Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
संगति

दो मित्र विदेश से धन कमाकर लाये, रास्ते में रात हो गई, धन की रक्षा हेतु तीन-तीन घण्टे सोने का वादा किया, एक देव सर्प बनकर के आया, एक मित्र को काटने लगा तो दूसरे ने विरोध किया, तो सर्प ने कहा! तुम मित्र के गले का दो बूँद खून दो तो हम चले जायेगें, तलवार से गर्दन रेत कर खून निकाला तो मित्र की नींद खुल गई गर्दन पर तलवार चलते देखी लेकिन फिर सो गया, सर्प चला गया खून देने वाले मित्र को आकुलता हुई मित्र क्या सोचेगा, जब इसका नम्बर आया सोने का तो नींद नहीं आई कारण पूछा तो कहा! कि मैंने आपका खून निकाला था तब आपने क्या सोचा था? तब मित्र ने कहा कि मित्र गर्दन काट रहा है तो हमारा भला ही कर रहा होगा, मित्र पर ऐसा विश्वास वफादार होना चाहिए।

Two friends earned wealth abroad and, halted by night on the way, agreed to guard it in three-hour turns. A deity came in the form of a serpent and began to bite one friend; the other objected. The serpent said, give me two drops of your friend's neck-blood and I will leave. He drew blood with a sword; the friend woke, saw the sword at his neck, then went back to sleep. The serpent left. The friend who had drawn the blood grew anxious about what his friend thought, and on his own turn could not sleep. Asked why, he confessed. The other said: if my friend is cutting my neck, he must be doing it for my good. Such trust and loyalty one should have in a friend.

— आराध्य सूत्र · #25

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संतों की संगति करके नर देह सार्थक कर लेना चाहिए। आसन से रोगों का नाश और प्राणायाम से पापों का नाश और योगी के मन के विकार प्रत्याहार से दूर हो जाते हैं। धारणा से धैर्य आता है तथा अद्भुत चैतन्य की प्राप्ति होती है समाधि से शुभाशुभ कार्यों को त्याग कर साधक मोक्ष को प्राप्त करता है।
संगति
जब कभी अपने हृदय को प्रफुल्लित करना चाहो, अपने निकटवर्तियों के शुभ गुणों को चित्त में लाओ, जैसे कि एक की स्फूर्ति, दूसरे की विनम्रता, तीसरे की उदारता, चौथे की ऐसी ही कोई अच्छाई अर्थात् गुणों की ओर दृष्टि होने से मन प्रसन्न रहता है।
संगति