Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
कथानक · Anecdotes

कथाएँ

1218 प्रेरक कथाएँ · पृष्ठ 25 / 41

वृद्धावस्था में स्त्री का मरना कष्टकारी होता है, यदि शरीर में रोग हो तो और दुर्दशा होती है, पुत्र मिष्ट वचन नहीं बोलते हैं, उनकी स्त्रियाँ दूर से भागती हैं, नाती पास में नहीं आते तथा अत्यधिक कटु वचन बोलते हैं।
परिवार
ऊँट को जातिस्मरण- एक सेठ के यहाँ कन्या हुयी, सेठ के पास एक ऊँट था जो उस कन्या का पूर्व भव का पति था, सेठ ने कन्या की शादी की, तो दहेज में ऊँट दे दिया, वह कन्या ऊँट पर सवार हुयी, तो ऊँट को जातिस्मरण हो गया, कि ये मेरी पत्नि थी, अब मेरे ऊपर बैठी है, ऊँट बैठ गया आगे नहीं बढ़ा खूब पिटाई की, लेकिन नहीं उठा, कन्या को भी जाति स्मरण हो गया कि ये मेरा पति था, इसलिये बैठ गया, कन्या ने समझाया तुम्हारी पर्याय बदल गयी है, अब विकल्प मत करो, इस पर्याय में कड़वी नीम खाना पड़ती है और भार ढोना पड़ता है।
कर्म
चक्र ने नहीं-एक तीर ने प्राण हरे- पुण्य के उदय में कृष्ण जी की मृत्यु जरासन्ध के सुदर्शन चक्र से नहीं हुई, पर पापोदय में एक बाण से हो गयी, उसी तरह लक्ष्मण की मृत्यु रावण के सुदर्शन चक्र से नहीं हुई, लेकिन देवों ने स्नेह की परीक्षा के निमित्त 'राम नहीं रहे' यह झूठ बोला, तो सुनते ही लक्ष्मण जी के प्राण निकल गये।
कर्म
क्षमा आदिक दस धर्म, बारह व्रत, उत्कृष्ट श्रावक का आचार, बारह तप, समीचीन मुनि के लिए चार प्रकार का आहारादि दान देना, ज्ञान-ध्यान आदि का अभ्यास करना, जिनेन्द्र देव की पूजा करना, समीचीन धर्म के धारक पुरुषों का सम्मान करना, सद्गुरुओं की सदा सेवा करना, जिन प्रतिमाओं और जिन मन्दिरों का निर्माण कराना, जिन प्रतिमाओं की महान् अभ्युदय को सिद्ध करने वाली प्रतिष्ठा कराना, जिनेन्द्र प्रतिमाओं का महोत्सव के साथ अभिषेक करना, अनुप्रेक्षाओं आदि का चिन्तन करना, तप के लिए समीचीन पुरुषार्थ करना, अन्य जीवों का उपकार करना तथा मनुष्यों को धर्म आदि का उपदेश देना इन कार्यों से तथा रत्नत्रय आदि भावों से, श्री जिनेन्द्रदेव के स्मरण से एवं निर्ग्रन्थ साधुओं की भक्ति करने से ''भव्य जीव आश्चर्यकारी पुण्य को प्राप्त करते हैं''।
धर्म
उत्तम जेल- संसार में सबसे उत्तम जेल ब्रिटेन में है, फ्रांस का एक व्यक्ति उसको देखने गया, प्रत्येक कमरे में रेडियो, टी-वी, टेलीफोन, फ्रिज, लाइब्रेरी सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं, जेल अधिकारी ने आगन्तुक से राय माँगी, उस व्यक्ति ने हँसकर कहा सब सुविधाओं के उपरान्त भी बन्धन तो बन्धन ही है, कैदी को सजा तो पूरी करना ही होगी, इसी प्रकार सांसारिक विषयों का बन्धन है।
अनासक्ति
छःद्रव्य, सात तत्त्व, पाँच अस्तिकाय, नौ पदार्थ, बन्ध-मोक्ष और मोक्ष के कारण रूप बारह अनुप्रेक्षाओं में, रत्नत्रय, शुभकर्म, दया आदि सद्धर्म इत्यादि में जो प्रवृत्ति करता है वह शुभ भाव है।
धर्म
'वन में' राम के लिए यक्ष के द्वारा रामपुरी की रचना। 'रण में' खरदूषण से युद्ध मे विराधित विद्याधर के द्वारा लक्ष्मण का सहयोग। 'शत्रु विद्याधर रावण से' भूमिगोचरी राम की विजय। 'जल में' पोटली बनाकर फेंक दिए जाने पर देवों द्वारा यमपाल चाण्डाल के लिए सिंहासन की रचना। 'अग्नि के मध्य में' सीता के अग्नि कुण्ड को देवों द्वारा जल कुण्ड मे परिवर्तित करना। 'समुद्र में' श्रीपाल जी को धवल सेठ द्वारा गिरा दिए जाने पर भी रक्षा होना। 'वंशस्थ पर्वत पर' श्री कुलभूषण-देशभूषण जी का श्री राम-लक्ष्मण जी के द्वारा उपसर्ग निवारण। 'सुप्त अवस्था में' सर्प से नेवले द्वारा बालक की रक्षा। 'प्रमत्त अवस्था में' पूर्व के उपकृत जटायु एवं कृतान्तवक्त्र के जीव देवों द्वारा श्री राम का सहयोग। 'विषम स्थिति में' पाण्डवों की लाखा महल से रक्षा एवं प्रतिसूर्य विद्याधर ने अञ्जना को वन में बहन बनाकर सहायता की और हनुरुह द्वीप ले गया। इन सभी स्थितियों में पूर्वकृत पुण्य ने रक्षा की।
कर्म
जिसके पुण्य और पाप दोनों की निर्जरा होती है पुन: आस्रव नहीं होता है उस योगी को निर्वाण प्राप्त होता है एवं वहाँ से पुन: संसार में आगमन नहीं होता है, इसके पहले पुण्य की नहीं पाप की निर्जरा होती है।
धर्म
पुण्य झड़ता-पाप गड़ता- पाप काँटे की तरह है, पुण्य फूल की तरह है, काँटे को किसान बुद्धि पूर्वक जला देता है, फूल स्वयं झड़ जाते हैं, उसी प्रकार पाप को साधु बुद्धि पूर्वक छोड़ देता है, पुण्य की निर्जरा चौदहवें गुण स्थान के अन्त में स्वयं हो जाती है।
कर्म
बंदर के अंदर-माया का समन्दर- एक किसान के पास तीन बैल थे, दो को जोतता था एक बँधा रहता था, बैल के समीप एक सीका था जो पेड़ पर टाँग रखा था, जिसमें किसान अपना नाश्ता रखता था, बन्दर बदमाशी करता था, डिब्बा खोलकर भोजन करके जूठन बैल के मुँह में लगा देता था, किसान ने भोजन गायब पाया और बैल का मुँह जूठा देखकर पिटाई करने लगा, बन्दर रोज चालाकी करता, दस-पन्द्रह दिन बीत गये, पड़ोसी ने देखा कि बैल को व्यर्थ में पीटता है, समझाया इसे क्यों पीटते हो? बैल इतने ऊँचे सीके तक कैसे पहुँच सकता है, वह इससे बहुत ऊपर है, किसान ने कहा जूठन तो इसी के मुँह में लगी है फिर सन्देह कैसा? उसने कहा! एक दिन तुम छिपकर देखों मामला क्या है, किसान ने स्वीकार किया, प्रतिदिन की तरह बन्दर आया, खाना खाया, जूठन बैल के मुँह में पोत दी, उसी तरह बैल तो हुआ पुण्य एवं बन्दर हुआ पाप, खोटी प्रवृत्ति पाप करता है, अपयश पुण्य का होता है।
कर्म
तीन बालकों में होड़ लगी कि तुम हमको हँसा दो, तो मैं तुम्हारी सेवा करूँगा, उसको पचास तरह से हँसाया लेकिन वह नहीं हँसा, इसी तरह पुण्य-पाप को चुनौती दें, कि इनके आने पर हम हर्ष-विषाद नहीं करेंगे।
कर्म
नारियल में पानी- पुण्य की निशानी- जो होनहार है वह नारियल के भीतर पानी के समान होती ही है और जो जाने वाली है वह गज के द्वारा खाये हुये कैथ के दल के समान जाती ही है, अर्थात् जैसे नारियल में पानी अपने आप आ जाता है और हाथी के द्वारा खाये हुये कैथ का दल अपने आप चला जाता है, वैसे ही भाग्य की अनुकूलता होने पर लक्ष्मी विना प्रयत्न के प्राप्त हो जाती है और प्रतिकूलता होने पर अकस्मात् चली जाती है।
कर्म
पुण्यशाली मनुष्य खाद्य, स्वाद्य, पवित्र सुगन्धित पान और लेह्य (चाटने योग्य पदार्थ) तथा इनके संयोग से निर्मित स्वादिष्ट भोजन स्वर्णादि की थालियों आदि में खाते हैं, इनके पुण्य से रसोईया द्वारा निर्मित कुछ भी भोजन अमृत के समान जान पड़ता है।
कर्म
कर्मों की गति- श्रीकृष्ण जी ने जब कंस को मार डाला तो उसकी स्त्री जीवद्यशा प्रतिनारायण पद के धारी अपने पिता जरासन्ध के पास गयी और उससे कहा कि आपके रहते हुये कंस जैसा पति और चाणूर जैसा पहलवान कृष्ण ने मार डाला, इतना सुनते ही जरासन्ध की क्रोधाग्नि प्रज्वलित हो गयी, तब जरासन्ध ने अपने बेटे को यादव कुल के नष्ट करने को कहा, तो कृष्ण का सामना करते हुए वह मारा गया, पुन: जरासन्ध ने अपने छोटे भाई अपराजित को आदेश दिया, कृष्णजी से युद्ध में वह भी मारा गया, अब जरासन्ध स्वयं यादवों को नष्ट करने की बुद्धि से निकला, इस बात का समाचार वसुदेव और समुद्रविजय आदि को मिला, तो इन सब ने जरासन्ध की शक्ति का विचार करते हुए मथुरा नगरी को छोड़कर जङ्गलों में रहने का निश्चय किया, चूँकि नेमिनाथजी का जन्म हो चुका था, फिर भी इनको मथुरा छोड़कर जाना पड़ा, जिस स्थान पर यादव वंशी छिपे हुए थे, उसी रास्ते से जरासन्ध अपनी सेना लेकर निकल रहा था, तब यादव लोग भी युद्ध की तैयारी करने लगे कि अब सामने आये शत्रु का सामना करना है, इस बुद्धि से समुद्रविजय, उग्रसेन, वसुदेव आदि दसों भाई युद्ध को तैयार हुये एक देव ने आकर सैकड़ों जलती हुयी चितायें विक्रिया से दिखा दीं और वह देव वृद्धा माँ का रूप बनाकर रोने लगा, जरासन्ध ने इन जलती हुयी चिताओं को देखकर पूँछा! कि ये चिताएँ किसकी जल रही हैं और आप क्यों रो रही हो, तब वृद्धा ने कहा कि यादव वंशी राजा मथुरा छोड़कर इस जङ्गल में आपके भय से छिप गये थे, लेकिन आपका यहाँ आगमन हो गया, इसलिए सभी यादव इनमें जलकर मर गये, इनमें मेरा पति भी मर गया है, मैं यादव वंशीय राजाओं की दासी हूँ, मुझसे अग्नि में प्रवेश नहीं किया गया है इसलिए में रो रही हूँ, इस प्रकार का समाचार सुनकर जरासन्ध अपने नगर वापस चला गया, उधर श्री नेमिनाथजी और कृष्णजी के प्रभाव से देवों ने द्वारिका नगरी की रचना की, सब नगर के बीचों-बीच कृष्ण जी का अठारह खण्ड का सर्वतोभद्र नामक महल बनाया और समुद्रविजय आदि दस भाईयों का आठ खण्ड का महल बनाया, कृष्णजी के साढ़े तीन करोड़ कुमार रणविद्या में कुशल थे, वे कृष्णजी जरासन्ध से कैसे जीते जा सकते थे।
कर्म
कहीं पर भूख तड़फन की, कहीं पर मौज उड़ते हैं, कहीं पर दूध कुत्ते को, कहीं बालक बिलखते हैं। किसी की देह नज्झी है, कहीं परदे लटकते हैं, कहीं सूती नहीं मिलता, कहीं सिलकन पहनते हैं। किसी का चैन से सोना, किसी का रात भर रोना, किसी को सुध न ऊठने की, किसी का काम वश रहना। कहीं पर चैन की वंशी, कहीं अरमान के टुकडे, कहीं हर अङ्ग पर जेवर, कहीं पर बाल भी बिखरे। कहीं हैं धूल कालिख तो कहीं पावडर महकते हैं, कहीं पर होंठ में लाली, कहीं पर दिल धधकते हैं। कहीं अर्थी निकलती है, कहीं तबला ठनकता है, कहीं रोना सदा जुट कर, कहीं अट्टहास होता है।।
कर्म
न जाने कैसे खेल खिलाती है जिन्दगी, पल में हँसे तो पल में रूलाती है जिन्दगी। शीशे का बनाया था मैंने सपने में महल, पर चोट पत्थरों की दिलाती है जिन्दगी। सोचा था मैंने अब न किसी को सताऊँगा, पर गलतियों पे गलति कराती है जिन्दगी। प्यासा दौड़ता है मृग पानी की चाह में, बालू को भी पानी सा दिखाती है जिन्दगी। रे मन! जिसे तू चाहता वो मिल नहीं सकता, सपनों को सदा झूठा बनाती है जिन्दगी।।
कर्म
ईश्वर से आशीर्वाद ले लिया भरपूर फसल होगी, बीज बोया नहीं, फसल काटने गया तो कुछ नहीं मिला, आशीर्वाद के साथ पुरूषार्थ आवश्यक है, जैसे पुत्र माँगा पर ब्रह्मचर्य ले लिया तो सन्तान नहीं होती है।
पुरुषार्थ
नारद की उत्पत्ति कुलिझ्झी तापस से होती है, जो कलहप्रिय, धर्मप्रिय होते हैं, इनके माता-पिता को भाग्य से मुनिराज का उपदेश मिल जाता है, बच्चे को अकेला छोड़ मोक्षमार्ग में लग जाते हैं।
कर्म
पावन मेरे नयन भये तुम दरस तैं, पावन पाणी भये तुम चरणन परस तैं। पावन मन हो गयो तिहारे ध्यान तैं, पावन रसना मानी तुम गुण गान तैं।। पावन भयी पर्याय मेरी, में भयो पूरण धनी। मैं शक्ति पूर्वक भक्ति, कीनी पूर्ण भक्ति नहीं बनी।। धन धन्य ते बड़भागि भविजन, नींव शिवघर की धरी। वर क्षीरसागर आदि जल मणिकुम्भ भरि भक्ति करी।।
भक्ति
परमात्मा की परम शान्त वीतराग मूर्ति की पूजन का महत्त्व यह है कि संसारी जीव संसार के माया और गृहस्थी के प्रपञ्च में ज्यादा फँसा रहता है तथा मन चञ्चल होने से और आत्मा बलवान न होने से केवल शास्त्रों से परमात्मा का वर्णन सुनकर एकाएक विना किसी नक्से के परमात्म स्वरूप का नक्सा या चित्र अपने हृदय में खींचने में समर्थ नहीं होते हैं, वे भी उस मूर्ति के द्वारा परमात्म स्वरूप का कुछ-कुछ ध्यान और चिन्तन करने में समर्थ हो जाते हैं और उसी से आगामी दुखों और पापों की निवृत्ति पूर्वक अपने आत्मस्वरूप की प्राप्ति में अग्रसर होते हैं, कोई चित्रकार चित्र खींचनें का अभ्यास करता है तब वह सुगम और सादे चित्रों को देखकर अपना चित्र खींचने का अभ्यास बढ़ाता है, एकदम कठिन गहन और गम्भीर चित्र को वह नहीं खींच सकता, जब उसका अभ्यास बढ़ जाता है तब कठिन रङ्गीन चित्रों को भी बड़ी सुन्दरता से बनाने लगता है और छोटे चित्रों को बड़ा और बड़े चित्रों को छोटा करने लगता है, जब चित्र विद्या में निष्णात हो जाता है, तब चलती-फिरती वस्तुओं का भी चित्र बड़ी सफाई के साथ बातों-बातों में ही खींचकर रख देता है और चित्र को न देखकर केवल व्यवस्था और हाल मालूम करके उसका साक्षात् जीता-जागता चित्र भी अङ्कित कर देता है, उसी प्रकार यह संसारी जीव एकाएक परमात्म स्वरूप का ध्यान नहीं कर सकता अर्थात् परमात्मा का फोटो अपने अन्दर नहीं खींच सकता वह परमात्मा की परम वीतराग मूर्ति पर से ही अपना ध्यान बढ़ाता है। निरन्तर दर्शनादि के अभ्यास से जब वीतराग छवि से परिचित हो जाता है तब शनै: शनै: एकान्त में बैठकर उस मूर्ति का फोटो अपने हृदय में खींचता है और फिर कुछ देर तक रहने के लिए समर्थ होता है। ऐसा करने पर उसका मनोबल और आत्मबल बढ़ने लगता है फिर वह इस योग्य हो जाता है, कि उस मूर्ति के मूर्तिमान श्री अरहन्त देव का समवसरणादि विभूति सहित साक्षात् चित्र अपने हृदय में खींचने लगता है, इस प्रकार के ध्यान का नाम रूपस्थ ध्यान है और यह ध्यान प्राय: मुनि अवस्था में होता है।
ध्यान
एक गरीब, अन्धी एवं निःसन्तान वृद्धा ने भगवान को प्रसन्न कर लिया, भगवान ने कहा एक बार में जो वरदान चाहो माँग लो, उसने कहा! मैं अपने नाती को सोने की थाली में खीर खाते देखूँ, अर्थात् उस वृद्धा ने एक ही वरदान में आँखे, बेटा-बहुएं नाती, धन सम्पत्ति सब कुछ माँग लिया, इसी प्रकार भक्त को 'मेरे न चाह कछु और ईश रत्नत्रय निधि दीजे मुनीश' रत्नत्रय माँग लेने पर तीन लोक की कोई भी सम्पत्ति शेष नहीं रहती है, इसलिए रत्नत्रय ही माँगना चाहिए अन्य कुछ नहीं।
भक्ति
बालक ने ए.बी.सी.डी. आदि सारी वर्णमाला भगवान् को सौंप दी और कहा हे भगवन्! इन्ही शब्दों से सारी स्तुतियाँ बनती हैं, आपको जो पसन्द हो वह स्तुति आप बना लेना और हमारी भक्ति स्वीकार कर लेना, यह निश्छल भक्ति कहलाती है।
भक्ति
धर्मयज्ञ में हवन विधि- आत्मा यजमान है, शरीर वेदी है, सन्तोष साकल्य है, शुक्ल ध्यान प्राणायाम है, सिद्धपद की प्राप्ति फल है, सत्य बोलना स्तम्भ है, तप अग्नि है, चञ्चल मन पशु है, इन्द्रिय समिधा है, यही धर्म यज्ञ कहलाता है।
धर्म
उदासोऽहम्, दासोऽहम्, सोऽहम्, अहम्। प्राणी पहले संसार शरीर भोगों से उदास होता है फिर पञ्च परमेष्ठी का दास होता है फिर अपने आप को भगवान के समान चिन्तन करता है तब वह मात्र ज्ञायक हो जाता है।
ध्यान
वर्णी जी के साथ शिखरजी यात्रा में सागर वालों का रसोइया था, वर्णी जी को भोजन रुचा नहीं, नाराज होकर बोले तुम्हरे हाथ का भोजन नहीं करेंगे, स्वयं भोजन बनाया तीन घण्टे लग गये, धुँआ से आखों में दर्द हो गया, रात में स्वप्न में बाईजी ने कहा! तुम गुस्से में यात्रा करोगे तो नरक जाना पड़ेगा, भावना पवित्र होना चाहिए।
क्षमा
सीता जी को लङ्का से लाने के लिए पुल बाँधने की आवश्यकता पड़ी, हनुमान जी पत्थर पर राम का नाम लिखकर पानी में डालते थे, तो पत्थर पानी में नहीं डूबता था, रामचन्द्रजी ने पानी में पत्थर डाला तो डूब गया, तब रामचन्द्र जी ने हनुमान जी से पूँछा आप पानी में पत्थर डालते हैं तो डूबता नहीं इसमें क्या रहस्य है? तो हनुमान जी बोले भगवान्! जो आपके हाँथ से छूट जाएगा वह डूबने से कैसे बच सकता है, इसी प्रकार जिसके हृदय में सच्चे देव-शास्त्र-गुरु के प्रति श्रद्धा नहीं है वह संसार समुद्र में डूबने से कैसे बच सकता है?
भक्ति
कुम्हार का दर्शन- एक व्यक्ति को मुनिराज ने देवदर्शन का नियम दिया तो वह कहने लगा की हमारे घर से मन्दिर दूर है, तो मुनिराज ने कहा तुम्हारे घर के सामने कौन रहता है? व्यक्ति बोला! 'कुम्हार', तो मुनिराज ने कहा प्रतिदिन उसी के दर्शन कर लिया करो, तो व्यक्ति तैयार हो गया और प्रतिदिन कुम्हार के दर्शन करने लगा, एक दिन कुम्हार सुबह-सुबह मिट्टी लेने दूर खान पर चला गया, तो व्यक्ति ढूँढ़ते हुए खान पर गया, कुम्हार मिट्टी खोद रहा था तो उसे स्वर्ण मोहरों से भरा एक घड़ा मिला, व्यक्ति दर्शन करके लौट रहा था, तो कुम्हार ने उसे देख लिया और सोचा कि लगता है इसने ये खजाने का घड़ा देख लिया है और ये अगर राजा के पास जाकर बोल देगा तो खजाना भी जाएगा और मैं भी जेल जाऊँगा, तो उस व्यक्ति को बुलाकर कहा कि देखो आधा तुम ले लो और आधा मैं ले लेता हूँ, व्यक्ति सोचता है कि इस कुम्हार के नियम पूर्वक दर्शन से इतना लाभ हुआ है तो भगवान् के दर्शन करने से पता नहीं कितना लाभ होगा और उसने प्रतिदिन देवदर्शन का नियम ले लिया।
भक्ति
एक राजा की असमय में मृत्यु हो गई, उसका बच्चा छोटा था उसे ही राजा बना दिया, पड़ोसी राजा ने मौके का लाभ उठाना चाहा, पर बच्चे के मंत्रियों ने कहा राजन्! राज्य तो राजा सम्भालेंगे, जब तक वे छोटे हैं तब तक हम सहयोग करेंगे, मन्त्री की बात सुनकर राजा ने कहा यदि हमारे प्रश्नों का बच्चा उत्तर दे देगा तो हम राज्य नहीं लेगें, सबको चिन्ता हुई, माँ ने बच्चे को रात भर समझाया बेटा राजा ऐसा पूँछे तो ऐसा उत्तर देना, प्रात: काल जब जाने लगा तो बच्चे ने कहा माँ! यदि राजा ने इन प्रश्नों में से कोई भी प्रश्न नहीं पूँछा तो क्या मैं अपनी कल्पना से भी उत्तर दे सकता हूँ? माँ ने कहा! हाँ बेटा पर लाज रखना, बच्चा राजा के सामने उपस्थित हुआ, राजा ने उसके दोनों हाँथ पकड़ लिये और कहा आप पराधीन हो अपनी रक्षा कैसे करोगे? तब बच्चे ने उत्तर दिया, राजन् विवाह के समय जब लड़का कन्या का एक हाँथ पकड़ता है तो पूरे जीवन रक्षा करनी पड़ती है, आपने तो मेरे दोनों हाथ पकड़ लिये हैं, अब हम निश्चिन्त हैं, राजा ने प्रसन्न होकर छाती से लगा लिया, राज गद्दी दे दी, इसी प्रकार जो भगवान के दोनों चरण की शरण ले लेता है उसे किसी प्रकार की चिन्ता नहीं रहती है।
भक्ति
विसर्जन की कथा- गणेश जी के भक्त, नाव में बैठकर, नदी पार कर रहे थे, तूफान को आया देखकर सभी डर रहे थे, अचानक नाव में पानी भरने लगा, तो हर भक्त गणेशजी का स्मरण करने लगा, गणेशजी नाव पर दौड़े-दौड़े आये, कुछ नृत्य के दृश्य दिखलाये, नाव थर्राने लगी, भक्त की जान मुंह में आने लगी, भक्त बोला, भगवान हम मर रहे हैं, ऐसे समय में आप ये क्या कर रहे हैं? गणेशजी बोले प्रिय भक्तों, जिस तरह तुम मुझे विसर्जन करने के लिये ले जाते हो, तब तुम जिस तरह नाचते गाते खुशियाँ मनाते हो, मैं भी बस उसी क्रम को दोहरा रहा हूँ, और नाच गा कर तुम्हे डुबा रहा हूँ।
भक्ति
भगवान् के विहार की महिमा- जिस मार्ग से भगवान् का विहार होता है, वह मार्ग अपने चिन्हों से एक वर्ष तक यह प्रकट करता है कि वहाँ से भगवान् का विहार हुआ है, तथा रत्नवृष्टि से वह मार्ग ऐसा सुशोभित होता है जैसे नक्षत्रों के समूह से चन्द्रमा सुशोभित होता है, उस समय मन्दबुद्धि मनुष्य तीक्ष्णबुद्धि के धारक हो जाते हैं, समस्त हिंसक जीव अहिंसक हो जाते हैं और भगवान् के विहार से अनुगृहीत भूमि में दो सौ योजन तक उपद्रव आदि नहीं होते हैं और पचास वर्ष तक कोई उपद्रव-दुर्भिक्ष आदि नहीं होता है, भगवान् के समीप रहने वाले लोगों को खेद, पसीना, पीड़ा तथा चिन्ता आदि कुछ भी उपद्रव नहीं होता है।
भक्ति