Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 26 / 41

दीक्षोपरान्त उपवास- सुमतिनाथ और मल्लिनाथ भगवान् ने भोजन करने के बाद दीक्षा धारण की तथा दीक्षा के तीन दिन के बाद तीन दिन का उपवास लिया, पार्श्वनाथ और वासुपूज्य भगवान् ने दीक्षा के बाद एक दिन का उपवास धारण किया था और शेष तीर्थंकरों ने दो दिन का उपवास लिया था, किन्तु आदिनाथ भगवान् की दीक्षा लेने के बाद छह माह के अनशन की कथा सर्वत्र प्रसिद्ध है।
धर्म
केवलज्ञान उत्पत्ति स्थान- वृषभनाथ भगवान् को पूर्वताल नगर के सकटामुख वन में, नेमिनाथ भगवान् को गिरनार पर्वत पर, पार्श्वनाथ भगवान को आश्रम के समीप, महावीर भगवान को ऋजुकूला नदी के तट पर शेष तीर्थंङ्करों को अपने-अपने नगर के उद्यान में केवलज्ञान उत्पन्न हुआ था।
ज्ञान
सेठ की सेवा के लिए गरीब बालक तीर्थ यात्रा में गये थे, सेठ से पहले ज्वाँर के दाने चढ़ाये और भगवान् से पहले प्रार्थना की और कहा ‘भगवन् क्षमा करना हम गरीब हैं’ और आकर सो गये, सेठ ने सोचा मुझसे पहले कौन मोती चढ़ा कर गया है, पता चला बच्चों ने ज्वाँर के दाने चढ़ाये थे वे मोती बन गये तब सेठ का गर्व चूर-चूर हो गया, भक्ति के लिए सोना-चाँदी की नहीं श्रद्धा और समर्पण की आवश्यकता होती है।
भक्ति
नारद जी गङ्गा स्नान करने गये, घाट पर एक कन्या रो रही थी, पचास-पचास साल के ज्ञान और वैराग्य नामक दो मृत पुत्र पड़े थे, कन्या का नाम था भक्ति, पञ्चम काल में ज्ञान और वैराग्य बूढ़े हो गये किन्तु भक्ति रूपी माँ युवती है अर्थात् संगीत से सब झूमने लगते हैं अतः क्षयोपशम के अनुसार अपने ज्ञान और वैराग्य को बढ़ाते हुए भक्ति के माध्यम से अपना कल्याण करना चाहिए।
भक्ति
सास अपनी बहु को मन्दिर ले गयी उसे गाय को देखकर दूध की याद आ गयी राक्षस का स्टेच्यु देखकर डर गयी, सास ने कहा इसी प्रकार भगवान् के दर्शन से अपने स्वरूप की याद आ जाती है, इसलिए जिनदर्शन जरूरी है, अतः हमें अन्य को न देखकर अपने आदर्श को देखना चाहिए जिससे हमें उन जैसा बनने की प्रेरणा मिलती रहे।
भक्ति
पाकिस्तान में चालीस जैन परिवार थे, आतङ्कवाद से परेशान होकर मन्दिर सहित पाकिस्तान छोड़ने का विचार किया हवाई अड्डे पर अङ्ग्रेज गवर्नर ने कहा प्रति व्यक्ति इतना सामान ले जा सकते हो आस्थावान लोगों ने अपनी सम्पति वहीं छोड़ दी जयपुर में घास की झोपड़ी में भगवान विराजमान किये परिश्रम करके पहले पूजन द्रव्य फिर भोजन द्रव्य खरीदते थे कुछ दिन बाद पहले मन्दिर फिर घर बनवाया। जो खाली हाथ आये थे, वास्तव में जिसके पास धर्म है वह खाली नहीं कहलाता है, बाद में वे सब मालामाल हो गये, अतः आस्था रखकर आयतानों की रक्षा करना चाहिए।
भक्ति
सीता जी की प्राप्ति के बाद रामचन्द्रजी ने हनुमान जी से कहा मैने अङ्गद, विभीषण सुग्रीव आदि को प्रत्युपकार के रूप में एक-एक पद दिया है, तुम्हे कौन सा पद चाहिए? उन्होंने मना किया रामचन्द्रजी के आग्रह पर बोले मैं दो पद लूँगा, रामचन्द्रजी ने कहा तुम्हारी मर्जी, हनुमान जी बोले मर्जी नहीं अर्जी है वैसे पद से मद आता है, रामचन्द्रजी की स्वीकृति के बाद हनुमान जी ने दोनों पैर पकड़ लिये और कहा प्रभु ये दोनों पद हृदय में रहेंगे तो तीन लोक की सम्पति मिल जायेगी, बाकी के पद अपद हैं, आपद के आस्पद हैं एवं पद में राजी होने वाला भूतपूर्व बन जाता है तथा प्रभु में राजी होने वाला अभूतपूर्व बन जाता है, रामचन्द्रजी ने हनुमान जी के शीश पर आशीष का हाथ रख दिया।
भक्ति
रत्नवृष्टि की बिक्री- एक वणिक अपना खरीदा हुआ माल बेचने के लिए बहुत से अमूल्य मणि लेकर जरासन्ध से मिला, उन मणियों को देखकर राजा जरासन्ध ने उससे पूँछा कि ये मणि तुम कहाँ से लाये हो? वणिक ने कहा हे स्वामिन्! ये मणि उस द्वारिका पुरी से लाये हैं जहाँ अत्यन्त पराक्रमी राजा कृष्ण जी रहते हैं, यादवों के स्वामी समुद्रविजय और उनकी रानी शिवादेवी को जब तीर्थंङ्कर श्री नेमिनाथ जी उत्पन्न हुये थे, तब पन्द्रह मास तक देवों ने रत्न वृष्टि की थी, उन्हीं रत्नों में से ये रत्न लाये हैं, तात्पर्य यह है कि दिव्य रत्नों का भी व्यापार होता है।
भक्ति
व्यन्तर ने सेठ से अपनी पूजा का आग्रह किया, सेठ ने मना कर दिया, उसने कहा हम तुम्हारे लड़के को मार डालेंगे, सेठ ने कहा आयु पूर्ण हुए बिना कोई नहीं मरता, दुर्भाग्य से लड़का मर गया, व्यन्तर ने कुछ दिन बाद फिर कहा हमारी पूजा करो नहीं तो दूसरे लड़के को ले जायेंगे, सेठ ने कहा- हमको ले चलो हम तुम्हारी पूजा नहीं कर रहे हैं, लड़के ने क्या बिगाड़ा है, देव ने क्षमा माँगी, कोई किसी का कुछ नहीं कर सकता, अतः हमें भय और लोभ से भी व्यन्तरादि की पूजा नहीं करना चाहिए।
विवेक
आठवें गुणस्थान तक सब कर्मों की स्थिति अन्तः कोड़ा-कोड़ी सागर पड़ती है, इसके आगे कम होती जाती है। क्षायोपशमिक सम्यग्दृष्टि जीव केवली के पादमूल में तीन करण पूर्वक मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व को सम्यक् प्रकृति में संक्रमित करके सम्यक् प्रकृति की क्षपणा करता हुआ जब सम्यक् प्रकृति की स्थिति अन्तर्मुहूर्त मात्र रह जाती है उसको कृतकृत्य वेदक कहते हैं।
कर्म
अशुभ कर्मों का अनुभाग उत्तरोत्तर अनन्तगुणा हीन होना क्षयोपक्षम लब्धि है। उत्तरोत्तर भावों की विशुद्धि होना विशुद्धिलब्धि है। सद्गुरुओं का उपदेश प्राप्त होना देशनालब्धि है। समस्त पाप कर्मों के उत्कृष्ट स्थिति और उत्कृष्ट अनुभाग का घात करके अन्तःकोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण स्थिति में और द्विस्थानीय (लता/दारू) अनुभाग में करना प्रायोग्यलब्धि है, अथवा आयुकर्म के अलावा सात कर्मों की स्थिति को अन्तःकोड़ाकोड़ी सागर कर देना, घातिया के अनुभाग को लता/दारू रूप अघाति के पाप प्रकृति के अनुभाग को नीम/काँजीर रूप करने को प्रायोग्यलब्धि कहते हैं। अधःकरण, अपूर्वकरण, और अनिवृत्तिकरण रूप परिणामों का प्राप्त होना करणलब्धि है प्रारम्भ की चार लब्धियाँ भव्य व अभव्य दोनों को सामान्य से हो सकती हैं, किन्तु करणलब्धि केवल भव्य को ही होती है।
कर्म
आनन्दस्वरूप शुद्धात्मा का चिन्तन होने पर रस विरस हो जाते हैं, गोष्ठी-कथा आदि का कौतूहल विघटित हो जाता है, पञ्चेन्द्रियों के विषयों की प्रीति घट जाती है, शरीर सम्बन्धी प्रीति भी विश्राम ले लेती है निरन्तर चलने वाली वाणी भी मौन ले लेती है और मन भी दोषों के साथ मृत्यु को प्राप्त करने की इच्छा करता है अर्थात् मन में उठने वाले विविध विकल्प शान्त हो जाते हैं।
ध्यान
लोकमूढ़ता- आश्विन मास में लोग नदी में खड़े होकर पूर्वजों को पानी दे रहे थे, पण्डित बनारसीदास जी अपने घर की ओर मुँह करके पानी देने लगे, किसी ने पूछा क्या कर रहे हो? पण्डितजी ने कहा घर में गाय प्यासी बँधी है उसको पानी पिला रहे हैं, लोगों ने कहा यहाँ से गाय की प्यास कैसे बुझ जायगी? पण्डितजी ने कहा! जब आपके मृतक पूर्वज तृप्त हो सकते हैं तो मेरी गाय की प्यास क्यों नहीं बुझ सकती है, तब लोगों को अपनी अज्ञानता का अहसास हुआ।
विवेक
एक बुढ़िया सुई खोज रही थी, किसी ने पूछा हे अम्ब! क्या खोज रही हो? उसने कहा! सुई। सामने वाले ने कहा! प्रकाश में खोजो। बुढ़िया सड़क के उजाले में जाकर सुई को खोजने लगी, किसी ने पूँछा क्या खोज रही हो अम्मा? उसने कहा! सुई। सामने वाले ने पूँछा कहाँ गिरी है? अम्मा ने कहा! घर में। तब सामने वाले ने कहा! घर में उजाला कर के खोजो तब मिलेगी। उसी प्रकार हमारी आत्मा एवं शान्ति अन्दर है पर हम उसे बाहर पैसे, गाड़ी, सुविधा, ऐश-आराम आदि में खोज रहे हैं।
विवेक
जैसे पनहारिन सिर पर जल का घट रखकर, हाथ छोड़कर चलती है, बातें करती है, हँसती है, लेकिन घट का सिर से सन्तुलन नहीं बिगड़ने देती है, प्रतिपल स्मृति घट पर रहती है कहीं गिर न जाये। जैसे गाय जङ्गल घास चरने जाती है, पर बछड़े का ध्यान हमेशा करती है। जैसे नृत्य कारिणी पूरे मञ्च पर नाचती है पर वाद्य स्वरों के साथ पैरों का संतुलन बनाकर रखती है, उसी प्रकार सम्यग्दृष्टि जीव सबके बीच में रहता है, किन्तु अपने आत्मा को नहीं भूलता है।
विवेक
संसारी प्राणी देखा-देखी करते हैं, परमार्थ का विचार नहीं करते, नारद जी ने कमण्डल को गुमने के भय से गङ्गा के किनारे रेत से ढक दिया, लोगों ने समझा इससे पुण्य होता होगा इसलिए सबने रेत के ढेर लगा दिए, नारद जी स्नान करके जब बाहर आये तो वहाँ पर रेत के अनेक ढेर बन गये नारद जी ने अपना कमण्डल बहुत खोजा किन्तु कमण्डल ही गुम गया यह लोकमूढ़ता है।
विवेक
करोड़पति बाप का बेटा करोड़ रुपये का भान न होने से रोड़पति बना रिक्शा चला रहा था, पिता के मित्र से पता चलते ही रिक्शा वहीं छोड़ देता है, उसी प्रकार संसारी प्राणी को आत्मा की भगवत्ता पता न होने से विषय कषाय में सुख खोज रहा है। सम्यग्दृष्टि होते ही विषय-कषाय से विरक्त हो जाता है।
विवेक
चार बदमाश एक-एक मील की दूरी पर खड़े हो गये और दक्षिणा में प्राप्त हुए बछड़े को चारों ने क्रम से कुत्ता कह दिया, पण्डित जी ने बछड़े को छोड़ दिया, उसी प्रकार दृढ़ श्रद्धा व पहचान न होने से धोखा होता है।
विवेक
मन में ऐसा भाव भी नहीं आना चाहिए कि मैं सम्पत्तियों का घर हूँ, ये विपत्तियों का घर है, ये हमारे जैसा नहीं हो सकता, किन्तु इससे विपरीत सोचें कि कर्मोदय से जितने भी त्रस-स्थावर जीव हैं, वे सब समान है, जैसे शूद्री के उदर से जन्मे दो बेटे एक विप्र के यहाँ पला, एक शूद्र के यहाँ पला, इस कारण उनमें जाति भ्रम हो गया, लेकिन वास्तव में दोनों शूद्र की सन्तान हैं, उसी प्रकार वेदनीय कर्म के दो भेद हैं एक सातावेदनीय एक असातावेदनीय।
अहिंसा
राजा जनक की सभा में अष्टावक्र ऋषि गये, लोग एक दम हँस पड़े तो अष्टावक्र ऋषि बोले लोग मेरे चमड़े के आठों टेढ़े अङ्गों को देखकर हँसते हैं, अतः ये राजा जनक की सभा नहीं चर्मदर्शकों की सभा है।
विवेक
एक आचार्य के दो शिष्य थे, एक ने वेश्या के बगीचे में चातुर्मास करने की आज्ञा ली, दूसरे ने शेर की गुफा में बैठकर चतुर्मास की आज्ञा ली, चतुर्मास के बाद जिन्होंने वेश्या के बगीचे में चातुर्मास किया, गुरु ने उनको विशेष आशीर्वाद दिया, शेर की गुफा वाले मुनि ने अगला चातुर्मास वेश्या के बगीचे में माँगा, गुरू ने रोका तो भी नहीं माने, वेश्या का राग सुनकर वे विचलित हो गये, वेश्या से अपनी भावना प्रकट की, वेश्या ने रत्नकम्बल की माँग की, साधु बारह वर्ष का कठोर परिश्रम करके रत्नकम्बल लाये और वेश्या को दे दिया, वेश्या ने पैर पोंछकर उसे नाली में फेंक दिया, साधु चकित हो गये, पूँछने पर वेश्या ने कहा जिस प्रकार आपने अपने कीमती संयम को खो दिया, वह रत्नकम्बल को फैकने के ही समान है, ऐसा कहकर वेश्या ने साधु का स्थितिकरण किया था।
अनासक्ति
व्यक्ति चरित्र से भ्रष्ट भले ही हो जाये, पर ज्ञान पूज्य होता है, जैसे आचार्य माघनन्दी जी चरित्र से भ्रष्ट हो गये थे, फिर भी मुनि महाराज उनसे समाधान करने उनके घर गये थे, इस निमित्त से उनका स्थितिकरण हो गया था, सोना गन्दे स्थान पर पड़ा हो तो भी मूल्यवान होता है।
ज्ञान
विदेश में पशु सम्मेलन हुआ, सब जगह के पशु-पक्षी आये उनकी विशेषता बतलाई, बाद में भारतीय पशु-पक्षी को बताया, पिटारे में दो केंकड़े थे जो बाहर निकलना चाहते थे, लेकिन एक दूसरे की टाँग खींच कर गिरा देते थे, इसी तरह भारत के लोग किसी की भी उन्नति को देखकर उसे गिराना चाहते हैं।
चरित्र
जिस प्रकार उत्तम सेवक स्वामी के कार्य में सदा दासभाव रखता है उसी प्रकार सिद्ध प्रतिमा, जिनबिम्ब, जिनमन्दिर, शास्त्र और चतुर्विध सङ्घ में दासभाव अर्थात् किसी प्रकार की बाधा या आवश्यकता होने पर उसे दूर करना, ज्ञान से पर के दुःख दूर करना पर वात्सल्य है परीषह उपसर्ग से पीड़ित होकर शुभाचार ज्ञान-ध्यान में शिथिलता न लाना स्व वात्सल्य है।
भक्ति
फलटण में रहने वाले प्रतिमाधारी श्रावक के परिवार का लड़का दस साल से वेश्या के यहाँ रहता था, शादी के समय ताऊजी ने बुलाने का निर्णय किया, परिवार वालों ने आना-कानी की, फिर भी भाई पत्र देकर आया और बोला शादी में आना हो तो आ जाना, उसको गुस्सा आया तो मना कर दिया, अन्त में ताऊजी स्वयं वहाँ गये, नीचे खड़े होकर आवाज दी, लड़के की नींद खुली वहीं से झाँक कर देखा अरे! ताऊजी आये हैं, वह नीचे आया चरणों में माथा रखा, ताऊजी ने कहा! चलो बेटा घर में शादी है, उसने कहा ताऊजी! घर में सभी लोग तिरस्कार करेंगे, ताऊजी ने कहा बेटा! तुम्हारे विना शादी नहीं होगी और उसे घर ले आये, मन्दिर ले गए तिलक लगाया साथ में बैठकर भोजन कराया, शादी के बाद ताऊजी ने कहा! अब तुम जा सकते हो, तो वह चरणों में गिरकर रोने लगा, कि मैंने कुल को कलङ्कित किया, सबको कष्ट दिया, अब मुझे माफ़ करें, प्रायश्चित दें, उसने धीरे-धीरे व्रत धारण किये, मुनि बन गया, समाधि मरण किया, बोहरा गाँव में आज भी समाधि स्थल है, दर्शनार्थी आज भी दर्शन को जाते हैं।
धर्म
दो मित्र विदेश से धन कमाकर लाये, रास्ते में रात हो गई, धन की रक्षा हेतु तीन-तीन घण्टे सोने का वादा किया, एक देव सर्प बनकर के आया, एक मित्र को काटने लगा तो दूसरे ने विरोध किया, तो सर्प ने कहा! तुम मित्र के गले का दो बूँद खून दो तो हम चले जायेगें, तलवार से गर्दन रेत कर खून निकाला तो मित्र की नींद खुल गई गर्दन पर तलवार चलते देखी लेकिन फिर सो गया, सर्प चला गया खून देने वाले मित्र को आकुलता हुई मित्र क्या सोचेगा, जब इसका नम्बर आया सोने का तो नींद नहीं आई कारण पूछा तो कहा! कि मैंने आपका खून निकाला था तब आपने क्या सोचा था? तब मित्र ने कहा कि मित्र गर्दन काट रहा है तो हमारा भला ही कर रहा होगा, मित्र पर ऐसा विश्वास वफादार होना चाहिए।
संगति
एक शाम बूढ़ी गाय धीरे-धीरे चलकर घर की ओर आ रही थी, इतने में एक शेर सामने आ गया और गाय से कहा मैं बहुत दिनों से भूखा हूँ अतः आज अपनी भूख शांत करूँगा, तब गाय ने शेर से कहा! मैं अपने बछड़े को दूध पिला आऊँ फिर तुम मुझे खा लेना, शेर हँसा और बोला! कि तुम मुझे धोखा देना चाह रही हो, गाय ने कहा मैं बछड़े की सौगन्ध खाकर कहती हूँ, दूध पिला कर अवश्य आ जाऊँगी, शेर ने बोला ठीक है, जैसे ही गाय घर पहुँची और बछड़े से दूध पीने को कहा, तो बछड़े ने देर से आने का कारण पूँछा, बताने पर उसने कहा, कि आपके स्थान पर मैं जाऊँगा, आग्रह करने पर भी उसने दूध नहीं पिया और दोनों शेर के पास चल दिए, एक के स्थान पर दो को आता देख शेर खुश हुआ, बछड़ा कहता है शेर पहले मुझे खायगा और माँ सींगों से उसे पीछे करके कहती है कि शेर पहले मुझे खायगा, गाय-बछड़े के प्रेम ने शेर का हृदय परिवर्तन कर दिया और उनका वात्सल्य देखकर दोनों को खाने का इरादा छोड़ दिया।
अहिंसा
एक राजा जङ्गल में सैर करने गया, अचानक आँधी तूफ़ान आने से सभी सैनिक-साथी बिछुड़ गये, छाया पाने की इच्छा से राजा एक महात्मा की झोपड़ी में गया, महात्मा लेटा हुआ था, राजा को देखकर बैठ गया, सोचा बैठने से दो लोग बन जायेंगे, इतने में पानी में भीगता हुआ एक गधा भी आ गया, महात्मा बोले राजन्! हम लोग खड़े हो जाते हैं, जिससे ये गधा भी झोपड़ी के अन्दर आ जायगा, राजा ने कहा! क्या करते हो गधे को भी झोपड़ी के अन्दर? महात्मा ने कहा राजन्! ये साधु की झोपड़ी है यहाँ गधों से भी मनुष्यों जैसा व्यवहार किया जाता है, ये रईसों की कोठी नहीं है जहाँ मनुष्यों से भी गधों जैसा व्यवहार किया जाता है।
विनम्रता
पण्डित पन्नालाल जी सागर वालों का बेटा बीमार हो गया, इन्दौर ले गये, भोजन अपने हाथ से बनाते थे, तो माचिस खरीदने बाजार गये, कहीं माचिस नहीं मिली, पण्डित जी ने पूँछा, तो दुकानदारों ने कारण बताया, कि हमारे यहाँ एक गरीब है, उससे माचिस बिकवाते हैं, ताकि वह भी सम्पन्न हो जाय, यदि हम लोग रुपये देते तो उसको हीनता महसूस होती।
दान
जनता पार्टी के नेता श्री के-के- हेगड़े की पत्नि ने आचार्य विद्यानन्द जी को बतलाया था कि सौ वर्ष पहले की बात है, कि जैन परिवार में एक व्यक्ति ने शिकार कर दिया था तो समाज ने उसे जाति से बन्द कर दिया था, प्रभावशाली परिवार होने से दस हजार अन्य लोग भी वैष्णव बन गये थे, जिस दिन वे लोग जैन से वैष्णव बने थे, उस दिन वे लोग प्रति वर्ष जैन मन्दिर में पूजा पाठ करते हैं एवं सात्विक भोजन करते हैं, अतः एक व्यक्ति के पाप के पीछे अनेकों को वीतराग धर्म से वञ्चित नहीं करना चाहिए, प्रायश्चित्त प्रतिक्रमण से शुद्ध करना चाहिए।
अहिंसा