैं देह का परिणमन वैसा होना प्रारम्भ हो जाता है।
मन
वैभव से ज्यादा पुण्य निर्मल सोच के लिए चाहिए।
मन
तीर्थ मंगल, क्षेत्र मंगल, काल मंगल में भी प्रबल भाव मंगल होता है।
मन
करोड़ों स्वर्ण मुद्राएँ इतनी कीमती नहीं जितनी कीमती एकक्षण की भाव विशुद्धि है, साधना से ज्यादा शक्ति भोगों में लगती है, साधना से शक्ति तो क्रमशः बढ़ती है किन्तु भोगों से शक्ति क्रमशः घटती जाती है।
मन
मन का भ्रमण ही जीव के भव भ्रमण का कारण है, मन की निर्मलता श्रेष्ठतम तीर्थ है।
मन
मन, स्वाध्याय से एकाग्र होता है और चिन्ता छोड़ने से प्रसन्न होता है।
मन
स्वयं का कल्याण, देव, शास्त्र, गुरु के आश्रित नहीं अपितु मन की पवित्रता के आश्रित है।
मन
मन की एकाग्रता के अभाव में दृष्टि विषय-कषाय पर जाती है।
मन
जिसका मन शान्त होगा उसे ही सुख शान्ति की प्राप्ति होगी।
मन
जो परिणामों की विशुद्धि का घात कर रहा है उससे बड़ा शत्रु संसार में कोई नहीं है।
मन
ज्ञानांकुश से मन रूपी हाथी को वश में किया जाता है।
मन
चिन्ता प्रसन्न चेहरे को भी मलिन कर देती है।
मन
जब भी अनावश्यक, अनुपयोगी एवं अवांछनीय विचार मन में आने लगें तभी समझ लेना कि भगवान् से सम्बन्ध विच्छेद होना प्रारम्भ हो गया है।
मन
जो मन से संचालित नहीं अपितु अपने विचारों द्वारा मन को चलाता है, उसे 'मनीषी' एवं ऐसी प्रज्ञा को 'मनीषा' कहा जाता है।
मन
भयंकर युद्ध में हजारों दुर्जय शत्रुओं को जीतने की अपेक्षा अपने मन को जीत लेना ही सबसे बड़ी विजय है।
मन
मन को विश्राम देने का तरीका है मन के कार्य को बदलते रहना, सबसे अधिक विश्राम की सम्भावना निश्चल शांत वातावरण के अन्दर विद्यमान है।
मन
सब कुछ अपने संकल्प द्वारा ही छोटा या बड़ा बन जाता है।
मन
इच्छा का मूल 'संकल्प' है। विधान, व्रत, यम, धर्म आदि संकल्प से ही होते हैं। संकल्प शक्ति तो मानसिक शक्तियों की शिरोमणि है।
मन
चित्त को वश में करने के लिए अध्यात्म विद्या का ज्ञान, सत्संगति, वासनाओं का भलीभाँति परित्याग तथा प्राणायाम ये प्रबल उपाय हैं।
मन
जीवन में और सब कुछ हो, सिर्फ मन की शान्ति न हो तो जीवन बेकार है।
मन
पृथ्वी पर खोटे स्थान भौमिक नरक हैं, खोटे भाव और उस सम्बन्धी यातनापूर्ण अवस्था मानसिक नरक है, माया-मोह में स्वरूप विस्मृति की अवस्था आध्यात्मिक नरक है।
मन
जीव का अपवित्र मन ही प्रधान नरक है एवं उसकी वेदना, चिन्ता और भय अशान्ति ही नारकीय यातना है।
मन
मन से किया हुआ पाप ही पाप है, शरीर द्वारा किया हुआ नहीं क्योंकि जिस शरीर से पत्नि का आलिंगन करते हैं उसी शरीर से पुत्री का आलिंगन करते हैं भावों में अन्तर होता है।
मन
प्रसन्न चित्त रहने से मनुष्य के सब दुःख दूर हो जाते हैं, प्रसन्नचित्त वाले पुरुष की बुद्धि शीघ्र ही अच्छी प्रकार स्थिर हो जाती है।
मन
यदि मन में प्रपञ्च हो तो मन में भगवान् नहीं हो सकते हैं और यदि मन में भगवान् है तो प्रपञ्च नहीं हो सकता है।
मन
जीवित मनुष्य के लिए दुष्ट अन्तःकरण की यातना ही तो नरक है।
मन
कितना सरल हो जाता है जीवन जब विकल्प नहीं रहते हैं।
मन
'आशा' उत्साह की जननी है, आशा में तेज है, बल है, जीवन है, आशा ही संसार की संचालक शक्ति है।
मन
शान्ति मानव जीवन के लिए एक परम पावन और वांछनीय निधि है, शान्ति बाहर की से नहीं मिलती, वह अपने अंदर की वस्तु है।
मन
जिसके अंतरंग में शान्ति है, उसे बाह्य वेदना कभी कष्ट नहीं दे सकती है।
मन
जीवन में सम्पत्ति एवं स्वास्थ्य से भी अधिक मन की शान्ति का मूल्य है।
मन
मन को वश में करने के लिए अध्यात्म विद्या का ज्ञान, सत्संग, वासनाओं का भलीभाँति परित्याग तथा प्राणायाम ये प्रबल उपाय हैं।
मन
यह जिन्दगी हँसते-खेलते हुए जीने के लिए है, चिंता, भय, शोक, निराशा, ईर्ष्या, तृष्णा व वासना में बिलखते रहना मूर्खता है।
मन
मानसिक पीड़ा शारीरिक पीड़ा की अपेक्षा अधिक कष्टप्रद होती है।
मन
सभी नकारात्मक भावनाओं का एक ही समाधान है कि इस हालात और हकीकत को स्वीकारें जब भी दुःखी हो अपने आप से एक प्रश्न पूछे ''मैं क्या स्वीकार कर रहा हूँ'' यदि यह समझ में आ गया तो कभी दुःखी नहीं होंगे।
मन
विचार और वासना का कोलाहल ही अन्दर की आवाज को नहीं सुनने देता है।
मन
'दूषित मस्तिष्क' जीना दूभर कर देता है।
मन
विषयों को मन में घुमाना ही कुमार्ग है।
मन
तन से वृद्ध हो गये तो कोई बात नहीं किन्तु मन से वृद्ध मत बनो।
मन
दृश्य को बदलना अपने हाथ में नहीं है परन्तु दृष्टिकोण को बदलना अपने ही हाथ में है, निषेधात्मक दृष्टिकोण व्यक्ति को हताश किए बिना नहीं रहता है।
मन
आज जो अच्छा महसूस हो रहा है वह कल भी अच्छा था पर समझ नहीं पा रहे थे क्योंकि हमारी सोच अच्छी नहीं थी अतः इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि अच्छे-बुरे पदार्थ नहीं, हमारी सोच होती है।
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आँखों के सामने जब फूल खिला है तो काँटों के बारे में सोच-सोचकर स्वयं को क्षत-विक्षत मत कीजिए।
मन
'पर' का विचार एवं पर की चर्चा ही बेचैनी के कारण है।
मन
अच्छा या बुरा कुछ नहीं है, केवल विचार ही किसी वस्तु को अच्छा या बुरा बनाते हैं।
मन
वही बात विचार में लाओ जो आत्महित के लिए आवश्यक हो, यदि विपरीत बात विचार में आवें तो भेदविज्ञान की भावना से शीघ्र नष्ट कर दो।
मन
एक मिनट मोबाइल से बात करने में एक घंटे की शान्ति भंग हो जाती है।
मन
संवेदनशील इंसान कभी-कभी छोटी बातों को बहुत ज्यादा सोचकर अपनी सारी खुशी को दफन कर देता है।
मन
मन के हाथी को विवेक के अंकुश में रखो क्योंकि तुम्हारा विवेक ही तुम्हारा गुरु है।
मन