Jain Quotes

जैन जीवन-पद्धति सूत्र
भक्ति

जिस प्रकार उत्तम सेवक स्वामी के कार्य में सदा दासभाव रखता है उसी प्रकार सिद्ध प्रतिमा, जिनबिम्ब, जिनमन्दिर, शास्त्र और चतुर्विध सङ्घ में दासभाव अर्थात् किसी प्रकार की बाधा या आवश्यकता होने पर उसे दूर करना, ज्ञान से पर के दुःख दूर करना पर वात्सल्य है परीषह उपसर्ग से पीड़ित होकर शुभाचार ज्ञान-ध्यान में शिथिलता न लाना स्व वात्सल्य है।

Just as a good servant always keeps a spirit of service in his master's work, so keeping a spirit of service toward the Siddha-image, Jina-image, Jina-temple, scriptures and the fourfold sangha, that is, removing any obstacle or need that arises, and removing others' suffering through knowledge, is vatsalya for others; and not slackening in good conduct, knowledge and meditation even when afflicted by hardships and calamities is vatsalya for oneself.

— आराध्य सूत्र · #24

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हे जिनेन्द्र भगवान्! हे देवों के देव! बाल्यावस्था से आज तक आपके श्रीचरणों की सेवा में आसक्त शिष्यों को कल्पलता सम सेवा से जो काल व्यतीत हुआ है, आज उस सेवा का वह फल आपसे चाहता हूँ कि प्राणों के निकलते समय आपके नाम से सहित अक्षरों के पढ़ने में मेरा गला कुण्ठित न हो।
भक्ति